पश्चिम एशिया में शुरू हुई जंग का असर अब सिर्फ मिसाइलों और सैन्य ठिकानों तक सीमित नहीं रहा। इसका कंपन हजारों किलोमीटर दूर भारत की रसोई तक महसूस होने लगा है। होटल-रेस्तरां में एलपीजी की कमी, व्यावसायिक सिलेंडरों की आपूर्ति पर रोक और पुणे में गैस आधारित शवदाह गृहों का अस्थायी बंद होना इस बात का संकेत है कि वैश्विक युद्ध का आर्थिक और मानवीय असर किस तेजी से आम लोगों की ज़िंदगी में उतरता है। यह सिर्फ गैस की कमी की खबर नहीं है, बल्कि वैश्विक ऊर्जा राजनीति की वह सच्चाई है, जिसका बोझ अंततः आम नागरिकों को उठाना पड़ता है। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
जंग की आग और ऊर्जा की नसें
28 फरवरी को जब अमरीका और इज़राइल ने ईरान के सैन्य ठिकानों पर हमला किया, तब दुनिया ने इसे एक और क्षेत्रीय सैन्य टकराव माना। लेकिन पश्चिम एशिया कोई सामान्य भूभाग नहीं है बल्कि यह दुनिया की ऊर्जा धमनियों का केंद्र है। वैश्विक तेल और गैस का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से आता है। दुनिया के सबसे अहम समुद्री व्यापार मार्ग यहीं से गुजरते हैं। और ऊर्जा बाजार का हर झटका सीधे वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है। इसी कारण युद्ध की आहट के साथ ही ईंधन आपूर्ति श्रृंखला में तनाव शुरू हो गया।
भारत में दिखने लगा पहला झटका
भारत दुनिया के सबसे बड़े ऊर्जा आयातकों में से एक है। देश अपनी ज़रूरत का लगभग 85% कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। ऐसे में पश्चिम एशिया में जंग का असर भारत पर पड़ना लगभग तय था।
रिपोर्टों के अनुसार कई शहरों में एलपीजी सिलेंडर मिलने में 2 से 8 दिन तक का इंतजार। व्यावसायिक गैस सिलेंडरों की आपूर्ति लगभग बंद। होटल, रेस्तरां और उद्योगों पर संकट। तेल कंपनियों ने घरेलू उपभोक्ताओं को प्राथमिकता देते हुए 19 किलोग्राम और उससे बड़े व्यावसायिक सिलेंडरों की सप्लाई रोक दी है। यह कदम अस्थायी हो सकता है, लेकिन इसका आर्थिक असर व्यापक है। जब ईंधन संकट अंतिम संस्कार तक पहुंच गया- इस संकट की सबसे चौंकाने वाली तस्वीर पुणे से सामने आई, जहां गैस आधारित शवदाह गृह अस्थायी रूप से बंद करने पड़े।
पुणे के वैकुंठ धाम जैसे बड़े श्मशान में गैस भट्टियां बंद होने का मतलब सिर्फ तकनीकी समस्या नहीं है बल्कि यह दिखाता है कि ऊर्जा संकट जीवन के अंतिम संस्कार तक को प्रभावित कर सकता है। हालांकि फिलहाल इलेक्ट्रिक शवदाह गृह,
पारंपरिक लकड़ी आधारित चिताएं संचालित हैं, लेकिन यह स्थिति लंबे समय तक बनी रही तो नगर सेवाओं पर भी दबाव बढ़ सकता है।
क्या यह सिर्फ घबराहट है या असली संकट?
सरकार और तेल कंपनियों का कहना है कि देश में गैस की पर्याप्त उपलब्धता है और घबराने की जरूरत नहीं है। लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और संकेत दे रही है: अचानक बढ़ी सिलेंडर बुकिंग। आपूर्ति पर नियंत्रण। व्यावसायिक गैस बंद- यह बताता है कि प्रशासन संभावित संकट को पहले ही नियंत्रित करने की कोशिश कर रहा है। क्योंकि ऊर्जा बाजार में सबसे खतरनाक चीज होती है पैनिक।
अगर जंग लंबी चली तो क्या होगा?
विशेषज्ञों के अनुसार अगर पश्चिम एशिया में युद्ध लंबा खिंचता है तो भारत को तीन बड़े झटके लग सकते हैं: 1. ईंधन की कीमतों में उछाल। तेल की कीमतें बढ़ते ही पेट्रोल, डीज़ल और गैस सब महंगे हो सकते हैं।
2. महंगाई की नई लहर। परिवहन और उत्पादन लागत बढ़ने से खाने-पीने से लेकर रोजमर्रा की चीजें महंगी हो सकती हैं।
3. ऊर्जा सुरक्षा पर दबाव। भारत को वैकल्पिक आपूर्ति स्रोतों की तलाश तेज करनी पड़ेगी। असली सवाल की क्या भारत ऊर्जा के मोर्चे पर सुरक्षित है? यह संकट एक बड़े सवाल को सामने लाता है। भारत एक उभरती हुई आर्थिक शक्ति है, लेकिन उसकी ऊर्जा निर्भरता अभी भी बहुत ज्यादा है। जब तक देश नवीकरणीय ऊर्जा। घरेलू उत्पादन और विविध आयात स्रोत को तेजी से नहीं बढ़ाता, तब तक हर अंतरराष्ट्रीय संकट भारत की रसोई तक पहुंचता रहेगा।
पश्चिम एशिया की जंग सिर्फ मिसाइलों और सैन्य ठिकानों को नष्ट नहीं करती।
उसकी असली कीमत चुकाते हैं रसोई में गैस का इंतजार करते परिवार,
संकट में फंसे छोटे व्यवसाय, और वे शहर जिनके सार्वजनिक तंत्र अचानक ईंधन की कमी से जूझने लगते हैं। और यही वैश्विक राजनीति की सबसे कड़वी सच्चाई है कि जब महाशक्तियां युद्ध लड़ती हैं, तो उसकी कीमत पूरी दुनिया चुकाती है।