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Home»भारत

नमाज़ पर बोलने वाली ज़बान कांवड़ यात्राओं, हथियारों के जुलूसों और डीजे के आतंक पर क्यों खामोश रहती है ?

adminBy adminMay 24, 2026 भारत No Comments5 Mins Read
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भारत की राजनीति में भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं होती, बल्कि सत्ता का संकेत भी होती है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ के हालिया बयान ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या आज शासन और सांप्रदायिक राजनीति के बीच की रेखा जानबूझकर धुंधली की जा रही है? सार्वजनिक स्थानों पर नमाज़ को लेकर दिया गया उनका भाषण केवल “कानून-व्यवस्था” का बयान नहीं था, बल्कि एक गहरे राजनीतिक-सांस्कृतिक संदेश से भरा हुआ वक्तव्य था, जिसे उनके समर्थकों ने तुरंत समझ भी लिया और तालियों के जरिए उसका स्वागत भी किया। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

मुख्यमंत्री ने अपने पूरे भाषण में एक बार भी “मुस्लिम” शब्द का इस्तेमाल नहीं किया, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि उनका पूरा भाषण केवल मुसलमानों और नमाज़ के इर्द-गिर्द घूमता रहा। यह आधुनिक हिंदुत्व राजनीति की एक स्थापित शैली बन चुकी है कि किसी समुदाय का नाम लिए बिना उसे निशाना बनाना, ताकि कानूनी और नैतिक जवाबदेही से बचा जा सके, लेकिन समर्थक वर्ग तक संदेश साफ़-साफ़ पहुंच जाए। यही कारण है कि जैसे ही उन्होंने सड़क पर नमाज़ का ज़िक्र किया, सभा में तालियां गूंज उठीं। यह तालियां किसी प्रशासनिक निर्णय के समर्थन में नहीं थीं, बल्कि उस सांप्रदायिक संकेत की स्वीकृति थीं जिसे श्रोताओं ने तुरंत पहचान लिया।

आदित्यनाथ का यह कहना कि “अगर जगह कम है तो संख्या नियंत्रित करो” केवल जनसंख्या प्रबंधन की सामान्य सलाह नहीं थी। यह वही पुराना हिंदुत्ववादी नैरेटिव है जिसमें मुसलमानों को “बढ़ती आबादी” के रूप में प्रस्तुत कर बहुसंख्यक समाज के भीतर भय और असुरक्षा पैदा की जाती है। दशकों से संघ परिवार का एक बड़ा प्रचार यही रहा है कि मुसलमान जनसंख्या के जरिए देश की “जनसांख्यिकीय संरचना” बदल देंगे।

इसलिए मुख्यमंत्री का यह बयान प्रशासनिक कम और वैचारिक अधिक प्रतीत होता है। उन्होंने सड़क पर नमाज़ को सीधे “मुस्लिम आबादी” से जोड़कर एक धार्मिक प्रथा को जनसंख्या के डर से मिला दिया। दिलचस्प बात यह है कि मुख्यमंत्री ने केवल नमाज़ का जिक्र किया, लेकिन उन धार्मिक आयोजनों का नहीं जिनसे अक्सर लंबे ट्रैफिक जाम, सार्वजनिक अवरोध और हिंसा की घटनाएं जुड़ी रहती हैं।

कांवड़ यात्राओं के दौरान घंटों सड़कें बंद होना, डीजे और हथियारों के साथ जुलूस निकलना, बाजारों में जबरन पहचान पूछना-ये सब पिछले वर्षों में लगातार सुर्खियों में रहे हैं। लेकिन उन पर वही “कानून का राज” लागू होता दिखाई नहीं देता, जिसकी बात नमाज़ के संदर्भ में की गई। यही चयनात्मकता इस पूरे भाषण की राजनीति को उजागर करती है। मुख्यमंत्री की भाषा में एक और महत्वपूर्ण बात ये थी कि “अगर सिस्टम के भीतर रहना है तो नियम मानो।”

यह वाक्य लोकतांत्रिक नागरिकता की अवधारणा पर गंभीर सवाल खड़ा करता है। एक लोकतंत्र में नागरिक राज्य के बराबरी वाले हिस्सेदार होते हैं, लेकिन इस बयान में मुसलमानों को ऐसे प्रस्तुत किया मानो वे “शर्तों पर स्वीकार” किए गए लोग हों, जिन्हें लगातार अपनी वफादारी साबित करनी होगी। यह भाषा नागरिक अधिकारों की नहीं, बल्कि अधीनता की भाषा है। इसमें राज्य खुद को निर्णायक शक्ति और एक समुदाय को संदिग्ध तत्व के रूप में स्थापित करता है।

और जब मुख्यमंत्री कहते हैं कि “प्यार से मानेंगे तो ठीक, नहीं तो दूसरा तरीका अपनाएंगे,” तो यह केवल प्रशासनिक चेतावनी नहीं रह जाती। बल्कि यह शक्ति प्रदर्शन बन जाती है। बरेली का उदाहरण देकर उन्होंने जिस “ताकत” का जिक्र किया, उसने भाषण को और स्पष्ट कर दिया। यहां “हम” और “वे” की रेखा खुलकर दिखाई देती है कि जहां “हम” सत्ता और बहुसंख्यक पहचान का प्रतीक है और “वे” एक ऐसा समुदाय जिसे नियंत्रित किए जाने की आवश्यकता बताई जा रही है।

विडंबना यह है कि जिस दिन मुख्यमंत्री अनुशासन और व्यवस्था का पाठ पढ़ा रहे थे, उसी दिन लखनऊ में हजारों शिक्षक अपनी मांगों को लेकर घुटनों के बल रेंगते हुए प्रदर्शन कर रहे थे। वे सरकार पर आरोप लगा रहे थे कि उनके साथ “कीड़े-मकोड़ों जैसा व्यवहार” किया जा रहा है। लेकिन इस सामाजिक पीड़ा और बेरोजगारी पर वही आक्रामक भाषा सुनाई नहीं देती, जो नमाज़ के सवाल पर दिखाई देती है।

इससे यह सवाल और गहरा हो जाता है कि क्या शासन की प्राथमिकताएं वास्तव में प्रशासनिक हैं, या फिर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण राजनीतिक लाभ का सबसे आसान माध्यम बन चुका है? असल चिंता केवल एक बयान नहीं है। चिंता यह है कि इस तरह की भाषा धीरे-धीरे समाज की सामान्य चेतना का हिस्सा बनती जा रही है। जब किसी समुदाय की धार्मिक प्रथाओं को बार-बार “अराजकता”, “तमाशा” और “बाधा” जैसे शब्दों से जोड़ा जाता है, तो जनता के भीतर उसके प्रति अविश्वास और घृणा पैदा होती है।

यही प्रक्रिया आगे चलकर सामाजिक बहिष्कार, हिंसा और संस्थागत भेदभाव को सामान्य बना देती है। लोकतंत्र की ताकत उसकी विविधता और समान नागरिकता में होती है। लेकिन जब सत्ता खुद नागरिकों को “हम” और “वे” में बांटने लगे, तो कानून-व्यवस्था का विमर्श भी निष्पक्ष नहीं रह जाता। तब प्रशासनिक भाषा के भीतर छिपी राजनीतिक मंशा को समझना और उसके प्रभावों पर सवाल उठाना लोकतंत्र की जिम्मेदारी बन जाता है।

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