वाराणसी से आई एक हालिया ख़बर ने न सिर्फ़ क़ानूनी दायरों में बल्कि सामाजिक और राजनीतिक हलकों में भी गहरी बहस छेड़ दी है। गंगा नदी के बीच नाव पर इफ़्तार करने के आरोप में गिरफ़्तार 14 मुस्लिम युवकों की ज़मानत याचिका का खारिज होना कई सवालों को जन्म देता है। क्या यह महज़ क़ानून का सख़्त पालन है, या इसके पीछे कोई और परत भी छिपी हुई है? अदालत ने अपने आदेश में आरोपों को ‘गंभीर’ और ‘ग़ैर-जमानती’ बताया है। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
पुलिस ने जिन धाराओं के तहत मामला दर्ज किया है, उनमें धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने से लेकर जल प्रदूषण और आईटी एक्ट तक शामिल हैं। लेकिन सबसे अहम सवाल यह है कि क्या इन आरोपों का आधार ठोस है, या यह मामला परिस्थितियों और पहचान से प्रभावित हो रहा है? आरोपियों के वकील का कहना है कि न तो कोई मांस बरामद हुआ और न ही किसी वीडियो में उन्हें ऐसा करते हुए स्पष्ट रूप से देखा गया है।
अगर ऐसा है, तो फिर इतनी कठोर धाराओं का प्रयोग क्या न्यायसंगत है? क्या केवल आरोपों के आधार पर किसी को इतनी गंभीर धाराओं में फँसाया जा सकता है? यहाँ एक और महत्वपूर्ण पहलू सामने आता है कि क्या इन युवकों के साथ सख़्ती सिर्फ़ इसलिए बरती गई क्योंकि वे मुसलमान हैं? यह सवाल इसलिए भी उठता है क्योंकि हमारे देश में कई बार क़ानून का इस्तेमाल समान रूप से नहीं, बल्कि चयनात्मक रूप से होता हुआ दिखाई देता है।
गंगा, जिसे करोड़ों लोग माँ का दर्जा देते हैं, उसकी पवित्रता का सवाल निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है। लेकिन क्या यह पवित्रता सिर्फ़ कुछ घटनाओं तक सीमित है? हक़ीक़त यह है कि गंगा में हर रोज़ करोड़ों लीटर गंदा पानी छोड़ा जाता है। देश के कई बड़े शहरों के नाले सीधे गंगा में गिरते हैं। औद्योगिक कचरा, सीवर का पानी, प्लास्टिक, पूजा सामग्री सब कुछ इस पवित्र नदी में बेहिचक डाला जाता है। इतना ही नहीं, कई स्थानों पर अधजले शव और लाशें भी गंगा में बहाई जाती हैं। ये सब सालों से हो रहा है।
सवाल यह है कि क्या कभी इन मुद्दों पर उसी तरह का आक्रोश देखने को मिला, जैसा इस इफ़्तार मामले में दिखाई दे रहा है? क्या कभी उन नगर निगमों, उद्योगों या व्यवस्थाओं पर वैसी ही सख़्ती की गई, जो रोज़ गंगा को प्रदूषित करते हैं? अगर गंगा की पवित्रता वाकई चिंता का विषय है, तो फिर यह चिंता हर प्रकार के प्रदूषण पर समान रूप से क्यों नहीं दिखती? क्यों एक विशेष समुदाय से जुड़े मामले अचानक ‘आस्था’ का प्रश्न बन जाते हैं, जबकि बड़े पैमाने पर हो रहे प्रदूषण पर चुप्पी साध ली जाती है? यह मामला सिर्फ़ 14 युवकों की ज़मानत का नहीं है, बल्कि यह हमारे न्याय और सामाजिक दृष्टिकोण का आईना है।
क्या हम सच में क़ानून के राज में विश्वास करते हैं, या फिर भावनाओं और पहचान के आधार पर फैसले लेने लगे हैं? ज़रूरत इस बात की है कि जांच निष्पक्ष हो, सबूतों के आधार पर हो और क़ानून सबके लिए समान रूप से लागू हो। आस्था का सम्मान हो, लेकिन उसके नाम पर किसी के साथ अन्याय न हो। क्योंकि अगर न्याय में संतुलन नहीं रहा, तो समाज में विश्वास भी नहीं बचेगा।