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Home»एलान विशेष

महाराष्ट्र में बीफ पर पाबंदी: क़ुरैशियों की हड़ताल या किसानों की त्रासदी का प्रतीक?

adminBy adminJuly 27, 2025 एलान विशेष No Comments6 Mins Read
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गांव के पशु बाजार में वीरानी, किसान की आंखों में चिंता, बीफ बैन से बंद हुआ कारोबार और टूटी उम्मीदें।
बीफ़ बैन या राजनीतिक हथियार? | किसान, कसाई, गरीब सब बर्बाद — कौन है ज़िम्मेदार?
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महाराष्ट्र में क़ुरैशी जमात द्वारा बीफ कारोबार को पूरी तरह बंद करने का फ़ैसला किया गया जिसके बाद महाराष्ट्र भर में जानवरों के बाजार ठप हो गए हैं जिसका सबसे ज़्यादा असर किसानों पर पढ़ रहा है। सोशल मीडिया पर गरीब किसान गौरक्षकों, बजरंगदल , विहिप और सरकार को लेकर नाराज़गी जताते नज़र आ रहे हैं। क़ुरैशी जमात का ये निर्णय केवल एक धार्मिक या राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं है — यह संविधान, अर्थव्यवस्था और सामाजिक संरचना के खिलाफ सत्ता के जरिए थोपे गए एकतरफा युद्ध का जवाब है। महाराष्ट्र में हर दिन लगभग 30,000 से 35,000 जानवरों की कटाई होती थी। एक औसत जानवर की कीमत ₹20,000 मानी जाए, तो सिर्फ खरीद का दैनिक कारोबार ही ₹60-70 करोड़ का था। अब इस पर पूरी तरह ताला लग चुका है। क़ुरैशी समाज, कसाई, ट्रांसपोर्टर, वेटनरी डॉक्टर्स, चमड़ा उद्योग, होटल इंडस्ट्री – सब चौपट। लेकिन असली सवाल ये है: क्या ये बंदी सिर्फ मुसलमानों के खिलाफ़ है? या ये हज़ारों किसानों, कसाइयों, ट्रांसपोर्टरों, चर्मकारों और उपभोक्ताओं की रीढ़ तोड़ने वाला फैसला है? गरीब और आम आदमी के लिए बीफ एक सस्ता प्रोटीन स्रोत था। अब इसके जाने से मटन और चिकन के दाम के साथ साथ सब्ज़ी तरकारी और दालों के दामों में भी 30-40% की वृद्धि हो सकती है। वहीं होटल इंडस्ट्री को प्रति महीने करोड़ों का घाटा हो सकता है। सबसे ज़्यादा बोझ किसानों पर पड़ेगा एक बैल को ज़िंदा रखना ₹100-₹150/दिन का खर्च है। बूढ़े बैल जो खेत जोतने लायक़ नहीं — न तो उन्हें बेचा जा सकता है, न मारा जा सकता है। किसान जो पहले 10-15 हजार में ऐसे जानवर बेच देते थे, अब उन्हें ज़िंदा रखने में हर महीने ₹2,000 से ज्यादा का खर्च झेलना पड़ेगा। क्योंकि बूढ़े जानवरों को न बेच पाने के कारण किसानों पर आर्थिक बोझ बढ़ेगा।  इसके अलावा चमड़ा उद्योग, हड्डी, खाद, ट्रांसपोर्ट व्यवसाय भी सब ठप हो जायेंगे। 2015 में जब ये क़ानून बनाया गया था उसी वक़्त ये क़दम उठाना चाहिए था, देर आए दुरुस्त आए, कुरैशी जमात का ये फैसला सही है लेकिन बहुत देर से उठाया गया है। क़ुरैशी समाज का कदम प्रतीक है — अगर यही बंदी लंबे समय तक रही, तो महाराष्ट्र की ग्रामीण अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो जाएगी। महाराष्ट्र एनीमल प्रिजर्वेशन (संशोधन) एक्ट, 2015 के तहत: गाय, बैल और बैलड़े की हत्या पर पूरी तरह से रोक। यहां तक कि बूढ़े और काम के लायक़ न रहे जानवरों को भी नहीं काटा जा सकता। अगर कोई गोमांस रखे हुए पाया जाता है (चाहे वो बाहर से लाया गया हो), तो उसे भी 5 साल की जेल और 10,000 जुर्माना। पहले सिर्फ गाय की हत्या पर रोक थी, लेकिन इस संशोधन के बाद बैल को भी इस सूची में जोड़ दिया गया — जबकि ये बूढ़े जानवर किसान के लिए बोझ बन चुके होते हैं। ये बदलाव देवेंद्र फडणवीस सरकार ने सत्ता में आते ही किया था।यह क़ानून हिन्दुत्व विचारधारा के उन गुटों के लिए बनाया गया जो “गाय माता” को धार्मिक पहचान का औज़ार बनाकर मुसलमानों और दलितों को टारगेट करते रहे हैं। इस कानून ने तथाकथित ‘गोरक्षक’ गिरोहों को लाइसेंस दे दिया —मुसलमानों को ट्रक में गाय ले जाते देख पीट-पीटकर मार डालने का। पुलिस, गौरक्षक और हिंदुत्ववादी संगठनों को हफ्ता वसूली का, नेताओं को चढ़ावा और मुसलमानों को जेल भिजवाने का। इस कानून के बहाने हिंदुत्ववादी गुंडों ने “गोरक्षा” के नाम पर लिंचिंग उद्योग खड़ा किया। जगह-जगह मुस्लिमों को पकड़कर मारा गया। पुलिस-प्रशासन इन गोरक्षकों को संरक्षण और हिस्सेदारी देता रहा। बीफ़ ट्रांसपोर्ट करने वाले ट्रकों से हफ्ता वसूली होने लगी। किसान सरकार से पूछे कि अगर बूढ़े जानवर काटे नहीं जा सकते, तो…? क्या सरकार इन्हें ख़रीदकर गौशालाओं को सौंपेगी? क्या सरकार हर किसान को हर जानवर के लिए 2,000 महीना भत्ता देगी? या फिर किसान भूखा मरे, आत्महत्या करे, और उसका गोवंश “रक्षित” रहे”? अगर सरकार किसानों और गरीबों का कल्याण चाहती है तो, बूढ़े और अनुपयोगी जानवरों की कटाई की अनुमति दी जाए। मज़हबी राजनीति से परे वैज्ञानिक दृष्टिकोण से नीति बने। जब तक कानून बदले नहीं: सरकार किसानों से पुराने जानवर खरीदकर गौशालाओं को दे। गोरक्षा के नाम पर हिंसा और वसूली करने वालों पर सख़्त कार्रवाई हो। ये सिर्फ बीफ की बात नहीं है, ये सत्ता के ज़रिए रोज़गार, किसान और अल्पसंख्यकों को दबाने का मॉडल है। जब तक सरकार गाय को “माता” की तरह पालने की ज़िम्मेदारी नहीं उठाती, तब तक कानून थोपना केवल राजनीतिक पाखंड और आर्थिक आत्मघात है। क्या सरकार सच में गायों से प्रेम करती है? अगर सरकार वाकई ‘गौमाता’ की सेवा चाहती है, तो: वह हर बूढ़े जानवर को किसानों से सरकारी रेट पर खरीदकर गोरक्षा केंद्रों को क्यों नहीं सौंपती? या फिर वो हर गांव में सरकारी गौशालाएं क्यों नहीं खोलती जहां इन जानवरों की देखरेख हो सके? हकीकत ये है कि न तो सरकार ये करती है और न ही कोई नियोजन है। इसका असली मकसद है—गौमाता की आड़ में गौरक्षकों को खुली छूट देना, ताकि वो मुसलमानों को पीट सकें, क़त्ल कर सकें और सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल कर सकें। बाज़ार और सड़कों पर कथित गौरक्षक आज ‘गुंडा लाइसेंस’ के साथ चलते हैं। ये लोग बूढ़े जानवर ले जा रहे किसी भी ट्रक को रोकते हैं, बिना जांच या आदेश के मारपीट करते हैं, और पुलिस से मिलीभगत के ज़रिए हफ्ता वसूली तक करते हैं। यह गौरक्षा नहीं, गिरोहबाज़ी है, जिसे सरकार ने राजनीतिक संरक्षण दे रखा है। सवाल ये है कि क्या कानून केवल मुसलमानों और क़ुरैशियों के लिए है? बड़े स्लॉटर हाउस क्यों खुले हैं? एक और पाखंड देखिए—छोटे कसाई अगर जानवर काटें तो देशद्रोही, लेकिन बड़े कॉर्पोरेट स्लॉटर हाउस और मीट प्लांट्स खुलेआम चल रहे हैं, क्योंकि उनके पास पैसा और राजनीतिक पहुंच है। इन स्लॉटर हाउसों में जानवर कौन ज़बह करता है? क्या वहां क़ुरैशी या मुसलमानों का प्रवेश प्रतिबंधित है? अगर सरकार को सच में धर्म की परवाह है, तो इन सभी बड़े स्लॉटर हाउस को भी बंद किया जाए—न केवल बूचड़खानों को बल्कि मांस निर्यात को भी। सभी बड़े स्लॉटर हाउस बंद करना और मांस निर्यात पूरी तरह रोकना। या फिर ईमानदारी से स्वीकार करना कि ये प्रतिबंध मुसलमानों और पिछड़े तबकों को निशाना बनाने का हथियार है, ‘गौमाता’ सिर्फ बहाना है। जब तक यह दोहरा चरित्र जारी रहेगा, भारत का किसान, मज़दूर और अल्पसंख्यक इस हिंदुत्ववादी झूठ का सबसे बड़ा शिकार बना रहेगा।

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