भारत में लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत सिर्फ चुनाव नहीं है। लोकतंत्र की असली ताकत यह भरोसा है कि जब सरकार से शिकायत हो, जब पुलिस से इंसाफ न मिले, जब प्रशासन अपनी ताकत का गलत इस्तेमाल करे, तब एक आम नागरिक अदालत का दरवाजा खटखटा सकता है। उसे भरोसा होता है कि अदालत उसकी बात सुनेगी। लेकिन दिल्ली में पिछले कुछ दिनों के घटनाक्रम ने इसी भरोसे को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
एक तरफ हजारों युवा पेपर लीक, शिक्षा व्यवस्था की कथित बदइंतजामी और सरकार की जवाबदेही को लेकर सड़क पर उतरते हैं। दूसरी तरफ प्रदर्शन के दौरान पुलिस की कथित ज्यादती और अत्यधिक बल प्रयोग के वीडियो सामने आते हैं। कई लोग घायल होते हैं। आरोप लगते हैं कि प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज किया गया, आंसू गैस छोड़ी गई और जरूरत से ज्यादा बल का इस्तेमाल हुआ। और जब इस पूरे मामले को लेकर अदालत का दरवाजा खटखटाया जाता है, तो पहले दिल्ली हाईकोर्ट से यह सुनने को मिलता है कि ‘अदालत को इन सब में मत घसीटो।’
फिर अगले दिन सुप्रीम कोर्ट में प्रदर्शनकारियों पर पुलिस की कार्रवाई का मामला उठता है तो खबरों के मुताबिक मुख्य न्यायाधीश की ओर से कहा जाता है कि ‘हमारा समय बर्बाद न करें।’ जब वकील पुलिस की कथित ज्यादती के वीडियो का जिक्र करते हैं, तो यह भी कहा जाता है कि ‘हमें वीडियो में कोई दिलचस्पी नहीं है; हमारे पास उन्हें देखने का समय नहीं है।’ अब सवाल यह नहीं है कि अदालत प्रदर्शनकारियों के पक्ष में फैसला देती या पुलिस के पक्ष में। सवाल इससे भी बड़ा है कि क्या अदालत को इस मामले को सुनना ही नहीं चाहिए था?
अदालत का काम फैसला देना है, लेकिन सुनना उससे पहले जरूरी है
न्यायपालिका का सबसे पहला सिद्धांत है कि दोनों पक्षों को सुना जाए। अगर प्रदर्शनकारी आरोप लगा रहे हैं कि पुलिस ने जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग किया, या ये पुलिस के भेस में अमित शाह के गुंडे थे, तो अदालत को यह जांचने का अधिकार है कि आरोप सही हैं या गलत। अगर पुलिस कहती है कि प्रदर्शनकारियों ने हिंसा की, तो अदालत को पुलिस का पक्ष भी सुनना चाहिए। लेकिन इन दोनों दावों के बीच सच क्या है? यह तय करने का काम आखिर किसका है?
अगर अदालत भी यह कह दे कि उसके पास वीडियो देखने का समय नहीं है, तो फिर उन वीडियो में दर्ज घटनाओं की निष्पक्ष जांच कौन करेगा? क्या हर नागरिक के पास इतनी ताकत है कि वह खुद जांच कर सके? क्या हर घायल प्रदर्शनकारी के पास पुलिस के खिलाफ लंबी कानूनी लड़ाई लड़ने के संसाधन हैं? और अगर पुलिस ही जांच करे, प्रशासन ही जांच करे और पीड़ित भी उसी व्यवस्था के सामने न्याय मांगे, तो स्वतंत्र न्यायिक निगरानी की जरूरत क्यों नहीं होगी?
सवाल सिर्फ प्रदर्शनकारियों का नहीं, लोकतंत्र का है
यहां एक बात स्पष्ट होनी चाहिए। किसी भी प्रदर्शनकारी को हिंसा करने या कानून तोड़ने का अधिकार नहीं है। अगर किसी प्रदर्शन में हिंसा हुई है, तो कानून के मुताबिक कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन दूसरी तरफ पुलिस को भी कानून से बाहर जाकर कार्रवाई करने की छूट नहीं दी जा सकती। राज्य के पास पुलिस, प्रशासन और बल है। आम नागरिक के पास क्या है? उसके पास सिर्फ अपनी आवाज है। इसलिए जब पुलिस और नागरिक आमने-सामने हों, तो पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठना लोकतंत्र विरोधी नहीं है।
बल्कि यह लोकतांत्रिक व्यवस्था में जवाबदेही का जरूरी हिस्सा है। अगर पुलिस ने सही कार्रवाई की है, तो निष्पक्ष जांच के बाद यह साबित हो जाएगा। लेकिन अगर पुलिस ने अत्यधिक बल का इस्तेमाल किया है, तो उसकी भी जवाबदेही तय होनी चाहिए। यही कानून का राज है। ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ की राजनीति से ज्यादा महत्वपूर्ण है उसके पीछे का सवाल। इस पूरे आंदोलन को ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के नाम से जाना जा रहा है। यह नाम खुद सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की पहले की विवादित टिप्पणी से प्रेरित बताया गया है।
नाम पर बहस हो सकती है। राजनीतिक विचारधारा पर बहस हो सकती है। सरकार की नीतियों पर बहस हो सकती है। लेकिन इन सबके बीच एक बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता-देश के युवाओं के बीच बेरोजगारी, पेपर लीक, प्रतियोगी परीक्षाओं और शिक्षा व्यवस्था को लेकर गहरी बेचैनी है। जब हजारों युवा सड़क पर उतरते हैं, तो उन्हें सिर्फ भीड़ समझकर खारिज करने के बजाय यह समझना जरूरी है कि आखिर वे किन सवालों के जवाब मांग रहे हैं।
अगर पेपर लीक हुआ है, तो जिम्मेदारी किसकी है? अगर परीक्षा व्यवस्था में खामियां हैं, तो सुधार कौन करेगा? अगर लाखों युवाओं का भविष्य दांव पर है, तो जवाबदेही कौन तय करेगा? इन सवालों का जवाब देना किसी सरकार की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी जिम्मेदारी है। सोनम वांगचुक का मामला भी इसी सवाल को सामने लाता है। इस पूरे घटनाक्रम में पर्यावरणविद् और इनोवेटर सोनम वांगचुक का मामला भी बेहद महत्वपूर्ण है। रिपोर्टों के अनुसार, वांगचुक जंतर-मंतर पर अनशन कर रहे थे और उन्हें प्रदर्शन स्थल से हटाकर अस्पताल ले जाया गया।
इस कार्रवाई को चुनौती देते हुए दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि उन्हें जबरन हटाना संविधान के अनुच्छेद 14 और 19 के तहत मिले अधिकारों के खिलाफ है। लेकिन अदालत ने तत्काल सुनवाई से इनकार करते हुए पूछा कि इतनी जल्दी क्या है और कहा कि इस पर दो दिन बाद भी सुनवाई हो सकती है। यहां भी सवाल अदालत के फैसले का नहीं, बल्कि प्राथमिकता का है।
अगर कोई व्यक्ति अनशन पर बैठा है और उसकी सेहत खतरे में है, अगर उसके संवैधानिक अधिकारों के उल्लंघन का आरोप लगाया जा रहा है, तो क्या अदालत का यह देखना जरूरी नहीं कि मामला तत्काल सुनवाई योग्य है या नहीं? अदालत अगर सुनवाई के बाद यह कहती कि पुलिस की कार्रवाई कानून के मुताबिक थी, तो भी फैसला स्वीकार करना पड़ता। लेकिन अगर अदालत सुनवाई ही न करे, तो पीड़ित अपनी बात कहेगा कहां?
सबसे बड़ा सवाल: अगर अदालत ही सुनवाई से पीछे हट जाए तो मजलूम कहां जाए?
यही इस पूरे विवाद का सबसे गंभीर सवाल है। मान लीजिए कोई नागरिक सरकार से परेशान है। वह प्रदर्शन करता है। प्रशासन उसकी बात नहीं सुनता। पुलिस पर वह अत्यधिक बल प्रयोग का आरोप लगाता है। वह अदालत पहुंचता है। और वहां उसे यह सुनने को मिले कि ‘हमारा समय बर्बाद मत कीजिए।’ तो फिर वह जाए कहां? अगर किसी नागरिक को पुलिस से शिकायत है, तो वह पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों के पास जा सकता है। अगर प्रशासन से शिकायत है, तो वह सरकार के पास जा सकता है।
लेकिन अगर सरकार और पुलिस दोनों उसकी बात नहीं सुनते, तो लोकतंत्र ने उसे एक अंतिम रास्ता दिया है-न्यायपालिका। अगर वह दरवाजा भी बंद महसूस होने लगे, तो एक आम नागरिक के पास आखिर क्या रास्ता बचता है? यही कारण है कि अदालतों से सिर्फ फैसले की उम्मीद नहीं की जाती। अदालतों से उम्मीद की जाती है कि वे सुनेंगी। क्योंकि कई बार न्याय की पहली सीढ़ी फैसला नहीं, बल्कि किसी पीड़ित की बात को गंभीरता से सुनना होती है।
अदालत का समय महत्वपूर्ण है, लेकिन नागरिक के अधिकार भी महत्वपूर्ण हैं
यह भी सही है कि अदालतों पर लाखों मुकदमों का बोझ है। जजों के पास सीमित समय है। हर मामले की तत्काल सुनवाई संभव नहीं है। लेकिन जब मामला पुलिस की कथित बर्बरता, नागरिकों के संवैधानिक अधिकार और राज्य की शक्ति के दुरुपयोग से जुड़ा हो, तो ऐसे मामलों की प्राथमिकता पर सार्वजनिक बहस होना स्वाभाविक है।
क्योंकि अदालत का समय महत्वपूर्ण है, लेकिन नागरिक की स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकार भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। अगर अदालतों के सामने यह सवाल आए कि एक तरफ हजारों लोग पुलिस की कार्रवाई का आरोप लगा रहे हैं और दूसरी तरफ पुलिस अपने ऊपर लगे आरोपों से इनकार कर रही है, तो अदालत को कम से कम यह तय करने का अधिकार और जिम्मेदारी होनी चाहिए कि मामले की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए या नहीं।
लोकतंत्र में अदालतें आखिरी उम्मीद क्यों मानी जाती हैं?
किसी भी लोकतंत्र में न्यायपालिका की सबसे बड़ी ताकत उसकी स्वतंत्रता और जनता का भरोसा है। सरकारें आती-जाती रहती हैं। राजनीतिक दल बदलते रहते हैं। अधिकारी बदलते रहते हैं। लेकिन अदालत से नागरिक यह उम्मीद करता है कि वहां उसकी सुनवाई निष्पक्ष होगी। इसीलिए जब कोई गरीब, कमजोर, छात्र, मजदूर या आम नागरिक अदालत का दरवाजा खटखटाता है, तो उसके लिए अदालत सिर्फ एक इमारत नहीं होती। वह उसकी आखिरी उम्मीद होती है।
इसलिए अदालतों की आलोचना करना लोकतंत्र विरोधी नहीं है। बल्कि लोकतंत्र में न्यायपालिका से सवाल पूछना भी नागरिक अधिकार का हिस्सा है। अगर कोई अदालत का फैसला गलत समझता है, तो उसे आलोचना का अधिकार है। लेकिन अदालतों की स्वतंत्रता की रक्षा करना भी उतना ही जरूरी है। यही संतुलन लोकतंत्र को मजबूत बनाता है।
अदालत को पक्ष नहीं, न्याय के साथ खड़ा होना चाहिए
दिल्ली में युवाओं के आंदोलन, पुलिस कार्रवाई और अदालतों में तत्काल सुनवाई से इनकार के इन घटनाक्रमों को किसी एक राजनीतिक दल या विचारधारा के चश्मे से देखने के बजाय एक बड़े लोकतांत्रिक सवाल के रूप में देखने की जरूरत है। अगर प्रदर्शनकारी गलत हैं, तो कानून के मुताबिक कार्रवाई हो।
अगर पुलिस ने कानून का पालन किया है, तो निष्पक्ष जांच के बाद यह सामने आए। और अगर पुलिस ने जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग किया है, तो उसकी भी जवाबदेही तय हो। लेकिन इन सबका फैसला तथ्यों और निष्पक्ष सुनवाई के आधार पर होना चाहिए। क्योंकि न्यायपालिका का सबसे बड़ा धर्म किसी एक पक्ष का समर्थन करना नहीं है।
न्यायपालिका का धर्म है-सुनना, जांचना और फिर न्याय करना। आज सवाल सिर्फ उन युवाओं का नहीं है, जिन्हें पुलिस की कार्रवाई में चोट लगी है। सवाल सिर्फ सोनम वांगचुक का नहीं है। सवाल सिर्फ जंतर-मंतर का नहीं है। सवाल उस आम नागरिक का है, जो यह मानकर अदालत जाता है कि अगर सत्ता उसकी बात नहीं सुनेगी, तो न्यायपालिका उसकी बात जरूर सुनेगी। इसलिए यह सवाल पूछना जरूरी है कि अगर सरकार नहीं सुनेगी, प्रशासन नहीं सुनेगा, पुलिस नहीं सुनेगी और अदालत भी कहेगी कि हमारे पास समय नहीं है… तो आखिर वह मजलूम जाए कहां? लोकतंत्र में अदालतें सिर्फ फैसला सुनाने की जगह नहीं होतीं।
वे उस नागरिक की आखिरी उम्मीद होती हैं, जिसके पास सत्ता नहीं होती, ताकत नहीं होती, पहुंच नहीं होती- बस इंसाफ की उम्मीद होती है। और जब कोई नागरिक उस उम्मीद के साथ अदालत की चौखट पर आता है, तो कम से कम उसकी बात सुनने का दरवाजा खुला रहना चाहिए। क्योंकि जिस दिन मजलूम को यह महसूस होने लगे कि उसकी फरियाद सुनने वाला कोई नहीं है, उस दिन सिर्फ एक नागरिक का भरोसा नहीं टूटता बल्कि लोकतंत्र की आत्मा भी कमजोर होती है।
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