Close Menu
Elaan NewsElaan News
  • Elaan Calender App
  • एलान के बारे में
  • विदेश
  • भारत
  • महाराष्ट्र
  • एलान विशेष
  • लेख / विचार
Letest

अगर अदालतों के पास भी नागरिकों की चींख सुनने का समय नहीं, तो मजलूम आखिर जाएं कहां?

July 26, 2026

गुजरात में “कट्टरतावाद विरोधी पथक”की स्थापना…

July 26, 2026

मतदाता सूची से नाम हटना नागरिकता खत्म होना नहीं- सुप्रीम कोर्ट

July 26, 2026
Facebook X (Twitter) Instagram
Trending
  • अगर अदालतों के पास भी नागरिकों की चींख सुनने का समय नहीं, तो मजलूम आखिर जाएं कहां?
  • गुजरात में “कट्टरतावाद विरोधी पथक”की स्थापना…
  • मतदाता सूची से नाम हटना नागरिकता खत्म होना नहीं- सुप्रीम कोर्ट
  • बिना नेम प्लेट और नंबर वाले ये लोग कौन हैं? पुलिस की वर्दी में छिपे चेहरों का सच सामने आना चाहिए
  • सवाल एक अनशन का नहीं, पूरी शिक्षा व्यवस्था की जवाबदेही का है
  • ग़ैरों पे करम-अपनों पे सितम? पाकिस्तान को नसीहत देने से पहले भारत को भी आईना देखने की ज़रूरत
  • जब जज का नाम इंसाफ़ से बड़ा बना दिया जाए, तो समझ लीजिए संविधान कठघरे में खड़ा है
  • मतदाता सूची या लोकतंत्र की सूची? चुनाव आयोग पर उठते सवालों का जवाब अब जरूरी है
Facebook Instagram YouTube
Elaan NewsElaan News
Subscribe
Thursday, July 30
  • Elaan के बारे में
  • भारत
  • महाराष्ट्र
  • विदेश
  • Elaan विशेष
  • लेख विचार
  • ई-पेपर
  • कैलेंडर App
  • Video
  • हिन्दी
    • English
    • हिन्दी
    • اردو
Elaan NewsElaan News
Home»भारत

कानून, “गौ-रक्षा” और बढ़ता भय: क्या मुसलमानों को निशाना बनाने का माध्यम बन चुका है पूरा तंत्र?

adminBy adminMay 27, 2026 भारत No Comments6 Mins Read
Facebook Twitter Pinterest LinkedIn Tumblr Email WhatsApp Copy Link
Share
Facebook Twitter LinkedIn Pinterest Email WhatsApp

देश में बकरईद से पहले जिस तरह का राजनीतिक और प्रशासनिक माहौल बनाया जा रहा है, उसने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या कानून का इस्तेमाल वास्तव में व्यवस्था बनाए रखने के लिए हो रहा है, या फिर एक खास समुदाय को लगातार डर और संदेह के घेरे में रखने के लिए? गुजरात में गोहत्या के आरोप में हिरासत में लिए गए 64 वर्षीय ज़हीर शेख की मौत और दिल्ली में बकरईद से पहले सरकार की सख्त चेतावनियां-इन दोनों घटनाओं को केवल प्रशासनिक कार्रवाई मानकर नहीं देखा जा सकता। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

ये उस व्यापक राजनीतिक माहौल का हिस्सा दिखाई देती हैं, जिसमें मुसलमानों की धार्मिक पहचान, खान-पान और परंपराओं को लगातार अपराध, संदेह और राष्ट्रभक्ति की कसौटी पर कसा जा रहा है। अहमदाबाद में ज़हीर शेख की मौत ने हिरासत में यातना और पुलिस की जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। परिवार का आरोप है कि उन्हें हिरासत में बेरहमी से पीटा गया, उनकी दाढ़ी खींची गई और गुप्तांगों पर हमला किया गया। यदि ये आरोप सही हैं, तो यह केवल पुलिस क्रूरता नहीं बल्कि संविधान और इंसानी गरिमा पर सीधा हमला है।

सबसे भयावह बात यह है कि जिस मांस को लेकर कार्रवाई हुई, उसके गोमांस होने की पुष्टि तक नहीं हुई थी। यानी संदेह ही सज़ा बन गई। यह घटना कोई अकेली घटना नहीं लगती। पिछले कुछ वर्षों में देशभर में “गौ-रक्षा” के नाम पर कथित हिंदुत्ववादी भीड़ द्वारा पशु व्यापारियों, ट्रांसपोर्टरों और मुस्लिम युवकों की पिटाई और हत्याओं की कई घटनाएं सामने आ चुकी हैं। कहीं सड़क पर ट्रकों को रोककर लोगों को पीटा गया, कहीं भीड़ ने “गौ-तस्करी” का आरोप लगाकर हत्या कर दी।

कई मामलों में बाद में यह तक साबित नहीं हो पाया कि जिन लोगों पर आरोप लगाए गए थे, वे किसी गैरकानूनी गतिविधि में शामिल भी थे या नहीं। इसके बावजूद भीड़ खुद ही पुलिस, अदालत और जल्लाद की भूमिका निभाती दिखाई देती है। सबसे गंभीर चिंता यह है कि ऐसी घटनाओं में अक्सर सत्ताधारी राजनीति की चुप्पी या नरमी दिखाई देती है। कई बार आरोप यह भी लगे कि पुलिस पीड़ितों की सुरक्षा करने के बजाय उन्हीं के खिलाफ मुकदमे दर्ज करती है। अब गुजरात की घटना में परिवार यह आरोप लगा रहा है कि भीड़ नहीं बल्कि खुद पुलिस हिरासत में प्रताड़ना देकर मौत का कारण बनी।

यदि कानून लागू करने वाली एजेंसियों पर ही ऐसे आरोप लगने लगें, तो लोकतंत्र में नागरिक सुरक्षा का भरोसा कमजोर पड़ने लगता है। इसी पृष्ठभूमि में अब मुस्लिम समाज के भीतर यह बहस भी तेज़ हो रही है कि क्या पशु व्यापार से जुड़े लोगों को अपनी सुरक्षा और कानूनी संरक्षण के लिए सामूहिक व्यवस्था खड़ी करनी चाहिए, या फिर पूरी तरह गाय और गौवंश से जुड़े व्यापार से दूरी बना लेनी चाहिए, ताकि उन्हें लगातार हिंसा, झूठे आरोपों और पुलिस कार्रवाई का सामना न करना पड़े।

कई सामाजिक कार्यकर्ता यह भी कह रहे हैं कि जब किसी व्यापार से जुड़े लोगों की जान और सम्मान सुरक्षित नहीं रह गया है, तब उस व्यापार को छोड़ देना मजबूरी बन सकता है। इसके साथ ही एक और सवाल उठाया जा रहा है कि यदि देश में गाय को लेकर इतनी संवेदनशीलता दिखाई जाती है, तो फिर बीफ निर्यात से जुड़ी बड़ी कंपनियों पर कार्रवाई क्यों नहीं होती? मुस्लिम संगठनों और कुछ सामाजिक समूहों की ओर से यह मांग भी उठ रही है कि केवल छोटे व्यापारियों और गरीब पशु कारोबारियों को निशाना बनाने के बजाय सरकार को देश में चल रहे बड़े पैमाने के बीफ निर्यात कारोबार पर भी समान नीति अपनानी चाहिए।

इस संबंध में कई लोग देशव्यापी अभियान चलाने और बीफ निर्यात कंपनियों को बंद करने की मांग उठाने की बात कर रहे हैं। इसी क्रम में कुछ मुस्लिम संगठनों और सामाजिक प्रतिनिधियों द्वारा गाय को “राष्ट्रीय पशु” घोषित करने की मांग भी सामने रखी जा रही है। उनका तर्क है कि यदि गाय को लेकर देश में इतना व्यापक राजनीतिक और धार्मिक माहौल बनाया जा चुका है, तो सरकार को स्पष्ट नीति अपनाते हुए इसे कानूनी रूप देना चाहिए, ताकि दोहरे मानदंड और चयनात्मक कार्रवाई की राजनीति समाप्त हो ।

यह मांग अब विभिन्न राज्यों में सार्वजनिक बहस का विषय बनती जा रही है और इसे राष्ट्रीय स्तर पर उठाने की बात कही जा रही है। दूसरी ओर दिल्ली में बकरईद से पहले सरकार द्वारा जारी निर्देशों को देखें तो प्रशासनिक भाषा के पीछे राजनीतिक संदेश साफ दिखाई देता है। सार्वजनिक स्थलों पर कुर्बानी रोकने, अवैध पशु व्यापार पर कार्रवाई और स्वच्छता बनाए रखने की बातें अपने आप में गलत नहीं हैं। किसी भी सरकार को कानून व्यवस्था बनाए रखने का अधिकार है। लेकिन जब इन्हें लगातार एक खास समुदाय की धार्मिक प्रथाओं से जोड़कर प्रचारित किया जाता है, तब यह महज़ प्रशासनिक कार्रवाई नहीं रह जाती।

दिल्ली सरकार में मंत्री कपिल मिश्रा का बयान भी उसी राजनीति का हिस्सा प्रतीत होता है, जिसमें मुसलमानों की धार्मिक गतिविधियों को “समस्या” की तरह प्रस्तुत किया जाता है। यही कारण है कि ऐसे बयानों का स्वागत तुरंत हिंदुत्व संगठनों द्वारा “हिंदू भावनाओं की रक्षा” के रूप में किया जाता है। इससे यह संदेश जाता है कि राज्य अब तटस्थ संवैधानिक संस्था के बजाय बहुसंख्यक धार्मिक भावनाओं का संरक्षक बनता जा रहा है।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का “प्यार से मानेंगे, नहीं मानेंगे तो दूसरा तरीका अपनाएंगे” वाला बयान भी इसी माहौल को और कठोर बनाता है। प्रशासनिक भाषा में कही गई ऐसी बातें जब सत्ता के सर्वोच्च पदों से आती हैं, तो वे समाज में भय और विभाजन की भावना को गहरा करती हैं।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि अब मुसलमानों की धार्मिक पहचान से जुड़े लगभग हर मुद्दे-नमाज़, कुर्बानी, पशु व्यापार, खान-पान को कानून व्यवस्था और राष्ट्रवाद की बहस में बदल दिया गया है। इससे आम लोगों के बीच भी यह धारणा बनाई जाती है कि मुसलमान “विशेष निगरानी” के योग्य समुदाय हैं। यही सोच भीड़ हिंसा और पुलिस क्रूरता दोनों को अप्रत्यक्ष समर्थन देती है।

भारत का संविधान राज्य को धार्मिक स्वतंत्रता और समान नागरिक अधिकारों की गारंटी देता है। यदि किसी व्यक्ति ने अपराध किया है तो उसके खिलाफ निष्पक्ष कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन हिरासत में यातना, भीड़ हिंसा, सार्वजनिक अपमान और सांप्रदायिक उकसावे को कभी भी कानून का विकल्प नहीं बनाया जा सकता।

आज सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भारत ऐसा लोकतंत्र बना रहेगा जहां कानून नागरिकों की रक्षा करेगा, या फिर वह एक ऐसा औज़ार बन जाएगा जिसका इस्तेमाल पहचान और आस्था के आधार पर डर पैदा करने के लिए किया जाएगा। गुजरात से दिल्ली तक की घटनाएं इसी गहरी चिंता की ओर इशारा करती हैं।

Read Next :

क़ुरबानी से ‘मॉब लिंचिंग’ तक  राजनीति का सबसे बड़ा हथियार बन गई गाय

Share. Facebook Twitter Pinterest LinkedIn Tumblr Email WhatsApp Copy Link
admin
  • Website

Keep Reading

मतदाता सूची से नाम हटना नागरिकता खत्म होना नहीं- सुप्रीम कोर्ट

सवाल एक अनशन का नहीं, पूरी शिक्षा व्यवस्था की जवाबदेही का है

जब जज का नाम इंसाफ़ से बड़ा बना दिया जाए, तो समझ लीजिए संविधान कठघरे में खड़ा है

मतदाता सूची या लोकतंत्र की सूची? चुनाव आयोग पर उठते सवालों का जवाब अब जरूरी है

विश्वविद्यालय शिक्षा के केंद्र हैं या वैचारिक प्रयोगशाला?

क्या गौ-रक्षा के नाम पर हत्या करना धर्म है ?

Add A Comment
Leave A Reply Cancel Reply

Latest Post
  • अगर अदालतों के पास भी नागरिकों की चींख सुनने का समय नहीं, तो मजलूम आखिर जाएं कहां?
  • गुजरात में “कट्टरतावाद विरोधी पथक”की स्थापना…
  • मतदाता सूची से नाम हटना नागरिकता खत्म होना नहीं- सुप्रीम कोर्ट
  • बिना नेम प्लेट और नंबर वाले ये लोग कौन हैं? पुलिस की वर्दी में छिपे चेहरों का सच सामने आना चाहिए
  • सवाल एक अनशन का नहीं, पूरी शिक्षा व्यवस्था की जवाबदेही का है
Categories
  • Uncategorized
  • एलान विशेष
  • धर्म
  • भारत
  • महाराष्ट्र
  • लातुर
  • लेख विचार
  • विदेश
  • विशेष
Instagram

elaannews

📺 | हमारी खबर आपका हौसला
⚡️
▶️ | NEWS & UPDATES
⚡️
📩 | elaannews1@gmail.com
⚡️

मैं अब ज़्यादा दिनों तक नहीं रहूँगा, क्योंकि  देवेंद्र फडणवीस ने मुझे खत्म करने की साज़िश रची है। लेकिन जब तक मेरे अंदर जान है, तब तक मैं सवाल पूछता ही रहूँगा। मैं किसान की औलाद हूँ, इस मिट्टी में क्रांति करके ही दम लूँगाl#elaannews #breakingnews #devendrafadanvis #ravirajsabalepatil #kisan
बारामती के सरकारी अस्पताल को अजित पवार का नाम देने के विरोध में, निषेध करने के लिए ओबीसी नेता  लक्ष्मण हाके बारामती जाएंगे। #elaanews #breakingnews #ajitpawarnews #baramati #lakshmanhake
गिरीराज सिंह(बीजेप गिरीराज सिंह(बीजेपी सांसद) का बयान:"राहुल गांधी की ब्रेन मैपिंग होनी चाहिए। वह झूठ के ठेकेदार बन गए हैं।"— गिरीराज सिंह, बीजेपी सांसद, ने राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए कहा। #elaanews #breakingnews #rahullgandhi #girirajsingh #bjppolitics
"समय आने पर लाडकी बह "समय आने पर लाडकी बहनों की सहायता राशि 1500 रुपये से बढ़ाकर 2100 रुपये कर देंगे, बस कोर्ट मत जाइए!"#elaannews #breakingnews #devendrafadanvis #ladkibahinyojna #maharashra
Follow on Instagram
Facebook X (Twitter) Pinterest Vimeo WhatsApp TikTok Instagram

News

  • महाराष्ट्र
  • भारत
  • विदेश
  • एलान विशेष
  • लेख विचार
  • धर्म

Subscribe to Updates

Get the latest creative news from FooBar about art, design and business.

© 2024 Your Elaan News | Developed By Durranitech
  • Privacy Policy
  • Terms
  • Accessibility