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Home»महाराष्ट्र

‘आम्ही लातूरकर नसतो कुठेच मागे’ इस कहावत को सच कर दिखाया मोटेगांवकर ने

adminBy adminMay 22, 2026 महाराष्ट्र No Comments6 Mins Read
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NEET-UG 2026 पेपर लीक मामले में आज लातूर महाराश्ट्र काफी चर्चा में है ‘RCC(Renukai Career Centre / Renukai Chemistry Classes) कोचिंग संस्थान के प्रमुख संस्थापक मोटेगांवकर को सीबीआई ने गिरफ्तार किया है। उन पर आरोप है कि परीक्षा से करीब 10 दिन पहले (23 अप्रैल को) उनके पास लीक हुआ प्रश्नपत्र आ गया था। उनके मोबाइल फोन में लीक हुआ पेपर मिलने के बाद उन्हें हिरासत में लेकर पुणे और फिर दिल्ली ले जाया गया। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

वहीँ डॉ. मनोज शिरुरे लातूर के बाल रोग विशेषज्ञ को भी सीबीआई ने गिरफ्तार किया है। यह इस पूरे मामले में गिरफ्तार होने वाले किसी भी छात्र के पहले पैरेंट (पिता) हैं। उन पर अपने बेटे के लिए मोटी रकम देकर पेपर खरीदने का आरोप है।

 डॉ. शिरुरे के अलावा, लातूर के कई अन्य नामचीन डॉक्टरों और शिक्षकों को सीबीआई ने समन भेजकर या सीधे बुलाकर पूछताछ की है। वे यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि इन स्थानीय डॉक्टरों का सीधा संपर्क मोटेगांवकर या अन्य मुख्य आरोपियों से कैसे हुआ। लातूर के अलावा नागपुर और चंद्रपुर से भी कुछ NEET छात्रों के घर सीबीआई ने छापेमारी की है और उनसे इलेक्ट्रॉनिक उपकरण व दस्तावेज जब्त किए हैं।

जांच में यह बात सामने आई है कि जो छात्र बिना मेहनत के पास होना चाहते थे, उनसे एजेंटों और कोचिंग सेंटरों के माध्यम से लाखों रुपये वसूले गए हैं। सबसे बड़ा धक्का महाराष्ट्र के लातूर को लगा है। लातूर को कभी “शिक्षणाचं माहेरघर” यानी शिक्षा का मायका कहा जाता था। यहां की कोचिंग संस्कृति को मेहनत और अनुशासन का मॉडल माना जाता था। लेकिन अब उसी लातूर का नाम पेपर लीक, कोचिंग माफिया और शिक्षा के कारोबारीकरण से जोड़ा जा रहा है।

यह ट्यूशन का वही इलाका है जहां इससे पहले ट्यूशन क्षेत्र से जुड़े एक प्रोफेसर अविनाश चव्हाण की हत्या जैसी घटनाएं भी सामने आ चुकी हैं। यानी शिक्षा का क्षेत्र धीरे-धीरे प्रतिस्पर्धा, पैसे और अपराध के खतरनाक गठजोड़ में बदलता दिखाई दे रहा है। अब सबसे बड़ा और असहज सवाल यह है कि क्या RCC जैसी संस्थाओं से वर्षों से आने वाली टॉप रैंक के पीछे केवल “बेहतरीन पढ़ाई” थी, या फिर कोई संगठित अंदरूनी खेल भी चलता रहा था? यदि सीबीआई के आरोप सही साबित होते हैं और “Question Bank” वास्तव में असली पेपर से मेल खा रहे हैं, तो जांच केवल 2026 तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।

बल्कि यह भी जांच होनी चाहिए कि क्या पिछले वर्षों में भी इसी तरह पेपर लीक या अंदरूनी जानकारी का इस्तेमाल हुआ था? क्या कुछ चुनिंदा कोचिंग संस्थानों को पहले से सवाल उपलब्ध कराए जाते थे? क्या टॉप रैंक और असामान्य रिजल्ट्स की स्वतंत्र फॉरेंसिक जांच होगी? क्या RCC से पहले उच्च रैंक लाने वाले छात्रों के रिजल्ट पैटर्न और नेटवर्क की जांच की जाएगी? क्या NTA के भीतर कोई स्थायी भ्रष्ट नेटवर्क काम कर रहा था? यह स्पष्ट होना चाहिए कि किसी छात्र को केवल इसलिए दोषी नहीं माना जा सकता क्योंकि उसने RCC में पढ़ाई की।

लेकिन यदि जांच में यह सामने आता है कि वर्षों से संगठित तरीके से परीक्षा प्रणाली से छेड़छाड़ की जा रही थी, तब निष्पक्ष जांच का दायरा व्यापक होना ही चाहिए। देश का युवा केवल परीक्षा नहीं देता, वह अपना भविष्य दांव पर लगाता है। जब पेपर बिकने लगें, रैंक मैनेज होने लगे और कोचिंग संस्थान सत्ता, सिस्टम और माफिया के गठजोड़ में बदल जाएं, तब सबसे बड़ा नुकसान केवल छात्रों का नहीं बल्कि देश की मेरिट व्यवस्था का होता है।

आज जरूरत किसी सांप्रदायिक नैरेटिव की नहीं, बल्कि इस पूरे शिक्षा माफिया की जड़ तक पहुंचने की है। क्योंकि अगर डॉक्टर बनने का रास्ता ही भ्रष्टाचार से तय होगा, तो आने वाले समय में देश की स्वास्थ्य व्यवस्था किसके हाथों में जाएगी, यह सवाल हर नागरिक को परेशान करना चाहिए। मामला केवल कुछ लोगों की गिरफ्तारी का नहीं है। सवाल यह है कि आखिर भारत की सबसे महत्वपूर्ण परीक्षाओं में से एक NEET बार-बार लीक कैसे हो रही है? लाखों छात्र दिन-रात मेहनत करते हैं, परिवार कर्ज लेकर कोचिंग फीस भरते हैं, बच्चे मानसिक दबाव में जीते हैं, लेकिन हर साल पेपर लीक माफिया उनकी मेहनत को बाजार में बेच देता है।

करीब 23 लाख छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ हुआ। लेकिन केंद्र सरकार और NTA की जवाबदेही तय करने की बजाय हर बार मामले को कुछ गिरफ्तारियों तक सीमित कर दिया गया। पिछले कई वर्षों में प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर लीक होते रहे, NEET, भर्ती परीक्षाएं, राज्य स्तरीय एग्जाम, लेकिन क्या कोई ऐसी कठोर राष्ट्रीय व्यवस्था बनाई गई जिसने  इस माफिया की रीढ़ तोड़ी हो? भाजपा सरकार “डिजिटल इंडिया”, “न्यू इंडिया” और “विश्वगुरु” की बात करती है, लेकिन परीक्षा सुरक्षा जैसी बुनियादी व्यवस्था भी सुरक्षित नहीं रख पाई। जिन छात्रों ने वर्षों की मेहनत की, वे आज खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।

अब बात करते हैं भक्तों से -देश में जब भी किसी अपराध में मुसलमानों का नाम आता है, तब सोशल मीडिया की आईटी सेल, तथाकथित “भक्त” इकोसिस्टम और गोदी मीडिया उसे किसी न किसी “जिहाद” से जोड़ने में देर नहीं लगाते। कभी “लव जिहाद”, कभी “थूक जिहाद”, कभी “लैंड जिहाद” पिछले दिनों कॉर्पोरेट जिहाद था और अब शायद “नीट जिहाद” भी बना दिया जाता। लेकिन इस बार कहानी अलग है।

सीबीआई की जांच में जिन नामों की चर्चा हो रही है, उनमें शिवराज मोटेगावकर, पी.वी. कुलकर्णी और दूसरे ऐसे लोग शामिल बताए जा रहे हैं जो उस राजनीतिक नैरेटिव में फिट नहीं बैठते, जहां हर अपराध का सांप्रदायिक रंग तैयार रखा जाता है। यही वजह है कि जिस मुद्दे पर प्राइम टाइम स्टूडियो जल उठते, वहां अब असामान्य सन्नाटा दिखाई देता है।

अगर यही आरोप किसी मदरसे के शिक्षक, किसी मुस्लिम कोचिंग संचालक या किसी मुस्लिम प्रोफेसर पर लगे होते, तो टीवी चैनलों की हेडलाइन शायद “Education Jihad”, “NEET Jihad” और “देश के भविष्य पर हमला” जैसी होतीं। सोशल मीडिया पर नफरत का तूफान खड़ा कर दिया जाता। लेकिन अब जबकि आरोपों के केंद्र में कुलकर्णी और मोटेगावकर जैसे नाम हैं, तो बहस का फोकस अचानक “व्यवस्था की खामी” तक सीमित हो गया है।

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