- अगर अदालतों के पास भी नागरिकों की चींख सुनने का समय नहीं, तो मजलूम आखिर जाएं कहां?
- गुजरात में “कट्टरतावाद विरोधी पथक”की स्थापना…
- मतदाता सूची से नाम हटना नागरिकता खत्म होना नहीं- सुप्रीम कोर्ट
- बिना नेम प्लेट और नंबर वाले ये लोग कौन हैं? पुलिस की वर्दी में छिपे चेहरों का सच सामने आना चाहिए
- सवाल एक अनशन का नहीं, पूरी शिक्षा व्यवस्था की जवाबदेही का है
- ग़ैरों पे करम-अपनों पे सितम? पाकिस्तान को नसीहत देने से पहले भारत को भी आईना देखने की ज़रूरत
- जब जज का नाम इंसाफ़ से बड़ा बना दिया जाए, तो समझ लीजिए संविधान कठघरे में खड़ा है
- मतदाता सूची या लोकतंत्र की सूची? चुनाव आयोग पर उठते सवालों का जवाब अब जरूरी है
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19 साल जेल में सड़ते रहे, अब कहा गया ‘बेगुनाह हो’ — क्या यही है भारत की न्याय व्यवस्था? क्या पुलिस को फर्जी मुकदमों में निर्दोषों को फँसाने की खुली छूट है? क्या मुसलमान होना ही शक की बुनियाद बन चुका है? 2006 में मुंबई की लोकल ट्रेनों में धमाके हुए, 189 मौतें हुईं — और सरकार को चाहिए था कोई ‘जिम्मेदार’। बस, मुस्लिम नाम चाहिए था — और 12 मुस्लिम युवकों को उठा लिया गया। 19 साल जेल में रहे। टॉर्चर, फर्जी कबूलनामे, कमजोर सबूत, झूठे गवाह — और 2024 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा: “ये सभी निर्दोष थे।…
दोस्तों 25 जुलाई 2025 को नरेंद्र मोदी ने एक और रिकॉर्ड बना लिया! 4,078 दिन लगातार प्रधानमंत्री रहकर इंदिरा गांधी का रिकॉर्ड तोड़ दिया। जिसे लेकर गोदी मीडिया तारीफों के पुल बांध रहा है लेकिन हम बताएंगे वो सच्चाई जो गोदी मीडिया ने आपसे छुपाई है। मोदी बनाम इंदिरा — कौन है असली लीडर?” क्या सिर्फ़ कुर्सी पर जमे रहने से इतिहास लिखा जाता है? चलिए दोनों के दौर की तुलना करते हैं। इंदिरा गांधी ने 4,077 दिन में देश को क्या दिया ? १ बांग्लादेश को आज़ादी दिलवाई। २ पाकिस्तान को युद्ध में हराया। ३ अमेरिका की आंखों में…
महाराष्ट्र में क़ुरैशी जमात द्वारा बीफ कारोबार को पूरी तरह बंद करने का फ़ैसला किया गया जिसके बाद महाराष्ट्र भर में जानवरों के बाजार ठप हो गए हैं जिसका सबसे ज़्यादा असर किसानों पर पढ़ रहा है। सोशल मीडिया पर गरीब किसान गौरक्षकों, बजरंगदल , विहिप और सरकार को लेकर नाराज़गी जताते नज़र आ रहे हैं। क़ुरैशी जमात का ये निर्णय केवल एक धार्मिक या राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं है — यह संविधान, अर्थव्यवस्था और सामाजिक संरचना के खिलाफ सत्ता के जरिए थोपे गए एकतरफा युद्ध का जवाब है। महाराष्ट्र में हर दिन लगभग 30,000 से 35,000 जानवरों की कटाई होती…
11 जुलाई 2006 को मुंबई की लोकल ट्रेनों में सिलसिलेवार धमाके हुए। 11 मिनट में 7 धमाके, और 189 निर्दोष लोग मारे गए। ये मुंबई की आत्मा पर हमला था। लेकिन असली हमला तो इसके बाद शुरू हुआ — जांच और न्याय के नाम पर। 2015 में आए अदालत के फ़ैसले में 13 में से 5 लोगों को फांसी और बाकी को उम्रक़ैद की सज़ा सुनाई गई। लेकिन क्या सच में इन लोगों ने ही ब्लास्ट किया था? आइए विस्तार से समझते हैं कि क्यों इस केस को भारत की न्यायिक और जांच प्रणाली पर एक काला धब्बा कहा जा…
भारतीय लोकतंत्र की सबसे अहम संस्था — चुनाव आयोग (ECI) — अब सवालों के घेरे में है, और सिर्फ़ आलोचनाओं के लिए नहीं, बल्कि लोकतंत्र के मूल ढांचे को खतरे में डालने के लिए। हाल ही में बिहार में मतदाता सूची के ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (Special Intensive Revision – SIR) में जिस तरह चुनाव आयोग ने मनमानी और पक्षपात दिखाया, उससे यह स्पष्ट होता जा रहा है कि आयोग अब ‘स्वतंत्र’ नहीं, बल्कि सत्ता का ‘सहयोगी’ बन गया है। बिहार में लोकतंत्र पर कतरनी:- बिहार में SIR की प्रक्रिया के दौरान चुनाव आयोग ने मतदाताओं से स्वयं अपने नाम सूची…
एक ऐतिहासिक फैसला या एक देर से आई शर्मिंदगी?19 साल! इतने सालों तक 12 मुस्लिम युवकों को आतंकवादी कहकर जेल में बंद रखा गया। और अब, बॉम्बे हाई कोर्ट ने साफ कहा है: “ये सारे बेगुनाह थे।” तो सवाल उठता है — इन बेगुनाहों की ज़िंदगी के 19 साल कौन लौटाएगा? और उन पुलिस अफसरों का क्या, जिन्होंने फर्जी केस गढ़े, टॉर्चर किया, और अदालत में झूठ बोला? बॉम्बे हाई कोर्ट ने क्या कहा?:- 18 जुलाई 2024 को बॉम्बे हाई कोर्ट की दो सदस्यीय खंडपीठ (न्यायमूर्ति अनिल किलोर और न्यायमूर्ति एस.सी. चंदक) ने 7/11 मुंबई ट्रेन धमाके केस में दोषी…
17 जुलाई 2025 को दिल्ली हाई कोर्ट का फैसला आया — तबलीगी जमात से जुड़े 70 भारतीय नागरिकों के खिलाफ दर्ज 16 चार्जशीट रद्द। फैसला सीधा और साफ था: “इन मामलों में कोई ठोस आधार नहीं था।” लेकिन सवाल अब ये नहीं है कि आरोप गिरे — सवाल यह है कि चार साल तक ये आरोप टिके कैसे? कोविड का बहाना, मुसलमानों को निशाना:- मार्च 2020 में जब देश अचानक लॉकडाउन में धकेल दिया गया, निजामुद्दीन के मरकज़ में कुछ विदेशी नागरिक फंसे रह गए। तबलीगी जमात का कार्यक्रम खत्म हो चुका था, लेकिन देश की मीडिया और सत्ता प्रतिष्ठान…
11 जुलाई 2006 को मुंबई की लोकल ट्रेनों में 11 मिनट के भीतर 7 सिलसिलेवार बम धमाके हुए। 189 लोग मारे गए, 800 से ज़्यादा घायल। देश दहल गया — लेकिन इस धमाके से ज़्यादा दहलाने वाली कहानी थी इसकी जांच, मुकदमा और 19 साल बाद आया फ़ैसला। अब 21 जुलाई 2025 को बॉम्बे हाई कोर्ट ने उन 12 आरोपियों को पूरी तरह बरी कर दिया है जिन्हें 2015 में फांसी और उम्रकैद की सज़ा सुनाई गई थी। कोर्ट ने कहा, “महाराष्ट्र एटीएस इनके खिलाफ आरोप साबित करने में नाकाम रही।” यह सिर्फ़ एक न्यायिक फ़ैसला नहीं, बल्कि भारत की…
अगर आपको देश के लोकतंत्र की चिंता है तो आपको बिहार में वोटर लिस्ट के ‘गहन पुनरीक्षण’ (अंग्रेज़ी में एसआईआर यानी ‘सिर’) नामक सिरफिरी मुहिम पर गहन नज़र रखनी चाहिए. अगर आपको चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं की स्वायत्तता का महत्व समझ आता है तो आपको बिहार में चुनाव आयोग के निर्देश पर चल रहे फ़र्ज़ीवाड़े को समझना चाहिए. अगर आपको सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार में आस्था है तो आपको बिहार में वोटबंदी के सच का सामना करना होगा. चूंकि यह मामला सिर्फ़ बिहार का नहीं है. बिहार तो सिर्फ़ पहली प्रयोगशाला है. आपका नंबर भी आने वाला है. वोटर लिस्ट का…
यह हमला सिर्फ एक पत्रकार पर नहीं — यह भारत के लोकतंत्र की रीढ़ पर है 12 जुलाई 2025 — वरिष्ठ पत्रकार और यूट्यूबर अजीत अंजुम ने एक वीडियो पोस्ट किया। वीडियो में दिखाया गया कि बिहार के बेगूसराय ज़िले में मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न (SIR) के नाम पर भारी गड़बड़ियाँ हो रही हैं। लेकिन 24 घंटे भी नहीं बीते थे, कि प्रशासन ने वीडियो हटाने की कोशिश की, और फिर दर्ज कर दी एक एफआईआर! सवाल पूछो तो सरकार को तकलीफ़ होती है। और जो तकलीफ़ देता है — वो अब ‘आपराधिक’ बन जाता है। FIR का…