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पश्चिम एशिया में शुरू हुई जंग का असर अब सिर्फ मिसाइलों और सैन्य ठिकानों तक सीमित नहीं रहा। इसका कंपन हजारों किलोमीटर दूर भारत की रसोई तक महसूस होने लगा है। होटल-रेस्तरां में एलपीजी की कमी, व्यावसायिक सिलेंडरों की आपूर्ति पर रोक और पुणे में गैस आधारित शवदाह गृहों का अस्थायी बंद होना इस बात का संकेत है कि वैश्विक युद्ध का आर्थिक और मानवीय असर किस तेजी से आम लोगों की ज़िंदगी में उतरता है। यह सिर्फ गैस की कमी की खबर नहीं है, बल्कि वैश्विक ऊर्जा राजनीति की वह सच्चाई है, जिसका बोझ अंततः आम नागरिकों को उठाना…

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पश्चिम एशिया में युद्ध की आग अब सिर्फ़ सीमित टकराव नहीं रही — यह एक ऐसे भू-राजनीतिक विस्फोट में बदलती दिख रही है जिसका असर पूरी दुनिया पर पड़ सकता है। अमेरिका और इज़रायल द्वारा 28 फरवरी से ईरान पर शुरू किए गए सैन्य हमलों को अब दस दिन हो चुके हैं। लगातार बमबारी, जवाबी मिसाइल हमले और क्षेत्रीय तनाव के बीच अब इस संघर्ष ने एक नया और बेहद नाटकीय मोड़ ले लिया है। ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्ला अली ख़ामेनेई की मौत और उनके बेटे मोजतबा ख़ामेनेई का सत्ता में आना। यह सिर्फ नेतृत्व परिवर्तन नहीं, बल्कि उस…

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अंतरराष्ट्रीय राजनीति में शब्द कभी-कभी गोलियों से भी ज़्यादा असरदार होते हैं। हाल ही में अमेरिकी ट्रेज़री सचिव के उस बयान ने भारत की विदेश नीति और संप्रभुता पर तीखी बहस छेड़ दी है, जिसमें कहा गया कि अमेरिका ने भारतीय रिफाइनरियों को रूसी तेल खरीदने के लिए 30 दिन की ‘अनुमति’ दी है। सवाल सिर्फ तेल का नहीं है बल्कि सवाल यह है कि क्या भारत को अपनी ऊर्जा ज़रूरतों के लिए भी किसी दूसरे देश की मंज़ूरी चाहिए? एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें ‘अनुमति’ शब्द ने क्यों पैदा किया राजनीतिक तूफान अमेरिकी…

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-राम पुनियानी फिरकापरस्ती से उपजी नफरत लोगों को बांटने का सबसे मुकम्मल हथियार है. मोटे तौर पर हम यह कह सकते हैं कि सांप्रदायिक हिंसा कितनी भयावह होगी और कितनी लम्बी चलेगी, यह इस बात पर निर्भर करता है कि समाज में नफरत कितनी गहरी और व्यापक है. हिंसा के नतीजे में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण होता है और विभिन्न समुदाय अपने-अपने दायरों में सिमट जाते हैं. पिछले कुछ दशकों में हम इस प्रवृत्ति को तेजी से बढ़ता देख रहे हैं. एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें इन हालातों में धार्मिक अल्पसंख्यक भयग्रस्त हो जाते हैं और…

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देश की सर्वोच्च अदालत ने एक बार फिर स्पष्ट किया है कि धर्म, जाति, भाषा या क्षेत्र के आधार पर किसी भी समुदाय को निशाना बनाना संविधान की भावना के खिलाफ है और जब ऐसा करने वाला कोई ऊँचे संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति हो, तो यह उल्लंघन और गंभीर हो जाता है। यह टिप्पणी जस्टिस उज्जल भुयान ने ओटीटी फिल्म ‘घूसखोर पंडित’ से जुड़ी याचिका के संदर्भ में की, लेकिन इसका दायरा कहीं व्यापक है। दो जजों की पीठ- जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस भुयान ने भले ही निर्माताओं द्वारा शीर्षक बदलने की सहमति के बाद मामला बंद कर…

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-राम पुनियानीहमारे संविधान के मुताबिक देश के हर नागरिक को यह चुनने का सामाजिक एवं वैधानिक अधिकार है कि वह किस धर्म का पालन करे – या फिर किसी भी धर्म को न माने. इसके बावजूद धर्म के सहारे राजनीति करने वाले संगठन इसे स्वीकार नहीं करते. आरएसएस के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत एक ओर तो कहते हैं कि सभी भारतवासी हिन्दू हैं. वहीं दूसरी ओर वे यह भी कहते हैं कि हिन्दुओं की आबादी घट रही है क्योंकि बहुत से हिन्दुओं का धर्म बदलकर उन्हें मुसलमान और ईसाई बनाया जा रहा है. वे यह भी कहते हैं कि हिन्दू…

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केरल उच्च न्यायालय द्वारा ‘द केरला स्टोरी 2 – गोज़ बियॉन्ड’ की रिलीज़ पर पंद्रह दिनों की अंतरिम रोक सिर्फ़ एक फिल्म पर लगी कानूनी अड़चन नहीं है, बल्कि यह उस बड़े सवाल की तरफ इशारा करती है जो आज भारतीय समाज के सामने खड़ा है। क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर किसी राज्य, समुदाय या धर्म की छवि को धूमिल करने की खुली छूट दी जा सकती है? न्यायमूर्ति बी. कुरियन थॉमस की मौखिक टिप्पणियों से स्पष्ट है कि अदालत प्रथम दृष्टया इस बात से संतुष्ट नहीं थी कि Central Board of Film Certification (सीबीएफसी) ने फिल्म को…

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उत्तराखंड के रुद्रपुर में एक बुज़ुर्ग मुस्लिम व्यक्ति के साथ हुई मारपीट की घटना केवल स्थानीय कानून-व्यवस्था का मामला नहीं है, बल्कि यह उस व्यापक सवाल को सामने लाती है कि क्या भारत में धार्मिक स्वतंत्रता अब भी एक मौलिक अधिकार है या हिन्दुत्वादी भीड़ की अनुमति पर निर्भर विशेषाधिकार बनती जा रही है? रिपोर्टों के अनुसार, रमज़ान के दौरान एक खाली ज़मीन पर नमाज़ पढ़ रहे शाहिद नामक बुज़ुर्ग को कुछ लोगों ने लाठियों से पीटा, गालियाँ दीं और धार्मिक नारे लगाने के लिए मजबूर किया। वीडियो सामने आने के बाद मामला चर्चा में आया और पुलिस ने भारतीय…

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“लगेगी आग तो आएंगे घर कई ज़द में, यहाँ पे सिर्फ़ हमारा मकान थोड़ी है…” दोस्तों, राहत इंदौरी का यह शेर अब सिर्फ़ कविता नहीं, भू-राजनीति की चेतावनी बन चुका है। मिडिल ईस्ट में जो कुछ आज हो रहा है, वह अचानक नहीं हुआ। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें यह सालों की खामोशियों, रणनीतियों, दबावों और जवाबी दबावों का नतीजा है। जब ईरान पर पाबंदियाँ कसी जा रही थीं, जब उसके परमाणु कार्यक्रम को लेकर दुनिया भर में बयानबाज़ी हो रही थी, जब उसके वैज्ञानिकों की रहस्यमय हत्याएँ हुईं, जब उसके ठिकानों पर गुप्त…

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क्या इतिहास फिर से अदालतों और सड़कों पर खड़ा किया जा रहा है? संभल की जामा मस्जिद को लेकर लंबे समय से चल रहे विवाद पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) का ताज़ा जवाब एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ बन गया है। आरटीआई के तहत पूछे गए सवालों पर एएसआई ने स्पष्ट किया है कि उसके पास ऐसा कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है जिससे यह साबित हो कि मस्जिद किसी पूर्व संरचना को ध्वस्त कर बनाई गई थी। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें यह जवाब केंद्रीय सूचना आयोग के समक्ष दिया गया और आयोग ने भी कहा…

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