ब्रिटिश पत्रकार पियर्स मॉर्गन के कार्यक्रम Piers Morgan Uncensored में जब पत्रकार पीटर बीनार्ट ने यह कहा कि अगर अमेरिका और इज़रायल ने हमला नहीं किया होता तो वे छात्राएं आज जीवित होतीं, तब श्लैप ने बीच में हस्तक्षेप करते हुए यह विवादित टिप्पणी कर दी। उनका तर्क था कि ईरान जैसे समाज में लड़कियां “बुर्का पहनकर और बिना आज़ादी के जीवन बिताने को मजबूर होतीं।” एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
यह तर्क कई स्तरों पर सवाल खड़ा करता है। क्या किसी समाज की राजनीतिक या धार्मिक व्यवस्था की आलोचना का मतलब यह है कि वहां रहने वाले बच्चों की मौत को भी वैचारिक बहस का हिस्सा बना दिया जाए? क्या यह कहना कि “वे बुर्का पहनकर जीतीं” किसी भी तरह से 175 मासूम बच्चियों की मौत को हल्का कर सकता है? यही कारण है कि बहस में मौजूद टिप्पणीकार सेंक उयगुर ने तुरंत सवाल किया कि “तो क्या इसका मतलब है कि उन्हें मार दिया जाए?” यह सवाल सिर्फ श्लैप से नहीं, बल्कि उस मानसिकता से था जो युद्ध को “सभ्यता की लड़ाई” कहकर उसके मानवीय नुकसान को नजरअंदाज कर देती है।
पश्चिमी नैरेटिव और ‘सभ्यता’ का तर्क
यह पहली बार नहीं है जब पश्चिमी राजनीतिक विमर्श में किसी मुस्लिम देश की सामाजिक व्यवस्था को आधार बनाकर सैन्य कार्रवाइयों को नैतिक ठहराने की कोशिश की गई हो। अफगानिस्तान से लेकर इराक तक, बार-बार यह तर्क दिया गया कि युद्ध “महिलाओं की आज़ादी” के लिए है।
लेकिन सवाल यह है कि- अगर महिलाओं की आज़ादी ही उद्देश्य था, तो क्या उसका रास्ता मिसाइल और बम हो सकते हैं? मिनाब की इस त्रासदी ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या युद्ध के पीछे छिपे राजनीतिक और रणनीतिक हितों को मानवाधिकार की भाषा में पैक करके पेश किया जाता है।
वास्तविकता बनाम पूर्वाग्रह
विशेषज्ञों ने यह भी कहा कि श्लैप की टिप्पणी तथ्यात्मक रूप से भी गलत है। ईरान में अधिकांश महिलाएं बुर्का नहीं बल्कि हिजाब पहनती हैं और स्कूलों में लड़कियां सामान्य यूनिफॉर्म में पढ़ाई करती हैं। इसलिए आलोचकों का कहना है कि यह बयान न सिर्फ असंवेदनशील है, बल्कि एक पूरे समाज को रूढ़ छवियों में देखने की मानसिकता को भी दर्शाता है।
युद्ध की सबसे बड़ी कीमत कौन चुकाता है?
इतिहास गवाह है कि युद्धों में सबसे ज्यादा कीमत सैनिक नहीं, बल्कि आम नागरिक चुकाते हैं और उनमें भी सबसे असहाय होते हैं बच्चे। मिनाब के स्कूल पर हुआ हमला इसी सच्चाई का दर्दनाक उदाहरण है। यह घटना याद दिलाती है कि जब मिसाइलें चलती हैं, तो वे सिर्फ सैन्य ठिकानों को नहीं, बल्कि किताबों, स्कूलों और बचपन को भी निशाना बना देती हैं।
सबसे बड़ा सवाल
मिनाब की इस त्रासदी के बाद दुनिया के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है की क्या आधुनिक युद्धों में नैतिकता सिर्फ भाषणों तक सीमित रह गई है? और क्या किसी समाज की आलोचना का अधिकार हमें यह कहने की अनुमति देता है कि मासूम बच्चों की मौत भी एक तरह से “बेहतर विकल्प” थी? अगर ऐसा है, तो शायद हमें यह तय करना होगा कि सभ्यता का असली पैमाना क्या है- मिसाइलों की ताकत या इंसानियत की संवेदना।