- अगर अदालतों के पास भी नागरिकों की चींख सुनने का समय नहीं, तो मजलूम आखिर जाएं कहां?
- गुजरात में “कट्टरतावाद विरोधी पथक”की स्थापना…
- मतदाता सूची से नाम हटना नागरिकता खत्म होना नहीं- सुप्रीम कोर्ट
- बिना नेम प्लेट और नंबर वाले ये लोग कौन हैं? पुलिस की वर्दी में छिपे चेहरों का सच सामने आना चाहिए
- सवाल एक अनशन का नहीं, पूरी शिक्षा व्यवस्था की जवाबदेही का है
- ग़ैरों पे करम-अपनों पे सितम? पाकिस्तान को नसीहत देने से पहले भारत को भी आईना देखने की ज़रूरत
- जब जज का नाम इंसाफ़ से बड़ा बना दिया जाए, तो समझ लीजिए संविधान कठघरे में खड़ा है
- मतदाता सूची या लोकतंत्र की सूची? चुनाव आयोग पर उठते सवालों का जवाब अब जरूरी है
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भारत में लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत सिर्फ चुनाव नहीं है। लोकतंत्र की असली ताकत यह भरोसा है कि जब सरकार से शिकायत हो, जब पुलिस से इंसाफ न मिले, जब प्रशासन अपनी ताकत का गलत इस्तेमाल करे, तब एक आम नागरिक अदालत का दरवाजा खटखटा सकता है। उसे भरोसा होता है कि अदालत उसकी बात सुनेगी। लेकिन दिल्ली में पिछले कुछ दिनों के घटनाक्रम ने इसी भरोसे को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें एक तरफ हजारों युवा पेपर लीक, शिक्षा व्यवस्था की कथित बदइंतजामी और सरकार…
राष्ट्रीय सुरक्षा की जरूरत या अल्पसंख्यकों में डर का माहौल… लोकतंत्र में सरकार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी नागरिकों के जीवन और संपत्ति की रक्षा करना, कानून-व्यवस्था बनाए रखना और देश की सुरक्षा सुनिश्चित करना है. साथ ही भारतीय संविधान हर नागरिक को समान अधिकार, धर्म की आज़ादी, सम्मान के साथ जीने का अधिकार और कानून के सामने बराबरी की गारंटी देता है. इसलिए राष्ट्रीय सुरक्षा और नागरिकों की आज़ादी, दोनों एक मजबूत लोकतंत्र के लिए समान रूप से जरूरी हैं. एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें हाल ही में गुजरात सरकार ने पुलिस विभाग के…
भारत में मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर इन दिनों सिर्फ चुनावी प्रक्रिया का मुद्दा नहीं रह गया है। यह अब नागरिकता, सरकारी योजनाओं, संवैधानिक अधिकारों और लोकतंत्र की बुनियादी अवधारणाओं से जुड़ा एक बड़ा सवाल बन चुका है। 17 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने इस पूरे विवाद के केंद्र में मौजूद एक बेहद अहम बात को स्पष्ट कर दिया-अगर एसआईआर के दौरान किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची से हटा दिया जाता है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि उसकी नागरिकता अपने आप खत्म हो गई। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए…
20 जुलाई को दिल्ली में छात्रों और युवाओं के प्रदर्शन के दौरान जो तस्वीरें और वीडियो सामने आए हैं, उन्होंने सिर्फ पुलिस कार्रवाई पर ही सवाल नहीं उठाए हैं, बल्कि एक उससे भी गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर पुलिस की वर्दी में मौजूद वे लोग कौन हैं, जिनकी वर्दी पर न तो नेम प्लेट दिखाई दे रही है और न ही कोई पहचान संख्या? लोकतंत्र में प्रदर्शन करना नागरिकों का अधिकार है। सरकार की नीतियों के खिलाफ आवाज उठाना, सवाल पूछना और विरोध दर्ज कराना किसी भी लोकतांत्रिक समाज की बुनियादी पहचान है। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल…
दिल्ली के जंतर-मंतर से उठी छात्रों और युवाओं की आवाज अब सिर्फ एक विरोध प्रदर्शन नहीं रह गई है। यह आंदोलन धीरे-धीरे उस बेचैनी का प्रतीक बनता जा रहा है, जो देश के लाखों युवाओं के भीतर शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं, पेपर लीक और सरकारी जवाबदेही को लेकर जमा होती रही है। इसी आंदोलन के बीच 21 दिनों से अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठे शिक्षाविद और पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को दिल्ली पुलिस द्वारा हिरासत में लेकर अस्पताल पहुंचाए जाने की घटना ने इस पूरे विवाद को और ज्यादा राजनीतिक बना दिया है। सरकार के लिए यह शायद एक प्रशासनिक फैसला…
पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में 125 साल पुराने गुरुद्वारा श्री गुरु सिंह सभा साहिब के एक हिस्से को नुकसान पहुंचाए जाने की घटना निश्चित रूप से निंदनीय है। किसी भी धर्म के पूजा-स्थल पर हमला केवल ईंट-पत्थरों को तोड़ना नहीं होता, बल्कि वह करोड़ों लोगों की आस्था, इतिहास और सांस्कृतिक विरासत पर हमला होता है। भारत सरकार ने इस घटना पर कड़ी प्रतिक्रिया दी, पाकिस्तान से जवाब मांगा, दोषियों के खिलाफ कार्रवाई और गुरुद्वारे के पुनर्निर्माण की मांग की। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें एक जिम्मेदार पड़ोसी देश के तौर पर यह प्रतिक्रिया स्वाभाविक…
भारत का संविधान न्याय की देवी की आंखों पर पट्टी इसलिए बांधता है कि वह सामने खड़े व्यक्ति का धर्म, जाति, भाषा, हैसियत या राजनीतिक पहचान न देखे। वह केवल सबूत देखे, कानून देखे और न्याय करे। लेकिन अफसोस, हमारे देश का सांप्रदायिक मानसिकता रखने वाला एक वर्ग अब न्यायाधीश की आंखों पर बंधी पट्टी नहीं, उसके नाम की तख्ती पढ़कर फैसला को गलत साबित करने की कोशिश कर रहा है। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें मध्य प्रदेश के नर्मदापुरम में मॉब लिंचिंग के एक मामले में 14 दोषियों को उम्रकैद की सज़ा सुनाने…
लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता, बल्कि विश्वसनीय चुनावों से चलता है। और विश्वसनीय चुनावों की पहली शर्त है कि हर पात्र नागरिक बिना किसी भय, भेदभाव या प्रशासनिक बाधा के अपना मताधिकार प्रयोग कर सके। भारत का संविधान प्रत्येक वयस्क नागरिक को मतदान का अधिकार देता है। यह अधिकार केवल एक प्रशासनिक सुविधा नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा है। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें इसलिए जब मतदाता सूची से बड़ी संख्या में नाम हटने, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर लगातार सवाल उठने लगें, तो यह…
कहा जाता है कि संगीत इंसान के दिल को मुलायम बनाता है। गीत सीमाएं मिटाते हैं, इंसानों को जोड़ते हैं और समाज में प्रेम, करुणा तथा सह-अस्तित्व की भावना पैदा करते हैं। लेकिन इतिहास यह भी बताता है कि जब सत्ता, राजनीति और कट्टर विचारधाराएं संगीत पर कब्ज़ा कर लेती हैं, तो वही गीत इंसानियत के सबसे बड़े दुश्मन भी बन सकते हैं। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें रवांडा के नरसंहार से पहले रेडियो पर बजने वाले गीत और संदेश हों या जर्मनी में नाज़ी प्रचार का सांस्कृतिक तंत्र-इतिहास गवाह है कि सामूहिक नफ़रत…
महाराष्ट्र विधानसभा में समान नागरिक संहिता (यूनिफॉर्म सिविल कोड-यूसीसी) को लेकर हुई बहस ने एक बार फिर उस संवैधानिक प्रश्न को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में ला दिया है, जो आज़ादी के बाद से समय-समय पर उठता रहा है। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें समर्थक इसे संविधान के अनुच्छेद 44 में निहित राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों को लागू करने की दिशा में आवश्यक कदम बताते हैं, जबकि विरोधियों का कहना है कि भारत जैसे बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक देश में बिना व्यापक सहमति के यूसीसी लागू करना सामाजिक तनाव और अविश्वास को बढ़ा सकता है।…