अगर बाबरी मस्जिद मामले में मुस्लिम पक्ष उस फैसले को अंतरराष्ट्रीय न्यायालयों या वैश्विक मानवाधिकार मंचों तक ले जाता तो शायद आज अदालतें इतनी सहजता से धार्मिक दावों को कानूनी आधार बना कर फैसले देने की स्थिति में न होतीं क इमारत जिसमे 700 साल से मुसलमान नमाज़ पढ़ते आ रहे थे 2003 में एएसआई के आदेश पर हिन्दू समुदाय ने मां सरस्वती की पूजा शुरू कर दी और अब अदालत ने सीधा इस इमारत यानी कमाल मौला मस्जिद भोज शाला को मंदिर घोषित कर दिया। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
जिसने फिर से भारत में वही सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या अदालतें अब “आस्था” से चलेंगी? क्या इस देश में अब इतिहास अदालत तय करेगी? या आस्था कानून से ऊपर हो चुकी है? हम बात कर हैं मध्य प्रदेश के विवादित भोजशाला की, जहाँ हाईकोर्ट के हालिया फैसले ने देशभर में नई बहस छेड़ दी है।
सबसे पहले समझते हैं कि भोजशाला आखिर है क्या? मध्य प्रदेश के धार शहर में मौजूद यह ऐतिहासिक इमारत सदियों से विवाद का विषय रही है। हिंदू संगठन दावा करते हैं कि यह मां सरस्वती का प्राचीन मंदिर है, 11वीं सदी में परमार राजा भोज के दौर में यहाँ शिक्षा और संस्कृत अध्ययन का केंद्र था। बाद में दिल्ली सल्तनत के दौर में इस परिसर में मस्जिद बनी और तब से यानी 700 साल से मुस्लिम समुदाय यहाँ इबादत कर रहे थे।
लेकिन साल 2003 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण यानी ASI ने हर मंगलवार हिंदू पक्ष को पूजा की इजाज़त दी ,कई सालों तक यही व्यवस्था चलती रही। फिर हिंदू संगठनों ने अदालत में जाकर कहा कि यह पूरी जगह मंदिर है, इसलिए नमाज़ की अनुमति नहीं होनी चाहिए। जिस पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि भोजशाला मूल रूप से देवी सरस्वती का मंदिर थी। अदालत ने पुराने दस्तावेज़ों, किताबों और लेखों का ज़िक्र किया, जिनमें भोजशाला को सरस्वती मंदिर बताया गया था। कोर्ट ने माना कि हिंदू समुदाय लगातार इस स्थान को धार्मिक आस्था से जोड़कर पूजा करता रहा है।
अदालत ने कहा कि बड़ी संख्या में लोग इसे मां सरस्वती का मंदिर मानते हैं, इसलिए उनकी आस्था को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। लेकिन यहीं से सबसे बड़ा सवाल पैदा होता है कि क्या अदालतें किसी धार्मिक स्थल का फैसला इतिहास और संविधान के आधार पर करेंगी या आस्था के आधार पर? भारत का संविधान कहता है कि देश धर्मनिरपेक्ष है। यानी अदालत कानून से चलेगी, किसी धर्म विशेष की भावना से नहीं।
फिर सवाल उठता है कि अगर किसी जगह को लाखों लोग मंदिर मानने लगें, तो क्या वह कानूनी रूप से मंदिर हो जाएगा? अब यहाँ एक और अहम कानून सामने आता है-पूजा स्थल अधिनियम 1991-इस कानून में साफ लिखा गया था कि 15 अगस्त 1947 को जिस धार्मिक स्थल का जो स्वरूप था, उसे बदला नहीं जाएगा। इस कानून का मकसद क्या था? यही कि देश बार-बार मंदिर-मस्जिद विवादों में न उलझे। हर पुरानी इमारत को अदालत में खींचकर सांप्रदायिक लड़ाई न बनाई जाए।
लेकिन अब सवाल उठ रहा है कि अगर कानून इतना साफ है, तो फिर लगातार मस्जिदों और ऐतिहासिक ढांचों पर नए दावे अदालतों में क्यों स्वीकार हो रहे हैं? बहुत से लोग मानते हैं कि यह सिलसिला 2019 के बाबरी मस्जिद फैसले के बाद तेज हुआ। सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि बाबरी मस्जिद गिराना गैरकानूनी था, मस्जिद के नीचे राम जन्म भूमि या मंदिर होने के कोई सबूत नहीं थे लेकिन सरकार के दबाव में हिन्दुओं की आस्था को मद्दे नज़र रखते हुए ज़मीन हिंदू पक्ष को दे दी गई। उस फैसले के बाद देशभर में नए मुकदमे शुरू हो गए।
बनारस की ज्ञानवापी मस्जिद। मथुरा की शाही ईदगाह मस्जिद। दिल्ली का कुतुब मीनार। और अब धार की कमाल मौला मस्जिद भोजशाला। आलोचकों का कहना है कि अब अदालतों में इतिहास की लड़ाई लड़ी जा रही है और राजनीति को धार्मिक भावनाओं के सहारे मजबूत किया जा रहा है।
अब सवाल ये भी है कि इस जगह का असली इतिहास क्या कहता है? इतिहासकारों के मुताबिक-राजा भोज के दौर में यह शिक्षा और संस्कृति का केंद्र था लेकिन बाद में मुस्लिम शासकों के समय यहाँ मस्जिद बनी। कई सदियों तक मुस्लिम समुदाय यहाँ नमाज़ पढ़ता रहा। ब्रिटिश काल के रिकॉर्ड्स में भी इस परिसर को मिश्रित धार्मिक स्थल बताया गया है। यानी इतिहास खुद यह बताता है कि यह जगह केवल एक समुदाय की कहानी नहीं है, बल्कि भारत के जटिल इतिहास का हिस्सा है।
हर बार जब किसी मस्जिद या ऐतिहासिक स्थल पर नया दावा आता है, तो देश में तनाव बढ़ता है। टीवी डिबेट्स में ज़हर फैलता है। सोशल मीडिया पर नफरत बढ़ती है और आम हिंदू-मुस्लिम के बीच दूरी और गहरी हो जाती है। सवाल यह है कि अगर हर इमारत को सदियों पुराने दावों के आधार पर चुनौती दी जाएगी, तो क्या यह सिलसिला कभी खत्म होगा?इस पूरे मामले में एक और सवाल उठ रहा है,ऐसा प्रतीत होने लगा है कि बाबरी फैसला केवल एक विवाद का अंत नहीं था, बल्कि उसने एक नई न्यायिक और राजनीतिक दिशा खोल दी, जहां इतिहास को अदालतों में खींचकर वर्तमान की राजनीति बनाई जा रही है।
अगर बाबरी मस्जिद मामले में मुस्लिम पक्ष या मुस्लिम संगठन और जमात या फिर मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड उस फैसले को अंतरराष्ट्रीय न्यायालयों या वैश्विक मानवाधिकार मंचों तक ले जाता, और यह बहस वैश्विक स्तर पर उठती कि भारत में आस्था को संवैधानिक सिद्धांतों से ऊपर रखा जा रहा है, तो शायद आज अदालतें इतनी सहजता से धार्मिक दावों को कानूनी आधार बना कर फैसले देने की स्थिति में न होतीं।
यह बहस केवल एक मस्जिद या मंदिर की नहीं थी या नहीं है बल्कि यह भारत के संवैधानिक ढांचे की दिशा का सवाल था और आज भी बना हुआ है। क्योंकि यह लड़ाई केवल मस्जिद की नहीं है बल्कि भारत के संवैधानिक ढांचे की है। आज सवाल सिर्फ कमाल मौला मस्जिद -भोजशाला का नहीं है, सवाल भारत के भविष्य का है। क्या यह देश संविधान से चलेगा, या धार्मिक दावों की प्रतिस्पर्धा से? क्या अदालतें कानून को ऊपर रखेंगी या आस्था को? अगर इतिहास की हर लड़ाई अदालत में लड़ी जाएगी, तो आने वाली पीढ़ियों को क्या मिलेगा? शांति या हमेशा का सांप्रदायिक संघर्ष?
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