एक ऐतिहासिक फैसला या एक देर से आई शर्मिंदगी?19 साल! इतने सालों तक 12 मुस्लिम युवकों को आतंकवादी कहकर जेल में बंद रखा गया। और अब, बॉम्बे हाई कोर्ट ने साफ कहा है: “ये सारे बेगुनाह थे।” तो सवाल उठता है — इन बेगुनाहों की ज़िंदगी के 19 साल कौन लौटाएगा? और उन पुलिस अफसरों का क्या, जिन्होंने फर्जी केस गढ़े, टॉर्चर किया, और अदालत में झूठ बोला?
बॉम्बे हाई कोर्ट ने क्या कहा?:- 18 जुलाई 2024 को बॉम्बे हाई कोर्ट की दो सदस्यीय खंडपीठ (न्यायमूर्ति अनिल किलोर और न्यायमूर्ति एस.सी. चंदक) ने 7/11 मुंबई ट्रेन धमाके केस में दोषी ठहराए गए सभी 12 लोगों को बरी करते हुए कोर्ट ने कहा: अभियोजन पक्ष आरोपों को साबित करने में “पूरी तरह असफल” रहा। स्वीकारोक्तियाँ टॉर्चर की उपज थीं, स्वतःस्फूर्त नहीं। फॉरेंसिक, कॉल डेटा और बरामदगी सबूत बेहद कमजोर थे। MCOCA की स्वीकृति ही अवैध थी। हाई कोर्ट के इस फैसले में 671 पेजों में ATS और अभियोजन की जांच की धज्जियां उड़ाई गईं।
जांच में गंभीर खामियां:- 1. टॉर्चर से कबूलनामे: अभियुक्तों ने अदालत में बताया कि उन्हें बुरी तरह प्रताड़ित किया गया। कई कबूलनामे एक जैसे थे — ‘स्क्रिप्टेड’। मेडिकल रिकॉर्ड और हलफनामों ने टॉर्चर की पुष्टि की।
2. परिस्थिति साक्ष्य की कमजोरी:- किसी प्रत्यक्षदर्शी ने अभियुक्तों को धमाके वाली जगहों पर नहीं देखा। कथित बम-निर्माण स्थलों से कोई निर्णायक सबूत नहीं मिला, जो नक्शे और ट्रैवल रूट मिले, वो सार्वजनिक रूप से उपलब्ध थे।
3. कॉल डेटा रिकॉर्ड का झोल:- मोबाइल डेटा लोकेशन से साबित नहीं हुआ कि आरोपी धमाकों की जगह पर थे। कई नंबर अभियुक्तों से जुड़े ही नहीं जा सके।
4. फर्जी बरामदगियाँ और गवाहों की उलझन:- गवाहों के बयान परस्पर विरोधी थे। बरामद की गई चीजें बिना स्वतंत्र गवाह के मिलीं। एक गवाह पहले घाटकोपर केस में भी गवाही दे चुका था।
5. प्रेशर कुकर थ्योरी की हास्यास्पदता:- ATS ने कश्मीरी दिखने वाले युवकों द्वारा प्रेशर कुकर खरीदने की कहानी गढ़ी। लेकिन चार्जशीट में यह थ्योरी गायब थी। मुकदमे के अंतिम चरण में इस ‘कहानी’ को फिर से लाया गया।
6. MCOCA की अवैध स्वीकृति:- धारा 23(1) के तहत जो स्वीकृति जरूरी थी, उसे कोर्ट में कभी पेश ही नहीं किया गया। हाई कोर्ट ने इसे पूरी तरह अवैध करार दिया।
19 साल जेल में, बिना एक दिन की जमानत:-इन लोगों को ना जमानत मिली, ना बीमार रिश्तेदार की मौत पर पैरोल, ना कोविड-19 महामारी के दौरान कोई राहत। आज जब उन्हें रिहा किया गया, तो सिर्फ एक PR बॉन्ड पर — यानी बिना कोई पैसा जमा किए। क्या ये किसी लोकतांत्रिक देश के लिए शर्म की बात नहीं?
सवाल जो अब उठने ही चाहिए:- जिन पुलिस अफसरों ने झूठे सबूत गढ़े — उन पर क्या कार्रवाई होगी? क्या राज्य सरकार सार्वजनिक रूप से माफी मांगेगी? क्या इन निर्दोष लोगों को मुआवज़ा मिलेगा? क्या मीडिया संस्थानों पर जवाबदेही तय की जाएगी जिन्होंने उन्हें ‘आतंकी’ ठहराया? क्या अब असली दोषियों की फिर से तलाश शुरू होगी?
एक जैसी कहानी: मालेगांव ब्लास्ट की भी:- 2006 के मालेगांव बम धमाके में भी यही हुआ: मुस्लिम युवकों को पकड़ा गया, बाद में NIA ने हिंदुत्व आतंकियों को असली दोषी बताया, लेकिन जब तक ये सच सामने आया, कई बेगुनाहों की ज़िंदगियाँ बर्बाद हो चुकी थीं।
इनोसेंस नेटवर्क और वहीद शेख की भूमिका:- वहीद शेख 2015 में बरी हुए। उन्होंने “इनोसेंस नेटवर्क” शुरू किया। इस संगठन ने बाकी 12 अभियुक्तों की रिहाई की कानूनी लड़ाई लड़ी। वहीद शेख आज भारत की आतंकवाद विरोधी न्याय प्रणाली के सबसे मुखर आलोचकों में हैं।
न्याय हुआ या बस अन्याय की पुष्टि?:- बॉम्बे हाई कोर्ट का फैसला स्वागतयोग्य है, लेकिन काफी नहीं। यह सिर्फ न्याय की देरी नहीं, एक इंसानी त्रासदी का खुलासा है। इन निर्दोषों की रिहाई सिर्फ एक शुरुआत है। अब अगला कदम है — दोषी पुलिस और ATS अधिकारियों पर मुकदमा चलाना, मुआवज़ा और पुनर्वास देना, आतंकवाद की जांच के सांप्रदायिक एजेंडे को रोकना, UAPA और MCOCA जैसे कानूनों पर पुनर्विचार करना। जब तक यह नहीं होता — इस रिहाई की कोई कीमत नहीं। यह सिर्फ एक केस नहीं, भारत के लोकतंत्र की परीक्षा है।