17 जुलाई 2025 को दिल्ली हाई कोर्ट का फैसला आया — तबलीगी जमात से जुड़े 70 भारतीय नागरिकों के खिलाफ दर्ज 16 चार्जशीट रद्द। फैसला सीधा और साफ था: “इन मामलों में कोई ठोस आधार नहीं था।” लेकिन सवाल अब ये नहीं है कि आरोप गिरे — सवाल यह है कि चार साल तक ये आरोप टिके कैसे? कोविड का बहाना, मुसलमानों को निशाना:- मार्च 2020 में जब देश अचानक लॉकडाउन में धकेल दिया गया, निजामुद्दीन के मरकज़ में कुछ विदेशी नागरिक फंसे रह गए। तबलीगी जमात का कार्यक्रम खत्म हो चुका था, लेकिन देश की मीडिया और सत्ता प्रतिष्ठान ने इसे कोविड का “सुपर स्प्रेडर” करार दे दिया।
टीवी चैनलों पर “कोरोना जिहाद” जैसे जहरीले हैशटैग चलने लगे, मौलवियों को देशद्रोही और मरकज़ को षड्यंत्रकारी अड्डा बताया गया। एक धार्मिक जमावड़े को, जिसे पहले न राज्य सरकार ने रोका था, न केंद्र ने — अचानक देश के दुश्मन की तरह पेश किया गया। पुलिसिया कहानी, न्यायिक खामोशी:-दिल्ली पुलिस ने महामारी रोग अधिनियम, आपदा प्रबंधन अधिनियम और विदेशी नागरिकों पर बने कानूनों की झड़ी लगा दी। 16 एफआईआर, 70 भारतीय नागरिक, 195 विदेशी — चार्जशीटें ऐसे दायर की गईं जैसे इन लोगों ने जैविक युद्ध छेड़ दिया हो। लेकिन अब हाई कोर्ट ने कहा: “चार्जशीट में कुछ भी नहीं है।” सवाल उठता है — फिर 4 साल क्या किया गया? ‘मुस्लिम’ ठहराना था, सबूत मायने नहीं रखते थे:-जिन लोगों पर मामला बना, उन्होंने बस यह ‘गुनाह’ किया था कि अपने घरों में कुछ फंसे हुए विदेशी नागरिकों को आसरा दिया था। किसी को बीमारी नहीं थी, कोई संक्रमित नहीं था, कोई उकसावन नहीं थी — फिर भी “देशद्रोहियों” का तमगा मीडिया ने उन्हें दे डाला। पुलिस भी वही साबित करने में लगी रही, जो उसे साबित करने का आदेश राजनीतिक सत्ता ने दिया था — कि ये लोग राष्ट्र विरोधी हैं।
न्याय तो मिला, पर इज़्ज़त नहीं लौटी:-चार साल बाद कोर्ट का फैसला आया कि मामला फर्जी था। लेकिन क्या इन 70 लोगों की सामाजिक प्रतिष्ठा वापस आ गई? क्या जिन मस्जिदों को “संक्रमण केंद्र” बताकर बदनाम किया गया, उनका सम्मान बहाल हुआ?
क्या मीडिया चैनलों ने माफ़ी मांगी?:- क्या दिल्ली पुलिस के उन अफसरों की जवाबदेही तय हुई, जिन्होंने झूठी चार्जशीटें बनाई?
नफ़रत का कारोबार, कानून की आड़ में:-तबलीगी जमात केस उस नफरत की मिसाल है, जिसे कानून के कपड़े पहनाकर फैलाया गया। ये सिर्फ मुसलमानों को नहीं, न्याय व्यवस्था को भी कमज़ोर करने का मामला था।आज जब हाई कोर्ट कहता है — “कोई केस नहीं था” — तो यह एक लोकतंत्र की हार भी है। क्योंकि न्याय तो अंततः मिला, लेकिन वह इतनी देर से मिला कि वह खुद एक सवाल बन गया।
आख़िर में सवाल यही:-क्या भारत में मुसलमान होना अब इतना बड़ा गुनाह है कि बिना सबूत के भी आपको जेल, बदनामी और अपमान दिया जा सकता है — और जब आप बरी हों, तो कोई माफी न दे, कोई अफसोस न जताए?