राष्ट्रीय सुरक्षा की जरूरत या अल्पसंख्यकों में डर का माहौल… लोकतंत्र में सरकार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी नागरिकों के जीवन और संपत्ति की रक्षा करना, कानून-व्यवस्था बनाए रखना और देश की सुरक्षा सुनिश्चित करना है. साथ ही भारतीय संविधान हर नागरिक को समान अधिकार, धर्म की आज़ादी, सम्मान के साथ जीने का अधिकार और कानून के सामने बराबरी की गारंटी देता है. इसलिए राष्ट्रीय सुरक्षा और नागरिकों की आज़ादी, दोनों एक मजबूत लोकतंत्र के लिए समान रूप से जरूरी हैं. एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
हाल ही में गुजरात सरकार ने पुलिस विभाग के अंतर्गत एंटी-रैडिकलाइजेशन सेल बनाने की घोषणा की है. सरकार का कहना है कि इसका उद्देश्य खासकर युवाओं को कट्टरपंथी विचारों, इंटरनेट पर फैलाए जा रहे उग्रवादी प्रचार और आतंकवादी संगठनों के प्रभाव से बचाना है. सरकार इसे आतंकवाद रोकने की एक एहतियाती पहल बता रही है.
आतंकवाद और हर तरह की हिंसक सोच के खिलाफ कार्रवाई करना हर सरकार का कर्तव्य है। लेकिन यह भी जरूरी है कि ऐसी व्यवस्था पूरी पारदर्शिता, निष्पक्षता और कानून के दायरे में काम करे. लोगों के मन में यह सवाल उठ रहा है कि कहीं इसका इस्तेमाल किसी एक धर्म या समुदाय पर ज्यादा निगरानी रखने के लिए तो नहीं किया जाएगा.
अब तक गुजरात सरकार ने इस सेल की स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) सार्वजनिक नहीं की है. हालांकि कुछ मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया है कि इसके तहत मुस्लिम समाज से जुड़ी कुछ धार्मिक पहचान, दाढ़ी, नकाब, “इंशाअल्लाह”, “माशाअल्लाह”, “सुभानअल्लाह” जैसे शब्दों के इस्तेमाल, उलेमा, मस्जिदों, मदरसों और कुछ अल्पसंख्यक संस्थाओं के ट्रस्टियों तथा इमामों के बैंक खातों पर भी नजर रखी जा रही है. इन दावों के कारण मुस्लिम समाज के एक वर्ग में चिंता और डर का माहौल देखा जा रहा है.
रैडिकलाइजेशन क्या है?
रैडिकलाइजेशन(कट्टरतावाद )का मतलब है किसी व्यक्ति का धीरे-धीरे ऐसी सोच को अपनाना, जिसमें हिंसा, नफरत या गैर-कानूनी तरीकों को सही माना जाए. यह केवल धार्मिक कट्टरता तक सीमित नहीं है. इसमें राजनीतिक उग्रवाद, जातीय और नस्लीय नफरत, भाषाई हिंसा, ऑनलाइन नफरत फैलाने वाले समूह और दूसरी तरह की चरमपंथी विचारधाराएं भी शामिल हैं. इसलिए सरकार की कार्रवाई हर प्रकार की कट्टरता के खिलाफ समान रूप से होनी चाहिए.
अल्पसंख्यकों की चिंता क्यों?
पिछले कुछ वर्षों में देश में मॉब लिंचिंग, नफरत भरे भाषण, सांप्रदायिक तनाव, बुलडोजर कार्रवाई, धार्मिक विवाद और सोशल मीडिया पर भड़काऊ संदेश जैसी घटनाओं पर लगातार चर्चा होती रही है. ऐसे माहौल में एंटी-रैडिकलाइजेशन सेल बनने से कुछ लोगों को यह डर है कि कहीं इसका असर किसी एक समुदाय पर ज्यादा न पड़े। सरकार का उद्देश्य चाहे सुरक्षा ही क्यों न हो, लेकिन जनता का विश्वास बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है.
संविधान क्या कहता है?
भारतीय संविधान सभी नागरिकों को समान अधिकार देता है.
अनुच्छेद 14 – सभी कानून की नजर में बराबर हैं.
अनुच्छेद 15 – धर्म, जाति, लिंग या जन्म के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता.
अनुच्छेद 19 – बोलने और शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने का अधिकार.
अनुच्छेद 21 – जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार.
अनुच्छेद 25 – अपने धर्म को मानने और उसका पालन करने की स्वतंत्रता.
इसका मतलब है कि सुरक्षा से जुड़े सभी कदम भी संविधान के अनुसार ही उठाए जाने चाहिए.
सुप्रीम कोर्ट का दृष्टिकोण
सुप्रीम कोर्ट ने कई फैसलों में नागरिकों के अधिकारों की रक्षा पर जोर दिया है.
K.S. Puttaswamy (2017) – निजता का अधिकार मौलिक अधिकार है.
Shreya Singhal (2015) – अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा की गई.
Tehseen S. Poonawalla (2018) – मॉब लिंचिंग रोकने और कानून का राज कायम रखने पर जोर दिया गया.
इन सभी फैसलों का संदेश है कि राष्ट्रीय सुरक्षा और नागरिकों के अधिकारों के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है.
दूसरे देशों का अनुभव
ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और कई अन्य देशों के अनुभव बताते हैं कि केवल पुलिस कार्रवाई से समस्या का समाधान नहीं होता. शिक्षा, रोजगार, मानसिक स्वास्थ्य, परिवार का सहयोग और समाज की भागीदारी भी बहुत जरूरी है. कुछ देशों में इन योजनाओं की आलोचना भी हुई कि इनमें कुछ खास समुदायों को ज्यादा निशाना बनाया गया. इसलिए ऐसी किसी भी व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही बहुत जरूरी है.
सरकार को चाहिए कि वह धर्म या समुदाय के आधार पर भेदभाव किए बिना हर तरह की कट्टरता और हिंसा के खिलाफ समान कार्रवाई करे. नफरत फैलाने वालों पर कानून का बराबरी से पालन हो. युवाओं के लिए शिक्षा, रोजगार और सकारात्मक अवसर बढ़ाए जाएं. धार्मिक नेताओं, शिक्षण संस्थाओं और समाज के प्रतिनिधियों से लगातार संवाद रखा जाए। साथ ही एंटी-रैडिकलाइजेशन सेल( कट्टरतावाद विरोधी पथक )के अधिकार, काम करने के तरीके और जवाबदेही की पूरी जानकारी जनता के सामने रखी जाए.
राष्ट्रीय सुरक्षा हर सरकार की जिम्मेदारी है. लेकिन लोकतंत्र की असली ताकत जनता के विश्वास में होती है. जब सरकार निष्पक्ष, पारदर्शी और संविधान के अनुसार काम करती है, तभी सुरक्षा भी मजबूत होती है और समाज में भरोसा तथा भाईचारा भी बढ़ता है. भारतीय संविधान हमें यही सिखाता है कि सुरक्षा, आज़ादी और समानता—ये तीनों एक मजबूत लोकतंत्र के जरूरी स्तंभ हैं. इनमें से किसी एक को भी कमजोर नहीं किया जा सकता.
-म. मुस्लिम कबीर, लातूर
मो.: 8208435414
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