लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता, बल्कि विश्वसनीय चुनावों से चलता है। और विश्वसनीय चुनावों की पहली शर्त है कि हर पात्र नागरिक बिना किसी भय, भेदभाव या प्रशासनिक बाधा के अपना मताधिकार प्रयोग कर सके। भारत का संविधान प्रत्येक वयस्क नागरिक को मतदान का अधिकार देता है। यह अधिकार केवल एक प्रशासनिक सुविधा नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा है। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
इसलिए जब मतदाता सूची से बड़ी संख्या में नाम हटने, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर लगातार सवाल उठने लगें, तो यह केवल विपक्ष और सत्ता के बीच का राजनीतिक विवाद नहीं रह जाता, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की विश्वसनीयता का प्रश्न बन जाता है। इसी पृष्ठभूमि में 23 विपक्षी दलों और एक निर्दलीय सांसद द्वारा भारत के मुख्य न्यायाधीश को संयुक्त पत्र लिखना एक महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाक्रम है। इस पत्र में केवल बिहार या पश्चिम बंगाल का मामला नहीं उठाया गया, बल्कि चुनाव आयोग की निष्पक्षता, मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया और मताधिकार से जुड़े व्यापक सवालों को न्यायपालिका के सामने रखा गया है।
चुनाव आयोग पर भरोसा लोकतंत्र की बुनियाद है
भारत का चुनाव आयोग विश्व की सबसे बड़ी चुनावी संस्था माना जाता है। दशकों तक उसकी निष्पक्षता पर देश ही नहीं, दुनिया को भी भरोसा रहा है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में आयोग के कई फैसलों और उसकी कार्यप्रणाली को लेकर लगातार सवाल उठे हैं। विपक्ष आरोप लगाता रहा है कि आयोग पहले जैसी स्वतंत्रता और दृढ़ता नहीं दिखा रहा।
दूसरी ओर आयोग और सरकार इन आरोपों को खारिज करते हुए कहते रहे हैं कि आयोग कानून के अनुसार अपने कर्तव्यों का पालन कर रहा है। लोकतंत्र में केवल निष्पक्ष होना ही पर्याप्त नहीं होता बल्कि निष्पक्ष दिखाई देना भी उतना ही आवश्यक होता है। यदि बड़ी संख्या में राजनीतिक दल किसी संवैधानिक संस्था की निष्पक्षता पर सार्वजनिक रूप से सवाल उठा रहे हैं, तो उन सवालों का उत्तर तथ्यों, पारदर्शिता और संवाद से दिया जाना चाहिए।
मतदाता सूची से नाम हटाना सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं
मतदाता सूची का समय-समय पर पुनरीक्षण आवश्यक है। मृत व्यक्तियों के नाम हटाना, दोहरी प्रविष्टियां समाप्त करना और अपात्र व्यक्तियों को सूची से बाहर करना चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है। लेकिन यदि इस प्रक्रिया के दौरान लाखों या करोड़ों लोगों के नाम सूची से हटने की बात सामने आती है, तो यह केवल तकनीकी प्रक्रिया नहीं रह जाती। ऐसे मामलों में तीन बुनियादी प्रश्न उठते हैं- १. क्या प्रभावित लोगों को पर्याप्त सूचना दी गई? २.क्या उन्हें अपनी बात रखने का अवसर मिला? ३.और क्या पूरी प्रक्रिया पारदर्शी, समान और भेदभावरहित रही? यदि इन प्रश्नों का स्पष्ट उत्तर नहीं मिलता, तो अविश्वास पैदा होना स्वाभाविक है।
लोकतंत्र में संदेह भी गंभीर विषय होता है
यह आवश्यक नहीं कि हर आरोप सही हो। यह भी आवश्यक नहीं कि चुनाव आयोग ने कोई गलती की ही हो। लेकिन जब करोड़ों मतदाताओं के नाम हटने के दावे सामने आएं, विभिन्न राज्यों में बड़ी संख्या में लोग मतदान से वंचित होने की शिकायत करें और विपक्षी दल सर्वोच्च न्यायपालिका का दरवाजा खटखटाएं, तो इन आशंकाओं को केवल राजनीतिक बयानबाजी कहकर खारिज कर देना पर्याप्त नहीं होगा। लोकतंत्र में भरोसा केवल परिणामों से नहीं, प्रक्रिया से बनता है।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी भी महत्वपूर्ण है
सर्वोच्च न्यायालय ने अपने हालिया आदेश में यह स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग नागरिकता का सत्यापन केवल मतदाता सूची तैयार करने के सीमित उद्देश्य से कर सकता है। इसका उपयोग किसी व्यक्ति को अन्य सरकारी अधिकारों या कल्याणकारी योजनाओं से वंचित करने के आधार के रूप में नहीं किया जा सकता।
यदि वास्तव में ऐसे मामले सामने आए हैं जहां मतदाता सूची से नाम हटने के कारण लोगों को अन्य सरकारी योजनाओं से भी वंचित किया गया, तो यह गंभीर प्रशासनिक और संवैधानिक प्रश्न है। मतदान का अधिकार और सामाजिक कल्याण योजनाएं अलग-अलग कानूनी व्यवस्थाएं हैं। एक का प्रभाव दूसरे पर नहीं पड़ना चाहिए।
संविधान सत्ता से बड़ा है
लोकतंत्र में चुनाव आयोग, न्यायपालिका, संसद और सरकार-सभी संवैधानिक संस्थाएं हैं। इनमें से कोई भी संस्था आलोचना से ऊपर नहीं है। जैसे न्यायपालिका के फैसलों पर कानूनी समीक्षा संभव है, संसद के कानूनों की न्यायिक समीक्षा हो सकती है, वैसे ही चुनाव आयोग की प्रक्रियाओं पर भी सवाल उठाए जा सकते हैं। किसी संस्था से सवाल पूछना उस संस्था का अपमान नहीं होता। संवैधानिक संस्थाओं की सबसे बड़ी ताकत यही है कि वे जनता के प्रति जवाबदेह होती हैं।
राजनीतिक दलों को भी आत्ममंथन करना होगा
यह भी सच है कि चुनाव सुधार का प्रश्न केवल आज का नहीं है। आज जो विपक्ष में हैं, उनमें से कई दल लंबे समय तक सत्ता में भी रहे हैं। चुनावी सुधार, मतदाता सूची की पारदर्शिता, राजनीतिक चंदे की जवाबदेही और निर्वाचन आयोग की संस्थागत स्वतंत्रता जैसे मुद्दों पर व्यापक सहमति पहले भी बन सकती थी। इसलिए यह अवसर केवल सरकार से सवाल पूछने का नहीं, बल्कि पूरे राजनीतिक वर्ग के आत्ममंथन का भी है।
आगे का रास्ता क्या हो?
यदि लोकतंत्र में विश्वास बनाए रखना है, तो कुछ बुनियादी कदमों पर गंभीरता से विचार होना चाहिए-मतदाता सूची के पुनरीक्षण की पूरी प्रक्रिया अधिक पारदर्शी बनाई जाए। जिन लोगों के नाम हटाए जाएं, उन्हें समयबद्ध सूचना और प्रभावी अपील का अवसर मिले। चुनाव आयोग समय-समय पर विस्तृत सार्वजनिक आंकड़े जारी करे कि कितने नाम किस कारण हटाए गए। सभी राजनीतिक दलों के साथ नियमित संवाद स्थापित किया जाए। चुनावी प्रक्रिया में तकनीक का उपयोग हो, लेकिन मानवीय और कानूनी सुरक्षा उपाय भी उतने ही मजबूत हों। लोकतंत्र की असली ताकत केवल मतपेटी में नहीं होती, बल्कि उस भरोसे में होती है जिसके साथ नागरिक मतदान केंद्र तक पहुंचता है।
यदि नागरिक को यह संदेह होने लगे कि उसका नाम बिना पर्याप्त कारण मतदाता सूची से हटाया जा सकता है, यदि राजनीतिक दल चुनावी प्रक्रिया पर लगातार प्रश्न उठाने लगें, और यदि संवैधानिक संस्थाओं के प्रति विश्वास कमजोर होने लगे, तो यह केवल चुनाव आयोग की चुनौती नहीं रह जाती बल्कि यह पूरे लोकतंत्र की चुनौती बन जाती है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है।
इसलिए यहां केवल निष्पक्ष चुनाव होना ही पर्याप्त नहीं, बल्कि हर नागरिक को यह विश्वास भी होना चाहिए कि उसका वोट सुरक्षित है, उसका अधिकार सुरक्षित है और उसकी आवाज़ किसी प्रशासनिक प्रक्रिया की भेंट नहीं चढ़ेगी। लोकतंत्र की रक्षा केवल चुनाव जीतने से नहीं होती। लोकतंत्र की रक्षा हर उस मतदाता से होती है, जिसका नाम मतदाता सूची में सम्मानपूर्वक दर्ज रहता है और जिसका वोट बिना किसी बाधा के मतपेटी तक पहुंचता है।
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