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देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था के केंद्र में बैठी संस्था संसद से एक ऐसा फैसला सामने आया है जिसने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए 193 सांसदों द्वारा लाया गया प्रस्ताव बिना कोई कारण बताए खारिज कर दिया गया। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें यह केवल एक प्रस्ताव का खारिज होना नहीं है बल्कि यह लोकतांत्रिक पारदर्शिता, संस्थागत जवाबदेही और विपक्ष की भूमिका पर सीधा सवाल है। 193 सांसदों की आवाज़… और एक “संक्षिप्त खारिज” लोकसभा में 130 सांसद। राज्यसभा में 63 सांसद। यानी कुल…

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भारत-बांग्लादेश सीमा की सुरक्षा को लेकर एक चौंकाने वाला प्रस्ताव सामने आया है। नदी वाले इलाकों में सांप और मगरमच्छ जैसे सरीसृपों के इस्तेमाल पर विचार। सीमा सुरक्षा बल को यह सुझाव अमित शाह के निर्देशों के संदर्भ में दिए गए एक आंतरिक संचार के जरिए मिला है। पहली नजर में यह प्रस्ताव “असामान्य” नहीं बल्कि अत्यंत असामान्य और चिंताजनक लगता है और यही कारण है कि यह केवल सुरक्षा का मुद्दा नहीं, बल्कि मानवाधिकार, पर्यावरण और नीति-निर्माण की समझ पर भी सवाल खड़े करता है। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें क्या है प्रस्ताव…

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उत्तराखंड के शांत पहाड़ी इलाके से आई एक खबर ने पूरे देश को चौंका दिया है। जहां किताबें होनी चाहिए थीं, भाजपा राज में वहां ‘भूत’ का मंदिर खड़ा कर दिया गया और वो भी छात्रों के पैसों से! सवाल सिर्फ एक मंदिर का नहीं, बल्कि उस मानसिकता का है जो शिक्षा के मंदिर को अंधविश्वास के अड्डे में बदल रही है। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें डर का इलाज मंदिर? कुमाऊं के कौसानी स्थित एक सरकारी स्कूल में कथित तौर पर ‘आत्मा को शांत करने’ के लिए एक छोटा मंदिर बनाया गया। कहानी…

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भाजपा राज में भारत की शिक्षा व्यवस्था एक बार फिर सियासी बहस के केंद्र में है। एम. के. स्टालिन ने सीबीएसई के नए पाठ्यक्रम ढांचे को लेकर ऐसा हमला बोला है, जिसने न केवल केंद्र-राज्य संबंधों को झकझोर दिया है, बल्कि देश की भाषाई विविधता पर भी बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें शिक्षा सुधार या हिंदी थोपने की रणनीति स्टालिन का आरोप सीधा और तीखा है कि यह कोई मासूम शैक्षणिक सुधार नहीं, बल्कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के नाम पर “हिंदी थोपने की सुनियोजित साजिश” है। उनके…

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तमिलनाडु के सथानकुलम पुलिस थाने में पिता-पुत्र (पी. जयराज और बेनिक्स) की हिरासत में मौत का मामला भारतीय न्याय व्यवस्था के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ बनकर सामने आया है। लगभग छह साल बाद, सीबीआई की जांच और अदालत की सुनवाई के बाद नौ पुलिसकर्मियों को मौत की सज़ा सुनाई जाना असाधारण है क्योंकि भारत में पुलिस अत्याचार के मामलों में इतनी कठोर सज़ा बहुत दुर्लभ रही है। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें न्यायाधीश जी. मुथुकुमारन की यह टिप्पणी कि “जहां शक्ति होती है, वहां जिम्मेदारी भी होनी चाहिए” केवल इस केस तक सीमित…

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आखिर ऐसा क्या कहा था मौलाना सलीम चतुवेर्दी ने जो उन्हें 14 दिन की हिरासत में भेज दिया गया? हाल ही में मौलाना अब्दुल्लाह सालिम चतुर्वेदी को पुलिस ने गिरफ्तार किया, economist.com

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भारत में एक बार फिर पत्रकारिता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक मूल्यों पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। मॉलीटिक्स, नेशनल दस्तक, 4PM न्यूज़ जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म्स और कई स्वतंत्र आवाज़ों को फेसबुक व अन्य सोशल मीडिया माध्यमों पर प्रतिबंधित किया जाना महज़ एक प्रशासनिक कार्रवाई नहीं, बल्कि एक बड़े ट्रेंड का हिस्सा प्रतीत होता है। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें एक ऐसा ट्रेंड, जिसमें सत्ता से सवाल पूछने वालों को व्यवस्थित तरीके से हाशिये पर धकेला जा रहा है। आईटी एक्ट की धारा 79(3)(b) का इस्तेमाल कर कंटेंट को ब्लॉक करना कानूनी प्रक्रिया…

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रामनवमी, जो परंपरागत रूप से भगवान राम के जन्मोत्सव के रूप में शांति, श्रद्धा और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक रही है, हाल के वर्षों में कई जगहों पर तनाव और टकराव की खबरों के साथ जुड़ती दिखाई दे रही है। रामनवमी ही नहीं बल्कि देश में हिन्दू धर्म का हर त्यौहार नफरत, आतंक और अल्पसंख्यंकों को डराने औसर बनता जा रहा है. इतना ही नहीं अल्पसंख्यंकों के क्रिसमिस जैसे त्योहारों को भी शांति और ख़ुशी से मानाने नहीं दिया जा रहा यह बदलाव सिर्फ एक धार्मिक आयोजन का नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक और राजनीतिक माहौल का संकेत भी माना जा…

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‘द वॉइस ऑफ हिंद रजब’ पर कथित “मौखिक रोक” कोई साधारण प्रशासनिक निर्णय नहीं है बल्कि यह उस दौर का संकेत है जहां सत्ता यह तय करना चाहती है कि जनता क्या… imdb.com

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सुप्रीम कोर्ट द्वारा ‘वंदे मातरम’ से जुड़े केंद्र सरकार के सर्कुलर पर याचिका खारिज करना सिर्फ़ एक कानूनी निर्णय नहीं, बल्कि यह उस जटिल बहस को भी उजागर करता है जिसमें राष्ट्रवाद, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और राज्य की भूमिका एक-दूसरे से टकराती हैं। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें अदालत ने साफ़ कहा कि जब तक कोई दंडात्मक प्रावधान नहीं है, तब तक इसे बाध्यकारी नहीं माना जा सकता। लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ़ “कानूनी बाध्यता” ही किसी निर्देश के प्रभाव को तय करती है? या फिर सामाजिक और राजनीतिक दबाव भी उतना ही…

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