- अगर अदालतों के पास भी नागरिकों की चींख सुनने का समय नहीं, तो मजलूम आखिर जाएं कहां?
- गुजरात में “कट्टरतावाद विरोधी पथक”की स्थापना…
- मतदाता सूची से नाम हटना नागरिकता खत्म होना नहीं- सुप्रीम कोर्ट
- बिना नेम प्लेट और नंबर वाले ये लोग कौन हैं? पुलिस की वर्दी में छिपे चेहरों का सच सामने आना चाहिए
- सवाल एक अनशन का नहीं, पूरी शिक्षा व्यवस्था की जवाबदेही का है
- ग़ैरों पे करम-अपनों पे सितम? पाकिस्तान को नसीहत देने से पहले भारत को भी आईना देखने की ज़रूरत
- जब जज का नाम इंसाफ़ से बड़ा बना दिया जाए, तो समझ लीजिए संविधान कठघरे में खड़ा है
- मतदाता सूची या लोकतंत्र की सूची? चुनाव आयोग पर उठते सवालों का जवाब अब जरूरी है
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15 अगस्त 2025 का दिन भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में सिर्फ़ झंडा फहराने का दिन नहीं रहा। इस बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले से अपने संबोधन में RSS को “दुनिया का सबसे बड़ा NGO” बताते हुए उसके सौ वर्षों को “गर्व और स्वर्णिम अध्याय” करार दिया। असली सवाल:- क्या प्रधानमंत्री स्वतंत्रता दिवस के मंच को किसी वैचारिक संगठन का महिमामंडन करने के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं? क्या RSS, जिसने स्वतंत्रता संग्राम में भाग नहीं लिया और कई बार प्रतिबंधित हुआ, उसकी “राष्ट्र सेवा” की तस्वीर गढ़ना इतिहास को पलटने की कोशिश है? क्या यह संदेश देश की…
image source : jansatta.com 📢 आरएसएस शताब्दी वर्ष की योजना और राजनीतिक बहस ज्यादातर मुस्लिम विरोधी गतिविधियां बदस्तूर जारी रहीं क्योंकि उनके खिलाफ किया जाने वाला प्रोपेगेंडा संघ परिवार का मुख्य हथियार है। जब देश में कोविड-19 फैला तो इस त्रासदी का उपयोग भी मुसलमानों का और अधिक दानवीकरण करने के लिए किया गया और महामारी का ठीकरा दिल्ली में चल रहे तबलीगी जमात सम्मेलन पर फोड़ने की कोशिश की गई। कोरोना जेहाद, कोरोना बम जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया जाने लगा और इसके साथ ही फेरी लगाकर सामान बेचने वाले मुसलमानों का हिन्दू बस्तियों में बहिष्कार किया गया। आगामी…
सय्यद मोईनुद्दीन बड़ेसाब (मुख्य संपादक) भाग 1 — इतिहास के पन्नों में दबा सच:- भारत की आज़ादी की कहानी सिर्फ़ एक धर्म, जाति या भाषा की नहीं है — यह हर भारतीय की कुर्बानियों से लिखी गई है। लेकिन अफ़सोस, आज़ादी के कई सुनहरे पन्नों में मुसलमानों के योगदान को या तो छोटा करके दिखाया गया, या पूरी तरह भुला दिया गया। 1857 की पहली जंग-ए-आज़ादी में मुसलमानों की भूमिका निर्णायक थी। मौलवी अहमदुल्लाह शाह को अंग्रेज़ “रामपुर का शेर” कहते थे — उन्होंने फ़ैज़ाबाद और शाहजहांपुर में अंग्रेज़ों को कड़ी टक्कर दी [1]। बख़्त ख़ाँ, तोपख़ाने के माहिर, दिल्ली…
15 अगस्त 1947 — वो दिन, जब हमने अंग्रेज़ों की गुलामी की जंजीरें तोड़ीं। लेकिन आज, 78 साल बाद, उसी दिन हमारी अपनी चुनी हुई सरकार कहें या चोरी के वोटों से बनी सरकार पता नहीं लेकिन हमें बता रही है — क्या खाना है और क्या नहीं। महाराष्ट्र के कल्याण-डोंबिवली, मालेगांव, औरंगाबाद और नागपुर नगर निगमों ने आदेश जारी कर दिया — स्वतंत्रता दिवस पर मांस की बिक्री बंद। और फिर देखते ही देखते, ये मामला राजनीति, धर्म, संस्कृति और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बड़े विवाद में बदल गया। ये पाबंदी किस तर्क पर?:- स्वतंत्रता दिवस कोई धार्मिक पर्व नहीं।…
नागरिकता संशोधन कानून (CAA) लागू होने के साथ ही देश में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRIC/NRC) की चर्चा फिर तेज हो गई है। असम में NRC लागू करने के दौरान लाखों लोगों को अपनी नागरिकता साबित करने के लिए पुराने दस्तावेज़ देने पड़े थे, और जिनके पास कागज़ नहीं थे, वे लिस्ट से बाहर हो गए। माना जा रहा था कि 2019 के चुनाव में बीजेपी को अकेले बहुमत न मिलने से NRC जैसी प्रक्रिया पूरे देश में जल्दी नहीं आएगी। लेकिन बिहार और महाराष्ट्र में जो हो रहा है, वह संकेत देता है कि यह प्रक्रिया धीरे-धीरे अलग-अलग तरीकों से…
इस वक़्त देश में देशके सबसे अहेम मुद्दे पर बहस जारी है हालांकि बहुत पहले इस मुद्दे पर विपक्ष को धयान देने की ज़रूरत थी, अगर विपक्ष पहले ही इस मुद्दे पर ध्यान देता तो शायद आज देश की तस्वीर कुछ और ही होती, जी हाँ भारत का लोकतंत्र जिसे जनता की ताकत पर चलना चाहिए वो आज एक पार्टी की ‘वोट चोरी’ मशीन परचल रहा है। राहुल गांधी ने महादेवपुरा का जो कच्चा-चिट्ठा खोला है उससे तो चुनाव आयोग की नींद उड़ जानी चाहिए थी…लेकिन हुआ उल्टा — आयोग ने आरोपों की जांच करने के बजाय राहुल को ही…
दोस्तों इस वक़्त महाराष्ट्र में एक नया तमाशा चल रहा है ! हर शहर, हर नगर परिषद, हर महापालिका में एक तोतले साहब लोगों के डॉक्यूमेंट्स जांचते फिर रहे हैं, महाराष्ट्र के स्थानीय मुसलमानों को बांग्ला देशी घोषित कर रहे हैं। साथ में नफरत भी फैला रहे हैं, जिनके पास न कोई संवैधानिक पद है न कोई वोट चोरी की कुर्सी ? फिर भी सुरक्षा ऐसी जैसे देश के मंत्री को दी जाती है- “लेकिन असली सवाल आपके, मेरे, हमारे टैक्स के पैसों से इन्हे सिक्योरिटी क्यों दी जा रही है ? “कोई मंत्री नहीं, कोई सांसद नहीं, कोई संवैधानिक…
भारतीय लोकतंत्र की सबसे अहम नींवों में से एक है – न्यायपालिका की निष्पक्षता। लेकिन जब एक राजनीतिक पार्टी की पूर्व प्रवक्ता को उच्च न्यायालय की न्यायाधीश नियुक्त किया जाता है, तो सवाल उठते हैं – और उठने भी चाहिए। बॉम्बे हाईकोर्ट में आरती साठे की जज के रूप में नियुक्ति ने यही स्थिति उत्पन्न की है। आरती साठे भाजपा की महाराष्ट्र इकाई की प्रवक्ता रह चुकी हैं। ऐसे में उनका सीधे न्यायपालिका के सर्वोच्च स्तरों में से एक पर पहुंच जाना न केवल नैतिकता और निष्पक्षता पर सवाल खड़े करता है, बल्कि संविधान के सिद्धांतों को भी चुनौती देता…
यरुशलम का अल-अक्सा मस्जिद परिसर — सदियों से आस्था, संघर्ष और संधियों का केंद्र। लेकिन हाल ही में इसराइल के कट्टरपंथी राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री इतेमार बेन-ग्विर की इस स्थल पर ‘प्रार्थना यात्रा’ ने एक बार फिर वो ख़ौफ़ जगा दिया है जिसे फ़लस्तीनी दशकों से महसूस कर रहे हैं:”क्या अल-अक्सा अगला निशाना है?” ‘यात्रा’ या ‘घोषित अतिक्रमण’?:- बेन-ग्विर की इस यात्रा को सिर्फ़ एक धार्मिक ‘अधिकार’ के रूप में पेश किया जा रहा है, लेकिन तस्वीरें कुछ और कहती हैं: उन्होंने वहां यहूदी प्रार्थना सभा का नेतृत्व किया — जो दशकों पुरानी उस व्यवस्था का सीधा उल्लंघन है जिसके तहत…
डॉ. ताहेर शेख- लातूर — महाराष्ट्र का वह शहर जो कभी शिक्षा और प्रगति के लिए जाना जाता था, अब धीरे-धीरे धार्मिक कट्टरता और नफ़रत की आग में झुलसने लगा है। 03 अगस्त 2025 को विवेकानंद पुलिस चौकी क्षेत्र में हुई एक गंभीर घटना ने यह साफ कर दिया कि ये महज़ इत्तेफ़ाक नहीं, बल्कि सोची-समझी साज़िश है। सोशल मीडिया बना नफ़रत का अखाड़ा! झूठी पोस्ट्स, एडिट किए गए वीडियो, भड़काऊ कमेंट्स, और धार्मिक भावनाएं भड़काने वाले मेसेजेस — यह सब अब लातूर की सोशल मीडिया टाइमलाइन का हिस्सा बन चुके हैं। सवाल ये है: ये सब कौन फैला रहा…