- देश की राजनीति में घुसे “कॉकरोच” ने उड़ाई सत्ता की नींद
- कानून, “गौ-रक्षा” और बढ़ता भय: क्या मुसलमानों को निशाना बनाने का माध्यम बन चुका है पूरा तंत्र?
- क़ुरबानी से ‘मॉब लिंचिंग’ तक राजनीति का सबसे बड़ा हथियार बन गई गाय
- हिंदू युवा वाहिनी के बलात्कारी का फूल-मालाओं, नारों और जुलूस के साथ स्वागत
- क्या अब अदालतें संविधान से ज़्यादा “आस्था” से चलेंगी?
- नमाज़ पर बोलने वाली ज़बान कांवड़ यात्राओं, हथियारों के जुलूसों और डीजे के आतंक पर क्यों खामोश रहती है ?
- आज हम किस चौराहे पर खड़े हैं?
- ‘आम्ही लातूरकर नसतो कुठेच मागे’ इस कहावत को सच कर दिखाया मोटेगांवकर ने
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वाराणसी से आई एक हालिया ख़बर ने न सिर्फ़ क़ानूनी दायरों में बल्कि सामाजिक और राजनीतिक हलकों में भी गहरी बहस छेड़ दी है। गंगा नदी के बीच नाव पर इफ़्तार करने के आरोप में गिरफ़्तार 14 मुस्लिम युवकों की ज़मानत याचिका का खारिज होना कई सवालों को जन्म देता है। क्या यह महज़ क़ानून का सख़्त पालन है, या इसके पीछे कोई और परत भी छिपी हुई है? अदालत ने अपने आदेश में आरोपों को ‘गंभीर’ और ‘ग़ैर-जमानती’ बताया है। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें पुलिस ने जिन धाराओं के तहत मामला दर्ज…
पश्चिम एशिया इस वक्त सिर्फ़ युद्ध का मैदान नहीं, बल्कि दावों और खंडनों की जंग का भी केंद्र बन चुका है। ईरान पर अमेरिका और इज़रायल के हमलों का 26 वां दिन इस सच्चाई को और गहराई से उजागर करता है कि यह संघर्ष अब केवल मिसाइलों और ड्रोन तक सीमित नहीं रहा बल्कि यह सूचना, कूटनीति और आर्थिक दबाव का बहुस्तरीय युद्ध बन चुका है। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ‘शांति वार्ता’ के दावे और तेहरान द्वारा उसे सिरे से ‘फेक न्यूज़’ बताना इस बात का संकेत है…
महाराष्ट्र के नासिक से सामने आया स्वयंभू ‘धर्मगुरु’ अशोक खरात का मामला केवल एक आपराधिक घटना नहीं है बल्कि यह उस गहरे संकट की ओर इशारा करता है, जहां आस्था, सत्ता और अंधविश्वास का गठजोड़ समाज के कमजोर वर्गों के शोषण का माध्यम बन जाता है। एक ओर एक महिला के साथ तीन साल तक कथित बलात्कार, दूसरी ओर 58 आपत्तिजनक वीडियो ये आरोप किसी एक व्यक्ति की विकृत मानसिकता का मामला भर नहीं हैं। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें यह उस संरचना का हिस्सा है, जिसमें ‘धर्म’ के नाम पर विश्वास अर्जित कर,…
मथुरा के कोसी कलां में हुई एक मौत ने फिर वही पुराने सवाल हमारे सामने खड़े कर दिए हैं कि क्या हम एक कानून-आधारित समाज की ओर बढ़ रहे हैं, या भावनाओं, अफवाहों और भीड़ के दबाव में फैसले लेने वाली व्यवस्था की तरफ? कथित ‘गोरक्षक’ चंद्रशेखर उर्फ ‘फरसा वाले बाबा’ की मौत के बाद जो कुछ हुआ, वह सिर्फ एक स्थानीय घटना नहीं है, बल्कि देश में पिछले कुछ वर्षों से बन रहे एक खतरनाक ट्रेंड का हिस्सा है। एक तरफ पुलिस इसे साफ तौर पर सड़क दुर्घटना बता रही है, वहीं दूसरी तरफ स्थानीय समूह इसे ‘सुनियोजित हमला’…
महाराष्ट्र के पुणे में एक मुस्लिम ट्रक ड्राइवर को कथित तौर पर जबरन गोबर खिलाने और उसकी पिटाई करने की घटना ने एक बार फिर देश में “गोरक्षा” के नाम पर चल रहे भीड़तंत्र और कानून के मज़ाक को बेनकाब कर दिया है। सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो में चार स्वयंभू ‘गोरक्षक’ हिंदुत्ववादी गुंडे एक मुस्लिम युवक को न सिर्फ पीटते हुए दिखाई दे रहे हैं बल्कि उसके धर्म को लेकर अपमानजनक टिप्पणियां करते हुए उसे जबरन गोबर खाने के लिए मजबूर करते भी नज़र आ रहे हैं। यह घटना सिर्फ एक व्यक्ति के साथ की गई बर्बरता नहीं…
हरियाणा–राजस्थान की सीमा पर हुआ जुनैद–नासिर हत्याकांड एक बार फिर सुर्खियों में है। करीब ढाई साल जेल में रहने के बाद इस मामले के मुख्य आरोपी मोनू मानेसर को राजस्थान हाईकोर्ट से जमानत मिल गई और जैसे ही वह जेल से बाहर आया, उसके गांव में जिस तरह ढोल-नगाड़ों और फूलमालाओं के साथ उसका स्वागत हुआ, उसने पूरे देश में एक नई बहस छेड़ दी है। सवाल सिर्फ जमानत का नहीं है। सवाल यह है कि क्या भारत में भीड़ द्वारा किए गए अपराध अब “नायकत्व” में बदल रहे हैं? एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक…
ब्रिटिश पत्रकार पियर्स मॉर्गन के कार्यक्रम Piers Morgan Uncensored में जब पत्रकार पीटर बीनार्ट ने यह कहा कि अगर अमेरिका और इज़रायल ने हमला नहीं किया होता तो वे छात्राएं आज जीवित होतीं, तब श्लैप ने बीच में हस्तक्षेप करते हुए यह विवादित टिप्पणी कर दी। उनका तर्क था कि ईरान जैसे समाज में लड़कियां “बुर्का पहनकर और बिना आज़ादी के जीवन बिताने को मजबूर होतीं।” एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें यह तर्क कई स्तरों पर सवाल खड़ा करता है। क्या किसी समाज की राजनीतिक या धार्मिक व्यवस्था की आलोचना का मतलब यह है…
पश्चिम एशिया में शुरू हुई जंग का असर अब सिर्फ मिसाइलों और सैन्य ठिकानों तक सीमित नहीं रहा। इसका कंपन हजारों किलोमीटर दूर भारत की रसोई तक महसूस होने लगा है। होटल-रेस्तरां में एलपीजी की कमी, व्यावसायिक सिलेंडरों की आपूर्ति पर रोक और पुणे में गैस आधारित शवदाह गृहों का अस्थायी बंद होना इस बात का संकेत है कि वैश्विक युद्ध का आर्थिक और मानवीय असर किस तेजी से आम लोगों की ज़िंदगी में उतरता है। यह सिर्फ गैस की कमी की खबर नहीं है, बल्कि वैश्विक ऊर्जा राजनीति की वह सच्चाई है, जिसका बोझ अंततः आम नागरिकों को उठाना…
पश्चिम एशिया में युद्ध की आग अब सिर्फ़ सीमित टकराव नहीं रही — यह एक ऐसे भू-राजनीतिक विस्फोट में बदलती दिख रही है जिसका असर पूरी दुनिया पर पड़ सकता है। अमेरिका और इज़रायल द्वारा 28 फरवरी से ईरान पर शुरू किए गए सैन्य हमलों को अब दस दिन हो चुके हैं। लगातार बमबारी, जवाबी मिसाइल हमले और क्षेत्रीय तनाव के बीच अब इस संघर्ष ने एक नया और बेहद नाटकीय मोड़ ले लिया है। ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्ला अली ख़ामेनेई की मौत और उनके बेटे मोजतबा ख़ामेनेई का सत्ता में आना। यह सिर्फ नेतृत्व परिवर्तन नहीं, बल्कि उस…
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में शब्द कभी-कभी गोलियों से भी ज़्यादा असरदार होते हैं। हाल ही में अमेरिकी ट्रेज़री सचिव के उस बयान ने भारत की विदेश नीति और संप्रभुता पर तीखी बहस छेड़ दी है, जिसमें कहा गया कि अमेरिका ने भारतीय रिफाइनरियों को रूसी तेल खरीदने के लिए 30 दिन की ‘अनुमति’ दी है। सवाल सिर्फ तेल का नहीं है बल्कि सवाल यह है कि क्या भारत को अपनी ऊर्जा ज़रूरतों के लिए भी किसी दूसरे देश की मंज़ूरी चाहिए? एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें ‘अनुमति’ शब्द ने क्यों पैदा किया राजनीतिक तूफान अमेरिकी…