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चुनाव आयोग का नया चेहरा: लोकतंत्र के प्रहरी से सत्ता का प्रहरी बनने की दास्तान

adminBy adminJuly 27, 2025 भारत No Comments4 Mins Read
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"चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाते पोस्टर के साथ मतदाता सूची की जांच करता एक व्यक्ति | लोकतंत्र और मताधिकार पर मंडराता खतरा"
जब वोटर ही लिस्ट से गायब हो जाएं — क्या ये चुनाव हमारे हैं? अब सवाल सिर्फ निष्पक्षता का नहीं, लोकतंत्र की आत्मा का है। #electioncommission #biharvoters #democracy
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भारतीय लोकतंत्र की सबसे अहम संस्था — चुनाव आयोग (ECI) — अब सवालों के घेरे में है, और सिर्फ़ आलोचनाओं के लिए नहीं, बल्कि लोकतंत्र के मूल ढांचे को खतरे में डालने के लिए। हाल ही में बिहार में मतदाता सूची के ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (Special Intensive Revision – SIR) में जिस तरह चुनाव आयोग ने मनमानी और पक्षपात दिखाया, उससे यह स्पष्ट होता जा रहा है कि आयोग अब ‘स्वतंत्र’ नहीं, बल्कि सत्ता का ‘सहयोगी’ बन गया है।

बिहार में लोकतंत्र पर कतरनी:- बिहार में SIR की प्रक्रिया के दौरान चुनाव आयोग ने मतदाताओं से स्वयं अपने नाम सूची में जुड़वाने के लिए कड़े प्रमाण मांगे — आधार, वोटर ID और राशन कार्ड जैसे दस्तावेजों की सख्त शर्तें लगाईं। क्या यह वही आयोग है जिसे हर पात्र नागरिक का नाम मतदाता सूची में सुनिश्चित करना था? या अब यह आयोग लोगों को उनके मताधिकार से वंचित करने का औज़ार बन गया है?

2014 से गिरावट की शुरुआत:- यह गिरावट अचानक नहीं आई। 2014 में जब केंद्र में भाजपा बहुमत के साथ सत्ता में आई, तभी से चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठने लगे थे। एक के बाद एक चुनाव में आयोग का झुकाव सत्ता पक्ष की ओर स्पष्ट होता गया। उपचुनावों में BJP को खुली छूट, चुनाव कार्यक्रम की ‘अनुकूल’ घोषणा, आचार संहिता के उल्लंघनों पर मौन — यह सब एक पैटर्न बन चुका है।

‘रिजल्ट तो विपक्ष के पक्ष में भी आए हैं’ — यह तर्क कितना खोखला?:- जब कभी आयोग की निष्पक्षता पर उंगली उठती है, तब उसके पक्षधर तर्क देते हैं कि अगर उसने गड़बड़ी की होती तो विपक्ष जीतता कैसे? मगर यह भूल जाते हैं कि कभी-कभी जनता का गुस्सा इतना प्रबल होता है कि सभी धांधलियों को पार कर जाता है। असल सवाल है — क्या चुनाव आयोग को निष्पक्ष दिखने की भी चिंता नहीं रह गई?

संवैधानिक सिरदर्द: जिसकी चेतावनी बाबा साहेब ने दी थी:- संविधान सभा में पं. हृदयनाथ कुंजरू, कन्हैयालाल मुंशी और प्रो. केटी शाह ने इस बात पर ज़ोर दिया था कि मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति सिर्फ राष्ट्रपति न करें, बल्कि संसदीय अनुमोदन से हो, ताकि निष्पक्ष व्यक्ति ही नियुक्त हो सके। डॉ. आंबेडकर खुद इस विषय को संविधान का “सबसे बड़ा सिरदर्द” मानते थे। लेकिन इस चेतावनी को नज़रअंदाज़ कर दिया गया। आज वही सिरदर्द संविधान के दिल तक फैल चुका है।

सुप्रीम कोर्ट की सलाह को भी ठेंगा:- 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग की नियुक्तियों के लिए PM, विपक्ष के नेता और CJI की समिति बनाने की बात कही थी। मगर 2024 में बनाए गए कानून में मोदी सरकार ने CJI की जगह अपने एक मंत्री को शामिल कर लिया। मतलब — 2:1 की सरकार समर्थक समिति, जिसमें निष्पक्षता का नामोनिशान नहीं बचा।

महाराष्ट्र में ‘मतदाता बढ़े’, बिहार में ‘काटे गए’ — खेल समझिए:- महाराष्ट्र चुनाव में मतदाताओं की संख्या में अचानक बढ़ोत्तरी हुई, जिससे BJP को फायदा हुआ। अब बिहार में चुनाव से पहले आयोग ‘कठोर सत्यापन’ की आड़ में नाम घटा रहा है। क्या यह ‘नया चुनाव आयोग’ सिर्फ सत्ता को फायदा पहुँचाने के लिए जनसंख्या के आंकड़ों से खेल कर रहा है?

सुप्रीम कोर्ट की फटकार और आयोग का घमंड:- हाल ही में कोर्ट ने आयोग से पूछा — आप मतदाता सूची में नागरिकता की जांच क्यों कर रहे हैं? यह तो गृह मंत्रालय का काम है। आयोग के पास जवाब नहीं था। अब वह कोर्ट की सलाह को मानने से भी इनकार कर रहा है।

सवाल ये है: क्या चुनाव आयोग अब ED और CBI की तरह सत्ताधीन तोता बन चुका है? क्या जनता अब उसके हर निर्णय को शक की निगाह से देखेगी? क्या लोकतंत्र की बुनियादी संस्थाएं एक-एक कर सत्ता के हवाले हो रही हैं?

एक चेतावनी-अगर यही रवैया जारी रहा, तो वह दिन दूर नहीं जब आम मतदाता आयोग की हर घोषणा को ‘पूर्व-निर्धारित’ मानने लगेगा। तब चुनाव का कोई मतलब नहीं बचेगा। भारतीय लोकतंत्र की रक्षा करना है तो ज़रूरी है कि चुनाव आयोग को सत्ता की परछाई से बाहर निकाला जाए। वरना वह दिन दूर नहीं जब मतदाता खुद यह कहे — “अब ये चुनाव हमारे नहीं रहे।

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