- देश की राजनीति में घुसे “कॉकरोच” ने उड़ाई सत्ता की नींद
- कानून, “गौ-रक्षा” और बढ़ता भय: क्या मुसलमानों को निशाना बनाने का माध्यम बन चुका है पूरा तंत्र?
- क़ुरबानी से ‘मॉब लिंचिंग’ तक राजनीति का सबसे बड़ा हथियार बन गई गाय
- हिंदू युवा वाहिनी के बलात्कारी का फूल-मालाओं, नारों और जुलूस के साथ स्वागत
- क्या अब अदालतें संविधान से ज़्यादा “आस्था” से चलेंगी?
- नमाज़ पर बोलने वाली ज़बान कांवड़ यात्राओं, हथियारों के जुलूसों और डीजे के आतंक पर क्यों खामोश रहती है ?
- आज हम किस चौराहे पर खड़े हैं?
- ‘आम्ही लातूरकर नसतो कुठेच मागे’ इस कहावत को सच कर दिखाया मोटेगांवकर ने
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-राम पुनियानी फिरकापरस्ती से उपजी नफरत लोगों को बांटने का सबसे मुकम्मल हथियार है. मोटे तौर पर हम यह कह सकते हैं कि सांप्रदायिक हिंसा कितनी भयावह होगी और कितनी लम्बी चलेगी, यह इस बात पर निर्भर करता है कि समाज में नफरत कितनी गहरी और व्यापक है. हिंसा के नतीजे में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण होता है और विभिन्न समुदाय अपने-अपने दायरों में सिमट जाते हैं. पिछले कुछ दशकों में हम इस प्रवृत्ति को तेजी से बढ़ता देख रहे हैं. एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें इन हालातों में धार्मिक अल्पसंख्यक भयग्रस्त हो जाते हैं और…
देश की सर्वोच्च अदालत ने एक बार फिर स्पष्ट किया है कि धर्म, जाति, भाषा या क्षेत्र के आधार पर किसी भी समुदाय को निशाना बनाना संविधान की भावना के खिलाफ है और जब ऐसा करने वाला कोई ऊँचे संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति हो, तो यह उल्लंघन और गंभीर हो जाता है। यह टिप्पणी जस्टिस उज्जल भुयान ने ओटीटी फिल्म ‘घूसखोर पंडित’ से जुड़ी याचिका के संदर्भ में की, लेकिन इसका दायरा कहीं व्यापक है। दो जजों की पीठ- जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस भुयान ने भले ही निर्माताओं द्वारा शीर्षक बदलने की सहमति के बाद मामला बंद कर…
-राम पुनियानीहमारे संविधान के मुताबिक देश के हर नागरिक को यह चुनने का सामाजिक एवं वैधानिक अधिकार है कि वह किस धर्म का पालन करे – या फिर किसी भी धर्म को न माने. इसके बावजूद धर्म के सहारे राजनीति करने वाले संगठन इसे स्वीकार नहीं करते. आरएसएस के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत एक ओर तो कहते हैं कि सभी भारतवासी हिन्दू हैं. वहीं दूसरी ओर वे यह भी कहते हैं कि हिन्दुओं की आबादी घट रही है क्योंकि बहुत से हिन्दुओं का धर्म बदलकर उन्हें मुसलमान और ईसाई बनाया जा रहा है. वे यह भी कहते हैं कि हिन्दू…
केरल उच्च न्यायालय द्वारा ‘द केरला स्टोरी 2 – गोज़ बियॉन्ड’ की रिलीज़ पर पंद्रह दिनों की अंतरिम रोक सिर्फ़ एक फिल्म पर लगी कानूनी अड़चन नहीं है, बल्कि यह उस बड़े सवाल की तरफ इशारा करती है जो आज भारतीय समाज के सामने खड़ा है। क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर किसी राज्य, समुदाय या धर्म की छवि को धूमिल करने की खुली छूट दी जा सकती है? न्यायमूर्ति बी. कुरियन थॉमस की मौखिक टिप्पणियों से स्पष्ट है कि अदालत प्रथम दृष्टया इस बात से संतुष्ट नहीं थी कि Central Board of Film Certification (सीबीएफसी) ने फिल्म को…
उत्तराखंड के रुद्रपुर में एक बुज़ुर्ग मुस्लिम व्यक्ति के साथ हुई मारपीट की घटना केवल स्थानीय कानून-व्यवस्था का मामला नहीं है, बल्कि यह उस व्यापक सवाल को सामने लाती है कि क्या भारत में धार्मिक स्वतंत्रता अब भी एक मौलिक अधिकार है या हिन्दुत्वादी भीड़ की अनुमति पर निर्भर विशेषाधिकार बनती जा रही है? रिपोर्टों के अनुसार, रमज़ान के दौरान एक खाली ज़मीन पर नमाज़ पढ़ रहे शाहिद नामक बुज़ुर्ग को कुछ लोगों ने लाठियों से पीटा, गालियाँ दीं और धार्मिक नारे लगाने के लिए मजबूर किया। वीडियो सामने आने के बाद मामला चर्चा में आया और पुलिस ने भारतीय…
“लगेगी आग तो आएंगे घर कई ज़द में, यहाँ पे सिर्फ़ हमारा मकान थोड़ी है…” दोस्तों, राहत इंदौरी का यह शेर अब सिर्फ़ कविता नहीं, भू-राजनीति की चेतावनी बन चुका है। मिडिल ईस्ट में जो कुछ आज हो रहा है, वह अचानक नहीं हुआ। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें यह सालों की खामोशियों, रणनीतियों, दबावों और जवाबी दबावों का नतीजा है। जब ईरान पर पाबंदियाँ कसी जा रही थीं, जब उसके परमाणु कार्यक्रम को लेकर दुनिया भर में बयानबाज़ी हो रही थी, जब उसके वैज्ञानिकों की रहस्यमय हत्याएँ हुईं, जब उसके ठिकानों पर गुप्त…
क्या इतिहास फिर से अदालतों और सड़कों पर खड़ा किया जा रहा है? संभल की जामा मस्जिद को लेकर लंबे समय से चल रहे विवाद पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) का ताज़ा जवाब एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ बन गया है। आरटीआई के तहत पूछे गए सवालों पर एएसआई ने स्पष्ट किया है कि उसके पास ऐसा कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है जिससे यह साबित हो कि मस्जिद किसी पूर्व संरचना को ध्वस्त कर बनाई गई थी। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें यह जवाब केंद्रीय सूचना आयोग के समक्ष दिया गया और आयोग ने भी कहा…
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच लोकसभा में विपक्ष के नेता Rahul Gandhi ने एक ऐसा सवाल उठाया है जिसने भारत की विदेश नीति पर नई बहस छेड़ दी है—क्या भारत किसी राष्ट्राध्यक्ष की हत्या का समर्थन करता है? और अगर नहीं, तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चुप्पी क्यों? यह सवाल ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली ख़ामनेई की कथित हत्या के बाद सामने आया, जब अमेरिका–इज़राइल और ईरान के बीच तनाव खतरनाक स्तर तक पहुँच चुका है। कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने भी भारत की चुप्पी पर सवाल उठाया। लेकिन असली बहस यह है कि…
वैसे तो भाजपा राज में शायद ही कोई दिन ऐसा गुज़रा होगा जिस दिन मीडिया या फिर सोशल मीडिया पर हिन्दू- मुस्लिम की राजनीती न नज़र आयी हो क्योंकि भाजपा और आरएसएस की खुराक ही हिन्दू मुस्लिम हैं। अगर देश से हिन्दू -मुस्लिम की राजनीती ख़त्म कर दी गयी तो भाजपा और आरएसएस जीवित ही नहीं रह सकते। इस वक़्त भाजपा और आरएसएस महाराष्ट्र में दो विषयों को भुनाकर खूब हिन्दू- मुस्लिम कर रहे हैं, पहला है उद्धव ठाकरी की शिवसेना से परभणी का मुस्लिम महापौर बनाया जाना और दूसरा मालेगांव के उपमहापौर के ऑफिस में लगी टीपू सुल्तान की…
महाराष्ट्र सरकार द्वारा सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े मुस्लिम समुदाय को दिए गए 5% आरक्षण से संबंधित पूर्व शासन निर्णयों और परिपत्रों को रद्द/निरस्त करने का निर्णय केवल एक तकनीकी प्रशासनिक कार्रवाई नहीं माना जा सकता। यह कदम उस व्यापक राजनीतिक दिशा का हिस्सा प्रतीत होता है, जिसमें सामाजिक न्याय की अवधारणा और राज्य की भूमिका पर पुनर्विचार किया जा रहा है। यह निर्णय ऐसे समय में सामने आया है जब राज्य में सत्ता संरचना पर भारतीय जनता पार्टी का निर्णायक प्रभाव है। ऐसे में स्वाभाविक रूप से प्रश्न उठता है कि क्या यह नीति-परिवर्तन प्रशासनिक विवशता है या…