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Home»एलान विशेष

जमानत पर बाहर आए जुनैद–नासिर के हत्यारे मोनू मानेसर का ढोल-नगाड़ों से स्वागत

adminBy adminMarch 25, 2026 एलान विशेष No Comments4 Mins Read
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हरियाणा–राजस्थान की सीमा पर हुआ जुनैद–नासिर हत्याकांड एक बार फिर सुर्खियों में है। करीब ढाई साल जेल में रहने के बाद इस मामले के मुख्य आरोपी मोनू मानेसर को राजस्थान हाईकोर्ट से जमानत मिल गई और जैसे ही वह जेल से बाहर आया, उसके गांव में जिस तरह ढोल-नगाड़ों और फूलमालाओं के साथ उसका स्वागत हुआ, उसने पूरे देश में एक नई बहस छेड़ दी है। सवाल सिर्फ जमानत का नहीं है। सवाल यह है कि क्या भारत में भीड़ द्वारा किए गए अपराध अब “नायकत्व” में बदल रहे हैं? एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

 दो जली हुई लाशें और देश को झकझोर देने वाली घटना

16 फरवरी 2023 को राजस्थान के भरतपुर के रहने वाले जुनैद (35) और नासिर (27) अचानक लापता हो गए। कुछ घंटों बाद हरियाणा के भिवानी जिले में एक गाड़ी के अंदर दो जले हुए शव मिले। फॉरेंसिक जांच में पुष्टि हुई कि: शव जुनैद और नासिर के ही थे। गाड़ी में खून और जलने के निशान मिले। हत्या 14–15 फरवरी की रात में की गई। परिजनों का आरोप था कि दोनों को गौ तस्करी के शक में पकड़कर हिंदुत्ववादी गुंडे मोनू मानेसर ने अन्य गुंडों के साथ मिलकर अगवा किया और जिंदा जला दिया। यहीं से यह मामला साधारण हत्या से निकलकर सांप्रदायिक तनाव और “गौ-रक्षा राजनीति” से जुड़ गया।

 कौन है मोनू मानेसर और क्यों है विवाद ?

मोनू मानेसर लंबे समय से स्वयंभू गौ-रक्षक नेटवर्क से जुड़ा बताया जाता रहा है। सोशल मीडिया पर उसकी पहचान ऐसे व्यक्ति की रही है जो गौ तस्करी रोकने के नाम पर अभियान चलाता था। लेकिन आलोचकों का आरोप है कि: कई मामलों में भीड़ हिंसा के आरोप लगे। सोशल मीडिया पर उत्तेजक वीडियो सामने आते रहे। कानून से बाहर जाकर कार्रवाई करने की प्रवृत्ति दिखाई दी। इसी वजह से जब जुनैद-नासिर हत्याकांड सामने आया, तो जांच एजेंसियों का शक सीधे उसी नेटवर्क पर गया।

 जमानत और जश्न पर समाज के सामने खड़ा असहज सवाल

सबसे ज्यादा चर्चा जिस बात की हो रही है, वह है जेल से निकलते ही मोनू मानेसर का भव्य स्वागत। ढोल-नगाड़े। फूलों की मालाएं। लोगों द्वारा कंधों पर उठाकर घर तक ले जाना। देर रात तक जश्न। यह दृश्य कई लोगों के लिए बेहद चौंकाने वाला था। क्योंकि सवाल उठ रहा है: क्या हत्या के आरोप में जेल से निकले व्यक्ति को “हीरो” की तरह पेश करना समाज को किस दिशा में ले जाएगा?

न्याय व्यवस्था बनाम हिंदुत्ववादी भीड़ का फैसला

कानूनी तौर पर जमानत का मतलब निर्दोष साबित होना नहीं होता। यह सिर्फ इतना है कि मुकदमे की सुनवाई के दौरान आरोपी जेल से बाहर रह सकता है। लेकिन भारत में अक्सर यह देखा गया है कि: जमानत को “बरी होने” की तरह प्रचारित किया जाता है। सोशल मीडिया पर कथित नायकत्व की छवि बनाई जाती है। इससे न्याय प्रक्रिया पर भी दबाव बन सकता है।

 राजनीति की छाया

विश्लेषकों का मानना है कि इस मामले में राजनीति भी एक बड़ा फैक्टर है। क्योंकि: गौ-रक्षा का मुद्दा लंबे समय से राजनीतिक ध्रुवीकरण का हिस्सा रहा है कई राज्यों में इसे पहचान की राजनीति से जोड़ा गया, ऐसे मामलों में आरोपियों को कुछ समूहों से खुला समर्थन भी मिलता रहा, यही वजह है कि जुनैद-नासिर मामला सिर्फ एक क्रिमिनल केस नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक प्रतीक बन गया। असली सवाल अभी बाकी है। इस पूरे घटनाक्रम के बाद तीन बड़े सवाल अभी भी खड़े हैं:

२. क्या अदालत में सच्चाई पूरी तरह सामने आ पाएगी?

२.क्या भीड़ हिंसा के मामलों में सख्त संदेश जाएगा?

३. और सबसे अहम कि क्या समाज कानून के राज को भीड़ की भावनाओं से ऊपर रख पाएगा? जुनैद और नासिर की मौत सिर्फ दो लोगों की हत्या नहीं थी।

यह उस खतरनाक प्रवृत्ति की याद दिलाती है जहां शक, अफवाह और भीड़ की ताकत कानून से ऊपर खड़ी हो जाती है। और जब ऐसे मामलों के आरोपी जेल से बाहर आकर जश्न के नायक बन जाते हैं, तो सवाल सिर्फ अदालत का नहीं रहता बल्कि सवाल पूरे समाज के चरित्र का बन जाता है।

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