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Home»एलान विशेष

पुलिस हर बार बेगुनाहों को फंसा कर गुन्हेगारों को क्यों बचा रही है ?

adminBy adminJuly 30, 2025 एलान विशेष No Comments4 Mins Read
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मुंबई लोकल ब्लास्ट केस में जेल से रिहा होते निर्दोष मुस्लिम युवक, 19 साल बाद न्याय
image credit : tribuneindia.com
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19 साल जेल में सड़ते रहे, अब कहा गया ‘बेगुनाह हो’ — क्या यही है भारत की न्याय व्यवस्था? क्या पुलिस को फर्जी मुकदमों में निर्दोषों को फँसाने की खुली छूट है? क्या मुसलमान होना ही शक की बुनियाद बन चुका है?

2006 में मुंबई की लोकल ट्रेनों में धमाके हुए, 189 मौतें हुईं — और सरकार को चाहिए था कोई ‘जिम्मेदार’। बस, मुस्लिम नाम चाहिए था — और 12 मुस्लिम युवकों को उठा लिया गया। 19 साल जेल में रहे। टॉर्चर, फर्जी कबूलनामे, कमजोर सबूत, झूठे गवाह — और 2024 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा: “ये सभी निर्दोष थे। कोर्ट ने क्या कहा?

कबूलनामे टॉर्चर से लिए गए थे, उनकी मर्जी से नहीं । फॉरेंसिक और कॉल डेटा में कोई दम नहीं। MCOCA की मंज़ूरी ही अवैध थी। गवाह झूठे, बरामदगी फर्जी, ATS की जांच ‘कहानी’ थी। तो अब सवाल यह है — इन 19 सालों का हिसाब कौन देगा?

MCOCA, TADA, UAPA — पुलिस को मिले “सुपरपावर”, लेकिन ज़िम्मेदारी नहीं?

क्या यह सवाल नहीं उठना चाहिए कि जब पुलिस को ऐसे कड़े कानून दिए जाते हैं, तो अगर वह बेगुनाह को आतंकवादी बना दे, तो उस पुलिसवाले पर केस क्यों नहीं चलता? क्यों नहीं होता इन मामलों में: झूठे केस गढ़ने वाले पुलिस अफसरों का निलंबन? क्यों ATS अधिकारियों पर मुकदमा नहीं चलता ? क्यों राजनीतिक दबाव में काम करने वालों की जवाबदेही तय नहीं होती ? ये कोई पहला मामला नहीं है जिसे नज़र अंदाज़ किया जाए, जैसे मुंबई ब्लास्ट में हुआ, वैसे ही मालेगांव 2006 में भी हुआ, वहां भी मुस्लिम युवकों को ही उठाया गया। 2011 में ATS की थ्योरी गिरी, और 2016 में NIA ने कहा: असली दोषी हिंदुत्व आतंकी थे। लेकिन मुस्लिम युवकों की ज़िंदगी तबाह हो चुकी थी। 2002 में अकबरुद्दीन हत्याकांड में 5            मुसलमानों को फंसाया गया, कोर्ट ने कहा सबूत नहीं थे। 2008 में दक्षिण भारत में सिमी मामलों में 25 से ज़्यादा मुसलमानों को UAPA के तहत फंसाया गया, सब बरी हो गए। 2008 में ही बटला हाउस केस से जुड़े मामले में गिरफ्तार  6 मुसलमान बाद में निर्दोष छूटे। और ये सिर्फ कुछ नाम हैं — दर्जनों मामलों में मुसलमान फर्जी आतंकी बनाकर सालों जेल में सड़ाए गए। क्या ये सिलसिला रुकने वाला है? मार्च 2020 को लॉकडाउन में निज़ामुद्दीन मरकज़ में कुछ लोग फँसे रह गए — लेकिन गोदी मीडिया और दिल्ली पुलिस ने इन्हें बना दिया “कोरोना जिहाद का चेहरा”। 16 एफआईआर बानी, 195 विदेशी और 70 भारतीयों को गुन्हेगार बनाया गया, ज़हरीले न्यूज़ डिबेट चले, मस्जिदों को “संक्रमण केंद्र” कहा गया। 2021 में हाई कोर्ट ने कहा: “चार्जशीट में कुछ भी नहीं था”। तो फिर ये नफ़रत, बदनामी और अपमान किसने फैलाया? क्या दिल्ली पुलिस के अफ़सरों पर कार्रवाई हुई? क्या मीडिया ने माफ़ी माँगी? आज MCOCA, UAPA, TADA जैसे क़ानूनों में पुलिस को जबरदस्त अधिकार दिए गए हैं — लेकिन अगर वो इनका दुरुपयोग करे, तो कोई सज़ा नहीं। मुस्लिम जमातें और संगठनाएं खामोश हैं। ये मांग क्यों नहीं करते कि, किसी मामले में अभियुक्त बेगुनाह साबित होता है, तो जांच अधिकारी, थाना प्रभारी, ATS प्रमुख, सब पर केस चले।  सस्पेंड किया जाए। जेल भेजा जाए। जो झूठा गद्दार और मक्कार कुत्ता मीडिया TRP बटोरने के लिए मुसलमानों को ‘आतंकी’, ‘गद्दार’, ‘सुपर स्प्रेडर’ कहकर झूठ फैलाता है उन पर भी कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। झूठी रिपोर्टिंग करने वाले एंकरों और संपादकों पर मानहानि और आपराधिक साज़िश का केस होना चाहिए ।“मीडिया ट्रायल” को कानून में अपराध माना जाए। 2024 में महाराष्ट्र सरकार ने एक और ‘सुरक्षा कानून’ पास किया — जिसमें पुलिस को बिना कोर्ट की इजाज़त के निगरानी, पूछताछ और हिरासत का अधिकार दे दिया गया। क्या ये पुलिस राज नहीं है? क्या इसका सबसे बड़ा शिकार फिर मुसलमान नहीं बनेगा? अंतिम सवाल — अगर मुसलमान होना ही अपराध है, तो संविधान का क्या मतलब बचा है? क्या पुलिस की जांच हमेशा मज़हब देखकर ही होती रहेगी ? क्या कोर्ट भी सालों तक आंखें मूंदे बैठे रहेंगे? क्या मीडिया को हेट स्पीच फैलाने की आज़ादी संविधान से ऊपर है? और सबसे अहेम सवाल ये है कि आखिर कब तक बेगुनाहों को फंसा कर गुन्हेगारों को छोड़ा जाता रहेगा ? इसलिए अगर असली गुनेहगारों को सज़ा देनी है तो फर्जी केस बनाने वाले पुलिसवालों पर एफआईआर और गिरफ्तारी होनी चाहिए। बेगुनाहों की ज़िंदगी बरबाद करने वालों पर क्रिमिनल केस चलना चाहिए। निर्दोषों को मुआवज़ा, पुनर्वास और सरकारी माफी मिलनी चाहिए। मीडिया ट्रायल पर कानूनन रोक लगनी चाहिए। सभी ‘सुरक्षा कानूनों’ की समीक्षा और संशोधन होना चाहिए।  क्योंकि अगर पुलिस और मीडिया को छूट मिलती रही — तो अगला बेगुनाह आप भी हो सकते हैं। इस रिपोर्ट को जितना हो सके शेअर कीजिए — ताकि झूठ के पर्दे हटें और सच सामने आए। ये भारत के लोकतंत्र की परीक्षा है — और हम सब इसके गवाह हैं।

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