दिल्ली के जंतर-मंतर से उठी छात्रों और युवाओं की आवाज अब सिर्फ एक विरोध प्रदर्शन नहीं रह गई है। यह आंदोलन धीरे-धीरे उस बेचैनी का प्रतीक बनता जा रहा है, जो देश के लाखों युवाओं के भीतर शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं, पेपर लीक और सरकारी जवाबदेही को लेकर जमा होती रही है। इसी आंदोलन के बीच 21 दिनों से अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठे शिक्षाविद और पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को दिल्ली पुलिस द्वारा हिरासत में लेकर अस्पताल पहुंचाए जाने की घटना ने इस पूरे विवाद को और ज्यादा राजनीतिक बना दिया है। सरकार के लिए यह शायद एक प्रशासनिक फैसला हो सकता है। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
लेकिन छात्रों और आंदोलनकारियों के लिए यह सवाल अब लोकतांत्रिक अधिकारों और असहमति के सम्मान का बन गया है। क्योंकि सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या किसी आंदोलन को खत्म करने के लिए आंदोलनकारी को हटा देना ही समाधान है? अगर किसी शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग की जा रही है, तो उस मांग पर बातचीत करने के बजाय आंदोलनकारी को अस्पताल पहुंचा देने से क्या देश की शिक्षा व्यवस्था की समस्याएं खत्म हो जाएंगी? क्या पेपर लीक रुक जाएंगे?
क्या प्रतियोगी परीक्षाओं की व्यवस्था सुधर जाएगी? क्या छात्रों का भविष्य सुरक्षित हो जाएगा? और क्या उन परिवारों को जवाब मिल जाएगा, जिनके बच्चे वर्षों तक मेहनत करके परीक्षा देते हैं और फिर पेपर लीक या परीक्षा व्यवस्था की गड़बड़ी के कारण उनका भविष्य अधर में लटक जाता है? नहीं। क्योंकि सोनम वांगचुक को जंतर-मंतर से हटाया जा सकता है। लेकिन छात्रों के सवालों को नहीं हटाया जा सकता। एक व्यक्ति को हटाया, लेकिन आंदोलन खत्म नहीं हुआ।
सोनम वांगचुक को अस्पताल ले जाने के बाद भी आंदोलन खत्म नहीं हुआ। रिपोर्टों के अनुसार, उन्होंने अपना अनशन समाप्त नहीं किया और अस्पताल से बाहर निकलकर वापस जंतर-मंतर जाने की इच्छा जताई। दूसरी तरफ, आइसा के तीन सदस्य भी अपना अनशन जारी रखे हुए हैं। और अब सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दिपके द्वारा अनिश्चितकालीन अनशन शुरू करने की घोषणा ने यह संकेत दिया है कि सरकार की कार्रवाई से आंदोलन कमजोर होने के बजाय उसके और फैलने की संभावना पैदा हो गई है।
यही किसी भी सरकार के लिए सबसे बड़ा राजनीतिक सबक होना चाहिए। आंदोलनकारी को हटाना आसान है, लेकिन आंदोलन के कारणों को खत्म करना मुश्किल। अगर समस्या वास्तविक है तो वह एक चेहरे के हटने से समाप्त नहीं होती। एक सोनम वांगचुक अस्पताल पहुंचेंगे तो दूसरा व्यक्ति अनशन पर बैठ जाएगा। एक छात्र को हिरासत में लिया जाएगा तो दस और छात्र सवाल पूछेंगे। एक प्रदर्शन को बैरिकेड से रोक दिया जाएगा तो वही सवाल सोशल मीडिया, विश्वविद्यालयों और संसद तक पहुंच जाएगा। यही लोकतंत्र की ताकत है।
सवाल सिर्फ धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे का नहीं है
यहां एक महत्वपूर्ण बात समझने की जरूरत है। सोनम वांगचुक और आंदोलनकारी सिर्फ यह नहीं कह रहे कि एक मंत्री इस्तीफा दे दें और सब कुछ ठीक हो जाएगा। असल सवाल है जवाबदेही का। अगर देश में लगातार प्रतियोगी परीक्षाओं को लेकर विवाद खड़े होते हैं… अगर पेपर लीक की खबरें आती हैं…
अगर लाखों छात्रों का भविष्य प्रभावित होता है…अगर परीक्षा रद्द होती है…अगर छात्रों को दोबारा परीक्षा देनी पड़ती है…अगर परिवार आर्थिक और मानसिक दबाव में आते हैं…तो आखिर इसकी जिम्मेदारी किसकी है? सरकार की? शिक्षा मंत्रालय की? परीक्षा कराने वाली एजेंसियों की? या उस पूरे सिस्टम की, जो बार-बार ऐसी विफलताओं को रोकने में नाकाम साबित होता है?
राहुल गांधी ने छात्रों के बीच बोलते हुए पेपर लीक को युवाओं के भविष्य के लिए बड़ा खतरा बताया और व्यवस्था में ऊपर से नीचे तक जवाबदेही तय करने की बात कही। उनका दावा है कि पिछले दस वर्षों में 152 पेपर लीक हुए और किसी को सजा नहीं मिली। अगर यह आंकड़ा सही है तो यह सिर्फ एक राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि एक गंभीर प्रशासनिक सवाल है। और अगर यह आंकड़ा गलत है तो सरकार को तथ्य सामने रखकर इसका खंडन करना चाहिए। लेकिन बहस होनी चाहिए। जांच होनी चाहिए। जवाबदेही तय होनी चाहिए। क्योंकि देश के युवाओं को सिर्फ भाषण नहीं चाहिए। उन्हें भरोसेमंद परीक्षा व्यवस्था चाहिए।
जब छात्र सड़क पर उतरते हैं तो सरकार को आईना देखना चाहिए
20 जुलाई को दिल्ली की सड़कों पर जिस तरह बड़ी संख्या में छात्र और युवा दिखाई दिए, वह अचानक पैदा हुआ आक्रोश नहीं था। यह उस गुस्से का परिणाम है जो वर्षों से जमा हो रहा है। एक छात्रा ने बिल्कुल सही सवाल उठाया—शिक्षा मंत्री का इस्तीफा शायद शिक्षा व्यवस्था को तुरंत नहीं बदल देगा, लेकिन कम से कम जवाबदेही तो तय होगी। यही लोकतंत्र का मूल सिद्धांत है।
अगर कोई विभाग लगातार असफल हो रहा है तो उसकी राजनीतिक जिम्मेदारी कौन लेगा? अगर परीक्षा प्रणाली बार-बार सवालों के घेरे में आती है तो मंत्री और मंत्रालय की जवाबदेही क्यों नहीं तय होगी? अगर सरकार हर सफलता का श्रेय लेती है तो विफलता की जिम्मेदारी लेने से क्यों बचती है? सत्ता सिर्फ उपलब्धियों की जिम्मेदारी नहीं होती, विफलताओं की जिम्मेदारी भी होती है।
लाठीचार्ज से सवाल खत्म नहीं होते
इस आंदोलन के दौरान पुलिस कार्रवाई को लेकर भी गंभीर सवाल उठे हैं। प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज, आंसू गैस और कथित अत्यधिक बल प्रयोग के आरोपों ने सरकार की भूमिका पर सवाल खड़े किए हैं। अगर प्रदर्शन शांतिपूर्ण था तो इतनी बड़ी संख्या में सुरक्षा बलों की तैनाती क्यों करनी पड़ी? अगर कुछ लोगों ने कानून तोड़ा था तो क्या पूरे आंदोलन को बलपूर्वक रोकना जरूरी था? क्या बातचीत का रास्ता पहले नहीं अपनाया जा सकता था? और सबसे महत्वपूर्ण—क्या लोकतंत्र में युवाओं की आवाज सुनने के लिए पहले लाठीचार्ज जरूरी है?
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने पुलिस कार्रवाई की आलोचना करते हुए सरकार पर निशाना साधा। राहुल गांधी ने भी छात्रों के मुद्दे पर लोकसभा में चर्चा की मांग की। लेकिन अगर लोकसभा में भी छात्रों की समस्याओं पर चर्चा के लिए सरकार की अनुमति जरूरी हो… अगर संसद के बाहर छात्रों को अपनी बात कहने से रोक दिया जाए…तो फिर सवाल उठना स्वाभाविक है कि लोकतंत्र में जनता की आवाज आखिर जाएगी कहां?
क्या मोदी सरकार असहमति से डरती है?
यह सवाल विपक्ष लगातार उठा रहा है।आलोचकों का आरोप है कि मोदी सरकार आंदोलन और असहमति को संवाद के बजाय प्रशासनिक शक्ति से नियंत्रित करने की कोशिश करती है। यह कहना अतिशयोक्ति हो सकती है कि सरकार हर आंदोलन से डरती है। लेकिन यह सवाल जरूर पूछा जा सकता है कि सरकार आंदोलनकारियों से संवाद कब करती है? अक्सर तब, जब आंदोलन इतना बड़ा हो जाए कि उसे नजरअंदाज करना संभव न रहे।
सोनम वांगचुक का मामला भी इसी बहस को जन्म देता है। अगर 21 दिनों तक एक व्यक्ति भूख हड़ताल पर बैठा रहा, तो क्या सरकार को पहले ही उससे बातचीत नहीं करनी चाहिए थी? क्या उनकी मांगों पर सार्वजनिक चर्चा नहीं हो सकती थी? क्या शिक्षा व्यवस्था की खामियों पर विशेषज्ञों, छात्रों और अभिभावकों के साथ एक राष्ट्रीय संवाद नहीं होना चाहिए? सरकारें जनता को चुप करा सकती हैं, लेकिन जनता के सवालों को खत्म नहीं कर सकतीं।
यह आंदोलन सिर्फ सोनम वांगचुक का नहीं है
आज सोनम वांगचुक इस आंदोलन का एक चेहरा हैं। लेकिन यह आंदोलन सिर्फ उनके बारे में नहीं है। यह उन लाखों छात्रों का आंदोलन है जो प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में अपनी जवानी लगा देते हैं। यह उन माता-पिता का आंदोलन है जो अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए अपनी जिंदगी की जमा पूंजी खर्च करते हैं। यह उन युवाओं का आंदोलन है जिन्हें लगता है कि परीक्षा प्रणाली में ईमानदारी और पारदर्शिता नहीं होगी तो उनकी मेहनत का क्या मतलब रह जाएगा?
यह उन छात्रों का आंदोलन है जो पूछ रहे हैं कि अगर पेपर लीक होगा तो हमारा भविष्य कौन लौटाएगा? अगर परीक्षा रद्द होगी तो हमारा एक साल कौन लौटाएगा? अगर भर्ती प्रक्रिया में भ्रष्टाचार होगा तो हमारी उम्र सीमा कौन बढ़ाएगा? अगर हमारी मेहनत बर्बाद होगी तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? इन सवालों का जवाब किसी एक मंत्री के इस्तीफे से नहीं मिलेगा।
लेकिन एक मंत्री की जवाबदेही तय होना यह संदेश जरूर दे सकता है कि सरकार विफलताओं को स्वीकार करने के लिए तैयार है। सोनम वांगचुक को हटाने से सरकार ने एक मौका गंवा दिया? सरकार के पास एक दूसरा रास्ता भी था। वह सोनम वांगचुक को बुलाती। उनसे बातचीत करती। छात्रों के प्रतिनिधियों से मिलती। शिक्षा विशेषज्ञों के साथ बैठक करती। और कहती—आइए, मिलकर शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था की कमियों को दूर करते हैं।
ऐसा होता तो शायद आज की तस्वीर अलग होती। लेकिन जब एक 21 दिन से अनशन कर रहे व्यक्ति को अस्पताल पहुंचाने की खबर आती है, जब प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग के आरोप लगते हैं, जब छात्र सड़कों पर उतरते हैं और विपक्ष सरकार को घेरता है—तो सरकार को खुद से एक सवाल पूछना चाहिए। क्या हमने समस्या को हल किया है या सिर्फ समस्या दिखाई देने वाले लोगों को हटा दिया है?
आखिर में सवाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अक्सर युवाओं और छात्रों के भविष्य की बात करते हैं। देश को विकसित बनाने की बात करते हैं। युवा शक्ति को भारत की सबसे बड़ी ताकत बताते हैं। लेकिन युवा शक्ति सिर्फ भाषण सुनना नहीं चाहती। वह चाहती है कि उसकी परीक्षा ईमानदारी से हो। उसे नौकरी के लिए वर्षों इंतजार न करना पड़े। उसकी मेहनत किसी पेपर लीक की भेंट न चढ़े। उसका भविष्य किसी परीक्षा एजेंसी की लापरवाही से बर्बाद न हो। और जब वह सवाल पूछे तो उसे लाठी का सामना न करना पड़े।
आज सरकार के सामने एक मौका है। वह चाहे तो इस पूरे आंदोलन को राजनीतिक लड़ाई बना सकती है। या फिर इसे एक अवसर बना सकती है—देश की शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था में वास्तविक सुधार का। सोनम वांगचुक अस्पताल में हैं। लेकिन उनका सवाल जंतर-मंतर पर अब भी खड़ा है। छात्रों का सवाल संसद के बाहर अब भी खड़ा है। पेपर लीक का सवाल अब भी खड़ा है।
जवाबदेही का सवाल अब भी खड़ा है। और सबसे बड़ा सवाल— क्या सरकार इन सवालों का जवाब देगी? क्योंकि…एक सोनम वांगचुक को अस्पताल पहुंचाने से आंदोलन खत्म नहीं होता। एक जंतर-मंतर खाली कराने से छात्रों का गुस्सा खत्म नहीं होता। और लाठीचार्ज से युवाओं के भविष्य का सवाल खत्म नहीं होता। सवाल वहीं रहेगा—देश के युवाओं के भविष्य की जिम्मेदारी आखिर किसकी है? और अगर सरकार इस जिम्मेदारी को निभाने में नाकाम रही है…तो लोकतंत्र में जनता को यह पूछने का पूरा अधिकार है—जवाबदेही कब तय होगी?
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