अंतरराष्ट्रीय राजनीति में शब्द कभी-कभी गोलियों से भी ज़्यादा असरदार होते हैं। हाल ही में अमेरिकी ट्रेज़री सचिव के उस बयान ने भारत की विदेश नीति और संप्रभुता पर तीखी बहस छेड़ दी है, जिसमें कहा गया कि अमेरिका ने भारतीय रिफाइनरियों को रूसी तेल खरीदने के लिए 30 दिन की ‘अनुमति’ दी है। सवाल सिर्फ तेल का नहीं है बल्कि सवाल यह है कि क्या भारत को अपनी ऊर्जा ज़रूरतों के लिए भी किसी दूसरे देश की मंज़ूरी चाहिए? एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
‘अनुमति’ शब्द ने क्यों पैदा किया राजनीतिक तूफान
अमेरिकी ट्रेज़री सचिव Scott Bessent ने कहा कि वैश्विक तेल आपूर्ति बनाए रखने के लिए भारतीय रिफाइनरियों को रूसी तेल खरीदने की 30 दिनों की अस्थायी छूट दी जा रही है।
लेकिन विपक्ष का कहना है कि यह बयान सिर्फ एक तकनीकी घोषणा नहीं, बल्कि भारत की विदेश नीति की कमजोरी का प्रतीक बन गया है। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने इसे “एक समझौता कर चुके व्यक्ति की विदेश नीति” बताया, जबकि आम आदमी पार्टी के प्रमुख अरविन्द केजरीवाल ने पूछा कि “अमेरिका कौन होता है भारत को अनुमति देने वाला?” यानी बहस अब कूटनीति से निकलकर राष्ट्रीय स्वाभिमान तक पहुंच चुकी है।
असल मामला क्या है?
यूक्रेन युद्ध के बाद रूस पर पश्चिमी प्रतिबंध लगे। इसके बावजूद भारत ने सस्ती कीमत पर रूस से तेल खरीदना जारी रखा, क्योंकि भारत की ऊर्जा ज़रूरतें बहुत बड़ी हैं। लेकिन पश्चिमी वित्तीय प्रतिबंधों और बीमा नियमों के कारण रूसी तेल के भुगतान और परिवहन पर कई तरह की बाधाएं हैं। ऐसे में अमेरिकी ट्रेज़री समय-समय पर कुछ छूट (waivers) देता है ताकि वैश्विक बाजार में तेल की कमी न हो। तकनीकी तौर पर यह प्रतिबंधों के नियमों के भीतर दी गई छूट है, लेकिन राजनीतिक तौर पर यह ऐसा प्रतीत होता है जैसे भारत को अनुमति दी जा रही हो और यही भाषा विवाद की जड़ है।
मोदी सरकार पर विपक्ष के बड़े आरोप
विपक्ष का कहना है कि प्रधानमंत्री मोदी की विदेश नीति “रणनीतिक स्वायत्तता” से हटकर अमेरिका-केंद्रित हो गई है।
आरोपों के मुख्य बिंदु: १. संप्रभुता पर सवाल- विपक्ष का कहना है कि अगर अमेरिका तय करेगा कि भारत किससे तेल खरीदे, तो यह स्वतंत्र विदेश नीति नहीं कहलाएगी।
२. ट्रंप के सामने झुकने का आरोप- विपक्षी नेताओं का आरोप है कि मोदी सरकार अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प के दबाव में है।
३. रणनीतिक स्वायत्तता का क्षरण- तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन ने कहा कि भारत की परंपरागत स्वतंत्र विदेश नीति से समझौता होता दिख रहा है।
४. विवादित एपस्टीन कनेक्शन का जिक्र- कुछ विपक्षी नेताओं ने पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंघ का नाम कथित जेफ्री एपीस्टीन ईमेल विवाद से जोड़कर भी सवाल उठाए।
क्या सचमुच भारत ‘वसाल स्टेट’ बन गया है?
राजनीतिक बयानबाज़ी से हटकर अगर स्थिति को देखें, तो तस्वीर थोड़ी जटिल है। भारत आज भी रणनीतिक संतुलन की नीति अपनाता है: रूस से सस्ता तेल खरीदना जारी। अमेरिका के साथ रक्षा और तकनीकी साझेदारी। खाड़ी देशों के साथ ऊर्जा संबंध। यानी भारत कोशिश करता है कि हर शक्ति केंद्र से संबंध बनाए रखे। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के कारण भारत को अमेरिकी वित्तीय तंत्र से होकर गुजरना पड़ता है और वही तंत्र छूट या अनुमति की भाषा इस्तेमाल करता है।
इस पूरे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या भारत वास्तव में अमेरिकी अनुमति पर निर्भर हो रहा है, या सिर्फ अमेरिकी प्रतिबंधों की तकनीकी भाषा का शिकार है?
कूटनीतिक विश्लेषकों के अनुसार: अगर भारत रूसी तेल खरीदना बंद कर दे, तो उसे महंगा तेल खरीदना पड़ेगा। अगर वह खरीद जारी रखता है, तो उसे पश्चिमी वित्तीय नियमों से जूझना पड़ता है। यानी भारत एक जियोपॉलिटिकल संतुलन की रस्सी पर चल रहा है। बड़ा सवाल जो इस विवाद से उठा- इस पूरे घटनाक्रम ने एक असहज लेकिन जरूरी सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या 21वीं सदी में भी वैश्विक आर्थिक व्यवस्था इतनी अमेरिकी-केंद्रित है कि एक संप्रभु देश की ऊर्जा नीति भी उससे प्रभावित हो सकती है?
और अगर ऐसा है, तो भारत जैसे बड़े देश के लिए असली चुनौती यह है कि वह सिर्फ तेल ही नहीं, बल्कि वित्तीय और रणनीतिक स्वतंत्रता भी हासिल करे। रूसी तेल पर अमेरिकी “अनुमति” वाला बयान शायद एक कूटनीतिक औपचारिकता हो, लेकिन इसने भारत की विदेश नीति, संप्रभुता और वैश्विक शक्ति संतुलन पर गंभीर बहस छेड़ दी है। अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि भारत तेल कहां से खरीदेगा बल्कि सवाल यह है कि क्या भारत अपनी विदेश नीति खुद तय करेगा, या वैश्विक ताकतों के दबाव में?