भारत में गाय केवल एक पशु नहीं, बल्कि राजनीति, धर्म, पहचान और सत्ता के संघर्ष का प्रतीक बन चुकी है। पश्चिम बंगाल में ईद-उल-अज़हा से पहले जानवरों की क़ुरबानी को लेकर जारी सरकारी नोटिस और उसके बाद उठे विवाद ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या भारत में कानून वास्तव में समान रूप से लागू होते हैं, या फिर उनका इस्तेमाल राजनीतिक और सांप्रदायिक माहौल के अनुसार किया जाता है? इसी बीच महुआ मोइत्रा और मौलाना अरशद मदनी के बयान इस बहस को और गहरा कर देते हैं। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा जारी नोटिस तकनीकी रूप से प्रशासनिक आदेश दिखाई देता है लेकिन जिसमें बिना प्रमाणपत्र गाय या भैंस के क़ुरबानी पर रोक और सार्वजनिक स्थानों पर खुले में जानवरों की क़ुरबानी पर प्रतिबंध की बात कही गई। लेकिन जिस समय यह आदेश जारी हुआ, उसने इसे केवल प्रशासनिक मुद्दा नहीं रहने दिया। ईद-उल-अज़हा से ठीक पहले ऐसे निर्देशों का आना स्वाभाविक रूप से मुस्लिम समुदाय और पशु व्यापार से जुड़े लोगों के बीच चिंता पैदा करता है। महुआ मोइत्रा का यह कहना कि इससे केवल मुसलमान ही नहीं बल्कि डेयरी, पशुपालन और व्यापार से जुड़े हिंदू भी प्रभावित होंगे, इस बात की ओर इशारा करता है कि यह मुद्दा धार्मिक होने के साथ-साथ आर्थिक भी है।
भारत में पशु व्यापार, चमड़ा उद्योग, डेयरी और मांस कारोबार करोड़ों लोगों की आजीविका से जुड़ा हुआ है। इनमें बड़ी संख्या में दलित, पिछड़े, मुसलमान और गरीब हिंदू समुदाय शामिल हैं। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि पिछले कुछ वर्षों में गाय और बीफ का मुद्दा आर्थिक या कृषि नीति से ज्यादा सांप्रदायिक राजनीति का हथियार बन गया है। मॉब लिंचिंग की घटनाओं से लेकर “गौ-रक्षा” के नाम पर हिंसा तक, देश ने कई भयावह दृश्य देखे हैं। कई मामलों में लोगों की हत्या केवल संदेह के आधार पर कर दी गई, जबकि बाद में आरोप भी साबित नहीं हो सके।
यही वह संदर्भ है जिसमें मौलाना अरशद मदनी का बयान महत्वपूर्ण हो जाता है। उनका गाय को “राष्ट्रीय पशु” घोषित करने की मांग पहली नजर में चौंकाने वाली लग सकती है, लेकिन उनके बयान का केंद्रीय बिंदु दरअसल राजनीतिक दोहरे मापदंड पर हमला है। उन्होंने यह सवाल उठाया कि यदि गाय वास्तव में बहुसंख्यक समाज के लिए इतनी पवित्र है, तो सरकार उसे राष्ट्रीय पशु घोषित क्यों नहीं करती? और यदि गाय की रक्षा राष्ट्रीय भावना का विषय है, तो फिर अलग-अलग राज्यों में बीफ कानून अलग-अलग क्यों हैं?
भारत का यही विरोधाभास आज सबसे बड़ी बहस बन चुका है। कुछ राज्यों में बीफ खुलेआम बिकता है और वहां न तो भीड़ हिंसा होती है और न ही राजनीतिक उन्माद दिखाई देता है। वहीं, कुछ राज्यों में केवल शक के आधार पर लोगों की जान ले ली जाती है। इससे यह धारणा मजबूत होती है कि कई बार “गौ-रक्षा” का मुद्दा धार्मिक आस्था से ज्यादा राजनीतिक ध्रुवीकरण का साधन बन जाता है।
मौलाना अरशद मदनी ने अपने बयान में मॉब लिंचिंग और मुसलमानों को बदनाम करने की राजनीति का जिक्र करके एक असुविधाजनक सच सामने रखा है। पिछले वर्षों में “गाय” के नाम पर हुई हिंसा का सबसे बड़ा निशाना अक्सर मुसलमान और दलित बने हैं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या गाय की रक्षा वास्तव में उद्देश्य है, या फिर उसके बहाने समाज में भय और विभाजन पैदा करना है?
यहां एक और महत्वपूर्ण विरोधाभास सामने आता है की समान नागरिक संहिता (यूसीसी) की बहस में अक्सर कहा जाता है कि “एक देश, एक कानून” होना चाहिए। लेकिन पशु वध और बीफ कानूनों के मामले में भारत में एक समान नीति नहीं है। अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग नियम हैं। इससे यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या कानूनों की समानता केवल कुछ मुद्दों पर ही याद आती है?
असल समस्या यह है कि भारत में गाय का मुद्दा अब संवैधानिक और प्रशासनिक बहस से आगे बढ़कर भावनात्मक और राजनीतिक हथियार बन चुका है। इससे न केवल सांप्रदायिक तनाव बढ़ता है, बल्कि गरीब तबकों की रोज़ी-रोटी भी प्रभावित होती है। जो लोग सदियों से पशुपालन और उससे जुड़े कारोबार में लगे रहे हैं, वे अचानक संदेह और भय के माहौल में जीने को मजबूर हो जाते हैं। यदि सचमुच गाय के प्रति सम्मान और संरक्षण की भावना है, तो उसका रास्ता हिंसा, नफरत और भीड़तंत्र नहीं हो सकता।
कानून सभी पर समान रूप से लागू होने चाहिए और किसी भी समुदाय को निशाना बनाने का माध्यम नहीं बनना चाहिए। भारत जैसे बहुलतावादी देश में धार्मिक आस्था और नागरिक अधिकारों के बीच संतुलन ही लोकतंत्र की असली कसौटी है। लेकिन जब कानून, आस्था और राजनीति आपस में घुलने लगते हैं, तब सबसे ज्यादा नुकसान सामाजिक विश्वास और संवैधानिक समानता को होता है।
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