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Home»महाराष्ट्र

गोरक्षा या गुंडाराज? पुणे की घटना ने फिर उठाए कानून और इंसानियत पर सवाल

adminBy adminMarch 25, 2026 महाराष्ट्र No Comments4 Mins Read
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महाराष्ट्र के पुणे में एक मुस्लिम ट्रक ड्राइवर को कथित तौर पर जबरन गोबर खिलाने और उसकी पिटाई करने की घटना ने एक बार फिर देश में “गोरक्षा” के नाम पर चल रहे भीड़तंत्र और कानून के मज़ाक को बेनकाब कर दिया है। सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो में चार स्वयंभू ‘गोरक्षक’ हिंदुत्ववादी गुंडे एक मुस्लिम युवक को न सिर्फ पीटते हुए दिखाई दे रहे हैं बल्कि उसके धर्म को लेकर अपमानजनक टिप्पणियां करते हुए उसे जबरन गोबर खाने के लिए मजबूर करते भी नज़र आ रहे हैं।

यह घटना सिर्फ एक व्यक्ति के साथ की गई बर्बरता नहीं है, बल्कि यह उस सोच का परिणाम है जिसमें कुछ लोग खुद को कानून से ऊपर समझने लगे हैं। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

गोरक्षा या भीड़ का न्याय?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत में अब “गोरक्षा” का मतलब कानून को अपने हाथ में लेना हो गया है? अगर किसी ट्रक में पशुओं की अवैध ढुलाई हो रही थी, तो इसकी जांच और कार्रवाई करने का अधिकार सिर्फ पुलिस और प्रशासन के पास है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में “गोरक्षा” के नाम पर कुछ संगठनों ने खुद को सड़क का जज और जल्लाद दोनों बना लिया है। इस घटना में भी वही हुआ। पहले ट्रक को रोका गया, फिर ड्राइवर को पकड़कर पुलिस स्टेशन ले जाया गया और उसके बाद कथित तौर पर उसके साथ अमानवीय व्यवहार किया गया।

धर्म के नाम पर अपमान

वीडियो में जिस तरह से ड्राइवर के धर्म को लेकर अपमानजनक टिप्पणियां की गईं और उसे गोबर खाने के लिए मजबूर किया गया, वह सिर्फ मारपीट का मामला नहीं बल्कि धार्मिक घृणा और सामाजिक अपमान का भी मामला है। यही वजह है कि पुलिस को वीडियो सामने आने के बाद भारतीय न्याय संहिता की धारा 196 और 299 जैसी गंभीर धाराएं लगानी पड़ीं, जो समुदायों के बीच नफरत फैलाने और धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने से जुड़ी हैं। यह सवाल भी उठता है कि अगर वीडियो सामने नहीं आता तो क्या यह मामला सिर्फ एक मामूली मारपीट का केस बनकर रह जाता?

 ट्रक ड्राइवर ने अपनी शुरुआती शिकायत में गोबर खिलाने की बात का जिक्र नहीं किया था। लेकिन जब वीडियो सामने आया, तब पुलिस को गंभीर धाराओं में केस दर्ज करना पड़ा।

वीडियो से खुली सच्चाई

ट्रक ड्राइवर ने अपनी शुरुआती शिकायत में गोबर खिलाने की बात का जिक्र नहीं किया था। लेकिन जब वीडियो सामने आया, तब पुलिस को गंभीर धाराओं में केस दर्ज करना पड़ा। यह अपने आप में एक बड़ा सवाल है कि क्या पीड़ित व्यक्ति डर या दबाव में पूरी सच्चाई नहीं बता पाया? भारत में हिंदुत्ववादी भीड़ हिंसा के कई मामलों में यही पैटर्न देखने को मिला है, पीड़ित डरता है और सच्चाई तब सामने आती है जब वीडियो या कोई गवाह सामने आता है।

राजनीतिक प्रतिक्रिया और बड़ा सवाल

एआईएमआईएम के पूर्व विधायक वारिस पठान ने इस घटना पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि ऐसे लोगों को लगता है कि उन्हें कानून से डर नहीं है। यह बयान सिर्फ एक राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं बल्कि उस माहौल की ओर इशारा करता है जहां कुछ हिंदुत्ववादी कट्टरपंथी समूह खुद को “संस्कृति का रक्षक” बताकर कानून को चुनौती देते हुए दिखाई देते हैं।

 

कानून का राज या हिंदुत्ववादी भीड़ का राज?

पुणे की यह घटना देश के सामने एक गंभीर सवाल खड़ा करती है कि क्या भारत में कानून का राज रहेगा या फिर सड़क पर खड़ी हिंदुत्ववादी भीड़ ही तय करेगी कि कौन दोषी है और कौन नहीं?

अगर “गोरक्षा” के नाम पर किसी इंसान को पीटना, अपमानित करना और उसे गोबर खाने पर मजबूर करना अपराध नहीं माना जाएगा, तो यह सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं बल्कि पूरे समाज की हार होगी। क्योंकि किसी भी लोकतंत्र की पहचान यह होती है कि वहां न्याय अदालतें करती हैं, हिंदुत्ववादी भीड़ या हिंदुत्ववादी गुंडे नहीं।

पिछले सप्ताह राजस्थान के भिवाड़ी में भी सोमवार (2 मार्च) तड़के हरियाणा के एक 28 वर्षीय मुस्लिम युवक की मौत हो गई. मृतक के परिवार का आरोप है कि गौ-तस्करी के शक में बजरंग दल के सदस्यों ने उसे गोली मार दी. हालांकि पुलिस का कहना है कि दो पक्षों के बीच झड़प के दौरान वह घायल हुआ और बाद में उसकी मौत हुई।

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