भारत का संविधान न्याय की देवी की आंखों पर पट्टी इसलिए बांधता है कि वह सामने खड़े व्यक्ति का धर्म, जाति, भाषा, हैसियत या राजनीतिक पहचान न देखे। वह केवल सबूत देखे, कानून देखे और न्याय करे। लेकिन अफसोस, हमारे देश का सांप्रदायिक मानसिकता रखने वाला एक वर्ग अब न्यायाधीश की आंखों पर बंधी पट्टी नहीं, उसके नाम की तख्ती पढ़कर फैसला को गलत साबित करने की कोशिश कर रहा है। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
मध्य प्रदेश के नर्मदापुरम में मॉब लिंचिंग के एक मामले में 14 दोषियों को उम्रकैद की सज़ा सुनाने वाली अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश तबस्सुम खान के साथ जो कुछ हो रहा है, वह केवल एक महिला जज को दी जा रही धमकी नहीं है। यह उस पूरी न्यायिक व्यवस्था पर हमला है, जिस पर इस देश के 140 करोड़ लोगों का भरोसा टिका हुआ है।
सोशल मीडिया पर खुलेआम जान से मारने की धमकियां, धार्मिक पहचान के आधार पर अपमान, पुतले दहन और यह प्रचार कि फैसला इसलिए आया क्योंकि जज मुस्लिम हैं-ये सब किसी सभ्य लोकतंत्र के लक्षण नहीं हैं। यह भीड़तंत्र की वह मानसिकता है जो अदालतों को भी अपनी विचारधारा के आगे झुकाना चाहती है।
फैसला जज नहीं, कानून करता है
कुछ लोग शायद यह भूल गए हैं कि अदालत में बैठा व्यक्ति पहले जज होता है, बाद में किसी धर्म का अनुयायी। एडीजे तबस्सुम खान ने यह फैसला कुरआन, गीता, बाइबिल या गुरु ग्रंथ साहिब खोलकर नहीं दिया। उन्होंने भारतीय संविधान, भारतीय न्याय संहिता, न्यायिक मिसालों, गवाहों, वैज्ञानिक साक्ष्यों और अभियोजन द्वारा प्रस्तुत प्रमाणों के आधार पर फैसला सुनाया। अदालत की कुर्सी पर बैठने वाला हर न्यायाधीश यही शपथ लेता है कि वह संविधान के प्रति निष्ठावान रहेगा, किसी धर्म या समुदाय के प्रति नहीं।
अगर कल यही फैसला किसी हिंदू न्यायाधीश ने दिया होता, तो क्या उसे “हिंदू जज का फैसला” कहा जाता? नहीं। क्योंकि न्यायाधीश का धर्म कभी न्याय का आधार नहीं हो सकता। फिर आज तबस्सुम खान के मामले में यह सवाल क्यों? असल समस्या फैसले से नहीं, उस मानसिकता से है जो हर संवैधानिक संस्था को हिंदू-मुस्लिम के चश्मे से देखना चाहती है।
फैसला गलत है? अदालत जाइए, भीड़ मत जुटाइए
भारत का संविधान इतना कमजोर नहीं है कि एक जिला अदालत का फैसला अंतिम सत्य बन जाए। यदि किसी पक्ष को लगता है कि सजा गलत है, सबूतों का गलत मूल्यांकन हुआ है या कानून की व्याख्या में त्रुटि हुई है, तो उसके लिए उच्च न्यायालय है, सर्वोच्च न्यायालय है, पुनर्विचार याचिका है, अपील है। यही लोकतंत्र है। लेकिन यदि कोई यह कहे कि “फैसला बदलो, वरना हिंसा होगी”, “जज को परिणाम भुगतने होंगे” या “जज का धर्म देखकर फैसला खारिज कर दो”, तो यह न्यायिक समीक्षा नहीं, न्यायिक आतंक है। भारत में कानून चलता है, लाठी नहीं। संविधान चलता है, भीड़ नहीं। और अदालतें चलती हैं, व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी नहीं।
यह किसी के बाप का राज नहीं है
कुछ स्वयंभू धर्मरक्षक और भीड़ की राजनीति करने वाले लोग शायद यह समझ बैठे हैं कि अदालतें भी उनके आदेश से चलेंगी। उन्हें याद रखना चाहिए कि यह किसी संगठन, किसी भीड़, किसी जाति या किसी धर्म के ठेकेदार का राज नहीं है। यह “हम भारत के लोग” द्वारा बनाया गया गणराज्य है।
यहां यदि अदालत का फैसला पसंद नहीं है तो अपील कीजिए। लेकिन जज को धमकाकर, पुतले जलाकर, सोशल मीडिया पर नफरत फैलाकर या धार्मिक उन्माद पैदा करके फैसले नहीं बदले जा सकते। यदि आज यह रास्ता स्वीकार कर लिया गया, तो कल हर हत्या, बलात्कार, दंगे, भ्रष्टाचार और आतंकवाद के मामले में भीड़ अदालतों के बाहर खड़ी होकर फैसला लिखवाएगी। तब न्यायालयों की जगह भीड़ पंचायतें ले लेंगी।
आज तबस्सुम खान हैं, कल कोई और होगा
यह भ्रम पालना भी खतरनाक है कि यह मामला केवल एक मुस्लिम न्यायाधीश का है। कल यदि किसी हिंदू जज ने किसी मुस्लिम आरोपी को सजा दी और उसे इसी तरह धमकाया गया, तो क्या वह स्वीकार होगा? बिलकुल नहीं। इसलिए यह लड़ाई किसी तबस्सुम खान की नहीं है। यह हर उस न्यायाधीश की लड़ाई है जो संविधान की शपथ लेकर न्याय करता है। न्यायाधीश का धर्म नहीं बचाना है, न्यायपालिका की स्वतंत्रता बचानी है।
डर गया जज तो मर जाएगा न्याय
जरा कल्पना कीजिए…यदि हर जज यह सोचने लगे कि किसी प्रभावशाली संगठन के खिलाफ फैसला दिया तो घर का पता सोशल मीडिया पर डाल दिया जाएगा, परिवार को धमकियां मिलेंगी, धार्मिक अभियान चलेंगे, पुतले जलेंगे और भीड़ अदालत घेर लेगी- तो क्या वह पूरी स्वतंत्रता से न्याय कर पाएगा? शायद नहीं। और जिस दिन न्यायाधीश डरकर फैसला देगा, उस दिन संविधान की प्रस्तावना में लिखा “न्याय” शब्द केवल किताबों में रह जाएगा। फिर अदालतों में कानून नहीं, ताकतवरों का प्रभाव चलेगा।
संविधान विरोधी मानसिकता पर कठोर प्रहार जरूरी
जो लोग न्यायपालिका को धमकाकर, धार्मिक आधार पर जजों को निशाना बनाकर और भीड़ के दबाव से अदालतों के फैसलों को प्रभावित करना चाहते हैं, वे संविधान की मूल भावना और कानून के शासन के खिलाफ खड़े दिखाई देते हैं। ऐसे लोगों के खिलाफ उपलब्ध कानूनी प्रावधानों के तहत कठोर कार्रवाई होना केवल कानून का प्रश्न नहीं, बल्कि लोकतंत्र की सुरक्षा का प्रश्न है। यदि आज इन्हें छोड़ दिया गया, तो कल कोई भी जज किसी प्रभावशाली आरोपी के खिलाफ निष्पक्ष फैसला देने से पहले दस बार सोचेगा।
सरकार के लिए भी अग्निपरीक्षा
एफआईआर दर्ज होना स्वागतयोग्य है, लेकिन यह शुरुआत भर है। देश को यह संदेश मिलना चाहिए कि न्यायपालिका के खिलाफ धमकी, सांप्रदायिक नफरत और हिंसा भड़काने की कीमत बहुत महंगी पड़ेगी। कार्रवाई व्यक्ति देखकर नहीं, अपराध देखकर होनी चाहिए। चाहे आरोपी किसी भी धर्म, जाति, संगठन या राजनीतिक विचारधारा से जुड़ा हो। कानून की आंखों पर पट्टी तभी सार्थक है जब उसका हाथ भी सबके लिए बराबर चले।
आज सवाल यह नहीं है कि जज तबस्सुम खान मुस्लिम हैं या नहीं। सवाल यह है कि क्या भारत में कोई न्यायाधीश बिना भय, बिना दबाव और बिना भीड़ के आतंक के केवल संविधान के अनुसार फैसला सुना सकता है? यदि इसका उत्तर “हाँ” होना चाहिए, तो हमें जजों की नहीं, न्याय की रक्षा करनी होगी। याद रखिए…जिस दिन अदालतें भीड़ से डरने लगेंगी, उस दिन अदालतों में संविधान नहीं, भीड़ का फरमान पढ़ा जाएगा। और जिस देश में अदालतें डर जाएं, वहां सबसे पहले आम आदमी का न्याय मरता है।
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