पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में 125 साल पुराने गुरुद्वारा श्री गुरु सिंह सभा साहिब के एक हिस्से को नुकसान पहुंचाए जाने की घटना निश्चित रूप से निंदनीय है। किसी भी धर्म के पूजा-स्थल पर हमला केवल ईंट-पत्थरों को तोड़ना नहीं होता, बल्कि वह करोड़ों लोगों की आस्था, इतिहास और सांस्कृतिक विरासत पर हमला होता है। भारत सरकार ने इस घटना पर कड़ी प्रतिक्रिया दी, पाकिस्तान से जवाब मांगा, दोषियों के खिलाफ कार्रवाई और गुरुद्वारे के पुनर्निर्माण की मांग की। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
एक जिम्मेदार पड़ोसी देश के तौर पर यह प्रतिक्रिया स्वाभाविक भी है। लेकिन इसी के साथ एक बड़ा सवाल भी खड़ा होता है-क्या यही संवेदनशीलता, यही चिंता और यही नैतिकता भारत के भीतर रहने वाले अल्पसंख्यकों और उनके धार्मिक स्थलों के मामले में भी दिखाई देती है? सच तो यह है कि पाकिस्तान ही नहीं, दुनिया के किसी भी देश में किसी भी धर्म के पूजा-स्थल को नुकसान पहुंचाना स्वीकार नहीं किया जा सकता। चाहे वह गुरुद्वारा हो, मस्जिद हो, मंदिर हो, चर्च हो, बौद्ध विहार हो या किसी भी आस्था का धार्मिक स्थल। हर एक की सुरक्षा और सम्मान सभ्य समाज की पहचान है।
यदि भारत पाकिस्तान को यह सीख देता है कि वह अपने अल्पसंख्यकों और उनके धार्मिक स्थलों की रक्षा करे, तो यही कसौटी भारत पर भी समान रूप से लागू होती है। यहीं भाजपा सरकार और उसके वैचारिक परिवार से कुछ असहज सवाल पूछे जाने चाहिए। क्या कारण है कि पाकिस्तान में किसी गुरुद्वारे को नुकसान पहुंचने पर सरकार की संवेदनशीलता तुरंत दिखाई देती है, लेकिन जब भारत में मस्जिदों, मदरसों, दरगाहों या अन्य धार्मिक स्थलों पर बुलडोज़र चलते हैं, तब वही नैतिक आक्रोश कहीं दिखाई नहीं देता? अगर धार्मिक विरासत की रक्षा एक सार्वभौमिक मूल्य है, तो उसका पालन देश और धर्म देखकर क्यों किया जाए?
भारत के मुसलमान, ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन और अन्य अल्पसंख्यक कोई बाहरी लोग नहीं हैं। वे इसी मिट्टी के बेटे-बेटियाँ हैं। उनके पूर्वज भी इसी देश में पैदा हुए, यही उनकी मातृभूमि है। उनका डीएनए भी भारतीय है, उनका इतिहास भी भारतीय है और भारत के निर्माण में उनका योगदान भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना किसी और समुदाय का। ऐसे में उनसे ऐसा व्यवहार क्यों किया जा रहा है मानो उन्हें हर समय अपनी वफादारी साबित करनी पड़े?
पिछले कुछ वर्षों में देश ने कई ऐसे दृश्य देखे हैं जिन्होंने लोकतंत्र और संविधान में विश्वास रखने वालों को चिंतित किया है। कहीं गौ-रक्षा के नाम पर मॉब लिंचिंग हुई, कहीं भीड़ ने कानून अपने हाथ में लिया। कई मामलों में आरोपियों के प्रति राजनीतिक सहानुभूति भी देखने को मिली। फिर बुलडोज़र राजनीति का दौर शुरू हुआ, जिसमें अदालत का फैसला आने से पहले ही लोगों के घरों और दुकानों पर कार्रवाई होने लगी। इसके बाद कई राज्यों में मस्जिदों, मदरसों और दरगाहों पर भी प्रशासनिक कार्रवाई को लेकर गंभीर विवाद खड़े हुए। इन कार्रवाइयों में कई बार यह आरोप लगा कि कानून का इस्तेमाल समान रूप से नहीं, बल्कि चुनिंदा समुदायों के खिलाफ किया जा रहा है।
इसके साथ-साथ नफ़रत फैलाने वाले भाषण, आर्थिक बहिष्कार की अपील, सामाजिक अलगाव और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की घटनाएं भी लगातार चर्चा में रही हैं। मतदाता सूचियों से नाम हटने, नागरिकता और पहचान से जुड़े विवादों तथा कुछ राजनीतिक बयानों ने भी अल्पसंख्यकों के बीच असुरक्षा की भावना को बढ़ाया है। इन मुद्दों पर सरकार का यह कहना रहा है कि उसकी सभी कार्रवाइयाँ कानून के दायरे में और बिना किसी धार्मिक भेदभाव के होती हैं, जबकि आलोचकों का आरोप है कि व्यवहार में समानता दिखाई नहीं देती। यही वह विरोधाभास है जिस पर लोकतांत्रिक बहस होनी चाहिए।
भारत की ताकत हमेशा उसकी विविधता रही है। यह देश इसलिए महान नहीं बना कि यहां केवल एक धर्म या एक संस्कृति है, बल्कि इसलिए कि यहां अनेक धर्म, अनेक भाषाएं, अनेक परंपराएं और अनेक पहचानें साथ-साथ विकसित हुईं। संविधान ने भी इसी विचार को स्वीकार किया है कि राज्य सभी नागरिकों के साथ समान व्यवहार करेगा और हर धर्म को बराबर सम्मान देगा। इसलिए यदि भारत पाकिस्तान से कहता है कि वह अपने यहां गुरुद्वारों और अन्य अल्पसंख्यक धार्मिक स्थलों की रक्षा करे, तो भारत को भी यह सुनिश्चित करना होगा कि यहां किसी मस्जिद, मदरसे, चर्च, गुरुद्वारे, दरगाह या मंदिर के साथ अन्याय न हो।
नैतिक अधिकार केवल शब्दों से नहीं, बल्कि अपने आचरण से प्राप्त होता है। विदेश नीति में नैतिकता तभी प्रभावशाली होती है जब घरेलू नीति भी उसी कसौटी पर खरी उतरे। यदि हम पड़ोसी देशों में अल्पसंख्यकों के अधिकारों की चिंता करते हैं, तो अपने देश के अल्पसंख्यकों के अधिकारों, सम्मान और सुरक्षा के प्रति भी उतने ही गंभीर होना होगा। यही लोकतंत्र की असली परीक्षा है और यही संविधान की भावना भी।
आज ज़रूरत इस बात की है कि सरकारें राजनीतिक लाभ से ऊपर उठकर यह स्पष्ट संदेश दें कि भारत में किसी भी धर्म के पूजा-स्थल पर हमला, किसी भी समुदाय के खिलाफ नफ़रत, हिंसा या भेदभाव स्वीकार नहीं किया जाएगा। कानून सबके लिए समान होगा और न्याय भी सबको समान रूप से मिलेगा। क्योंकि अंततः सवाल केवल पाकिस्तान का नहीं, बल्कि उस नैतिक मानक का है जिसे भारत पूरी दुनिया के सामने प्रस्तुत करना चाहता है। और आखिर में वही शेर इस पूरे विरोधाभास को बयान करता है—ग़ैरों पे करम”अपनों पे सितम, ऐ संघ! ये ज़ुल्म न कर, रहने दे अभी थोड़ा-सा भरम।
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