मथुरा के कोसी कलां में हुई एक मौत ने फिर वही पुराने सवाल हमारे सामने खड़े कर दिए हैं कि क्या हम एक कानून-आधारित समाज की ओर बढ़ रहे हैं, या भावनाओं, अफवाहों और भीड़ के दबाव में फैसले लेने वाली व्यवस्था की तरफ? कथित ‘गोरक्षक’ चंद्रशेखर उर्फ ‘फरसा वाले बाबा’ की मौत के बाद जो कुछ हुआ, वह सिर्फ एक स्थानीय घटना नहीं है, बल्कि देश में पिछले कुछ वर्षों से बन रहे एक खतरनाक ट्रेंड का हिस्सा है।
एक तरफ पुलिस इसे साफ तौर पर सड़क दुर्घटना बता रही है, वहीं दूसरी तरफ स्थानीय समूह इसे ‘सुनियोजित हमला’ कहकर सड़कों पर उतर आते हैं। सच क्या है यह जांच का विषय हो सकता है, लेकिन उससे पहले जो हुआ, वह ज्यादा चिंताजनक है। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
‘गोरक्षा’ या कानून अपने हाथ में लेने की प्रवृत्ति?
भारत में ‘गोरक्षा’ का मुद्दा संवेदनशील जरूर है, लेकिन इसका इस्तेमाल कई बार कानून से ऊपर खुद को स्थापित करने के औजार के रूप में होता दिखा है। सवाल यह है कि आधी रात को किसी वाहन को रोकने का अधिकार किसके पास है? अगर हर व्यक्ति खुद को ‘रक्षक’ मानकर सड़क पर उतर जाएगा, तो कानून और अराजकता के बीच की रेखा कहाँ बचेगी? यह घटना भी उसी मानसिकता की उपज लगती है, जहाँ संदेह के आधार पर कार्रवाई की जाती है, बिना किसी आधिकारिक अधिकार के।
अफवाह बनाम तथ्य: सच्चाई की पहली हत्या
घटना के तुरंत बाद ‘पशु तस्करी’ और ‘सुनियोजित हत्या’ की कहानी फैलना शुरू हो गई। जबकि पुलिस के शुरुआती बयान में साफ कहा गया कि: जिस वाहन को रोका गया, उसमें किराना सामान था, पीछे से आ रहा ट्रक तारों से भरा था, घना कोहरा दुर्घटना की वजह बना। यहाँ सबसे बड़ा सवाल मीडिया और समाज दोनों से है कि क्या हम तथ्यों के सामने आने का इंतजार करते हैं, या पहले से तय नैरेटिव को ही सच मान लेते हैं?
भीड़ का गुस्सा: न्याय या दबाव की राजनीति?
घटना के बाद जिस तरह शव को हाईवे पर रखकर जाम लगाया गया, पत्थरबाज़ी हुई और पुलिस को आंसू गैस का इस्तेमाल करना पड़ा यह बताता है कि भीड़ अब सिर्फ विरोध नहीं करती, बल्कि व्यवस्था को चुनौती देने लगी है। भीड़ का यह रूप खतरनाक इसलिए है क्योंकि: यह जांच को प्रभावित करता है। प्रशासन पर दबाव बनाता है और कई बार निर्दोष लोगों को भी आरोपी बना देता है।
सरकार की प्रतिक्रिया: सख्ती का संदेश या संतुलन की जरूरत?
योगी आदित्यनाथ ने सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए हैं, यह एक सामान्य प्रशासनिक प्रतिक्रिया है लेकिन असली चुनौती सिर्फ दोषियों को पकड़ना नहीं, बल्कि उस माहौल को नियंत्रित करना है जहाँ हर घटना को तुरंत सांप्रदायिक या साजिश का रंग दे दिया जाता है। सरकार को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि: कोई भी समूह कानून अपने हाथ में न ले और अफवाह फैलाने वालों पर भी उतनी ही सख्ती हो जितनी अपराधियों पर
बड़ा सवाल: हम किस दिशा में जा रहे हैं?
मथुरा की यह घटना एक आईना है। इसमें तीन तस्वीरें साफ दिखती हैं: कानून से ऊपर उठते ‘स्वयंभू रक्षक’। तथ्यों से पहले फैलती अफवाहें और हर घटना पर भड़कती भीड़। अगर यह सिलसिला यूँ ही चलता रहा, तो हर दुर्घटना, हर झड़प और हर संदेह एक बड़े टकराव में बदल सकता है।
न्याय की राह कानून से ही गुजरती है
किसी भी मौत की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए, यह पीड़ित के प्रति न्याय का पहला कदम है लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है यह समझना कि न्याय का रास्ता सड़क से नहीं, कानून से होकर जाता है। मथुरा की यह घटना सिर्फ एक केस नहीं, बल्कि एक चेतावनी है, अगर समाज ने भावनाओं को तथ्यों पर और भीड़ को कानून पर हावी होने दिया, तो नुकसान सिर्फ एक पक्ष का नहीं, पूरे देश का होगा।