20 जुलाई को दिल्ली में छात्रों और युवाओं के प्रदर्शन के दौरान जो तस्वीरें और वीडियो सामने आए हैं, उन्होंने सिर्फ पुलिस कार्रवाई पर ही सवाल नहीं उठाए हैं, बल्कि एक उससे भी गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर पुलिस की वर्दी में मौजूद वे लोग कौन हैं, जिनकी वर्दी पर न तो नेम प्लेट दिखाई दे रही है और न ही कोई पहचान संख्या? लोकतंत्र में प्रदर्शन करना नागरिकों का अधिकार है। सरकार की नीतियों के खिलाफ आवाज उठाना, सवाल पूछना और विरोध दर्ज कराना किसी भी लोकतांत्रिक समाज की बुनियादी पहचान है। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
लेकिन 20 जुलाई को दिल्ली में प्रदर्शनकारियों पर हुई कार्रवाई के दौरान सामने आए वीडियो ने एक बेहद गंभीर बहस को जन्म दिया है। कई वीडियो में ऐसे लोग दिखाई दे रहे हैं, जो सादे कपड़ों में लाठी लिए खड़े हैं। कुछ अन्य तस्वीरों और वीडियो में पुलिस की वर्दी पहने ऐसे जवान दिखाई देते हैं, जिनकी पहचान स्पष्ट नहीं है। आरोप है कि इन लोगों ने प्रदर्शनकारियों के साथ मारपीट की। कुछ वीडियो में महिलाओं और युवाओं के साथ कथित दुर्व्यवहार भी दिखाई देता है।
अब सवाल यह है कि अगर ये पुलिसकर्मी हैं तो इनकी पहचान छिपी क्यों है? अगर ये दिल्ली पुलिस या किसी अन्य सुरक्षा बल के जवान हैं, तो उनकी वर्दी पर स्पष्ट पहचान क्यों नहीं दिखाई देती? और अगर ये पुलिसकर्मी नहीं हैं, तो फिर वे पुलिस की मौजूदगी में लाठियां लेकर प्रदर्शनकारियों के बीच क्या कर रहे थे? यह सवाल इसलिए भी गंभीर है क्योंकि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में पुलिस की जवाबदेही उसकी पहचान से जुड़ी होती है। एक नागरिक को यह जानने का अधिकार है कि उसके सामने खड़ा अधिकारी कौन है, वह किस बल से संबंधित है और उसकी जिम्मेदारी क्या है।
क्या यह पहली बार है जब ऐसे सवाल उठे हैं?
यह सवाल केवल 20 जुलाई के दिल्ली प्रदर्शन तक सीमित नहीं है। कुछ वर्ष पहले जामिया मिल्लिया इस्लामिया में हुए विरोध प्रदर्शन के दौरान भी ऐसे पुलिसकर्मियों को लेकर सवाल उठे थे, जिनकी वर्दी पर कथित तौर पर स्पष्ट नेम प्लेट या पहचान संख्या दिखाई नहीं दे रही थी।
उस समय भी तस्वीरें और वीडियो सामने आए थे और यह सवाल पूछा गया था कि अगर पुलिस कार्रवाई कर रही है तो कार्रवाई करने वाले अधिकारियों की पहचान क्यों स्पष्ट नहीं है? लेकिन सवाल यह है कि क्या उस मामले में कोई ऐसी स्वतंत्र और पारदर्शी जांच हुई, जिससे जनता को पता चल सके कि आखिर उन लोगों की पहचान क्या थी? अगर नहीं हुई, तो यही सबसे बड़ी समस्या है। क्योंकि जब किसी गंभीर आरोप की निष्पक्ष जांच नहीं होती, तो अगली बार वही सवाल और ज्यादा गंभीर रूप में सामने आता है।
पुलिस की वर्दी में कौन?
20 जुलाई की घटना के बाद सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में कुछ ऐसे लोग दिखाई दिए, जिन्हें लेकर प्रदर्शनकारियों और पत्रकारों ने सवाल उठाए हैं। कुछ लोग सादे कपड़ों में लाठी लिए नजर आए, तो कुछ वर्दीधारी कर्मियों की पहचान भी स्पष्ट नहीं थी। यहां एक बात बिल्कुल साफ होनी चाहिए कि क्या सिर्फ वीडियो देखकर यह निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा कि ये लोग किसी खास संगठन से जुड़े हुए थे।
लेकिन यही तो वजह है कि निष्पक्ष जांच जरूरी है। अगर ये सभी अधिकृत पुलिसकर्मी थे, तो जांच के बाद यह बात सामने आनी चाहिए। अगर ये किसी केंद्रीय सुरक्षा बल के जवान थे, तो उनकी पहचान सामने आनी चाहिए। और अगर इनमें से कोई भी व्यक्ति अधिकृत सुरक्षा बल का हिस्सा नहीं था, तो फिर यह और भी गंभीर मामला है कि वह पुलिस कार्रवाई के बीच कैसे मौजूद था और प्रदर्शनकारियों के साथ बल प्रयोग कैसे कर रहा था।
क्या पुलिस कार्रवाई के दौरान बाहरी लोगों की मौजूदगी की जांच होगी?
यह सवाल केवल राजनीतिक दलों या प्रदर्शनकारियों का नहीं होना चाहिए। यह सवाल हर नागरिक का है। किसी भी विरोध प्रदर्शन को नियंत्रित करने के लिए पुलिस और सुरक्षा बलों की तैनाती की जाती है। लेकिन अगर उसी दौरान ऐसे अज्ञात लोग दिखाई दें, जिनकी पहचान स्पष्ट न हो, जो लाठियां लिए हों और प्रदर्शनकारियों के साथ मारपीट करते नजर आएं, तो उनकी पहचान की जांच कौन करेगा? क्या दिल्ली पुलिस इस मामले में बताएगी कि 20 जुलाई को प्रदर्शन स्थल पर तैनात सभी पुलिस और सुरक्षा बलों की यूनिट कौन-कौन सी थीं?
क्या उनकी ड्यूटी सूची सार्वजनिक की जाएगी? क्या घटनास्थल के सीसीटीवी फुटेज की स्वतंत्र जांच होगी? क्या वायरल वीडियो में दिखाई दे रहे सादे कपड़ों वाले लोगों की पहचान की जाएगी? क्या यह पता लगाया जाएगा कि उन्होंने किसके आदेश पर बल प्रयोग किया? और सबसे महत्वपूर्ण कि क्या किसी स्वतंत्र जांच एजेंसी या न्यायिक आयोग से इस पूरे घटनाक्रम की जांच कराई जाएगी?
पैलेट जैसी चोटों ने बढ़ाई चिंता
इस पूरे मामले को और गंभीर बना रही हैं प्रदर्शनकारियों और एक पत्रकार को लगी कथित पैलेट जैसी चोटों की रिपोर्ट। 19 वर्षीय साहिल लोचाब के मामले में गंभीर आंख की चोट की बात सामने आई है। शेख इरशाद मंसूरी के शरीर और चेहरे पर भी कई छोटे-छोटे घाव बताए गए हैं। एक पत्रकार के हाथ में भी ऐसी चोटों का दावा किया गया है, जो पैलेट लगने जैसी बताई गई हैं। हालांकि, इन चोटों के लिए किस हथियार का इस्तेमाल हुआ और किस बल ने उसे चलाया, इसकी आधिकारिक पुष्टि अभी जांच का विषय है।
दिल्ली पुलिस ने पैलेट गन के इस्तेमाल के आरोपों से इनकार किया है, जबकि रिपोर्टों में रैपिड एक्शन फोर्स के जवानों पर सवाल उठाए गए हैं। ऐसे में सरकार और सुरक्षा बलों की जिम्मेदारी बनती है कि वे सामने आकर स्पष्ट करें कि 20 जुलाई को किस बल के पास कौन से हथियार थे और उनका इस्तेमाल किस परिस्थिति में किया गया। क्योंकि अगर सरकार के पास छिपाने के लिए कुछ नहीं है, तो पारदर्शी जांच से डर कैसा?
क्या मोहन भागवत के ’30 लाख स्वयंसेवकों’ वाले बयान से कोई संबंध है?
इस घटना के बाद सोशल मीडिया पर कुछ लोग राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत के एक पुराने बयान का हवाला देकर यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या प्रदर्शन के दौरान दिखाई देने वाले कुछ लोग संघ से जुड़े स्वयंसेवक हो सकते हैं? यहां सावधानी जरूरी है। किसी भी व्यक्ति को केवल शक या सोशल मीडिया पोस्ट के आधार पर आरएसएस से जुड़ा बताना उचित नहीं है। इसी तरह, यह दावा भी बिना ठोस प्रमाण के नहीं किया जा सकता कि प्रदर्शन के दौरान मौजूद अज्ञात लोग संघ के स्वयंसेवक थे।
लेकिन क्या इस सवाल की जांच होनी चाहिए? बिल्कुल होनी चाहिए। अगर किसी व्यक्ति की पहचान संदिग्ध है, अगर वह पुलिस की कार्रवाई के दौरान लाठी लेकर मौजूद था और अगर वीडियो में वह प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग करता दिखाई देता है, तो उसकी पहचान और भूमिका की जांच होनी चाहिए फिर चाहे वह किसी भी संगठन से जुड़ा हो। लोकतंत्र में किसी संगठन से जुड़ा होना अपराध नहीं है। लेकिन अगर कोई व्यक्ति बिना अधिकृत अधिकार के पुलिस कार्रवाई में शामिल होता है, तो यह गंभीर मामला हो सकता है। इसलिए सवाल व्यक्ति की विचारधारा का नहीं, उसकी भूमिका और अधिकार का है।
सबसे बड़ा सवाल: जांच कौन करेगा?
आज देश को किसी राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से ज्यादा जरूरत एक निष्पक्ष जांच की है। 20 जुलाई की घटनाओं की जांच के लिए एक स्वतंत्र समिति बनाई जाए। वायरल वीडियो की फॉरेंसिक जांच हो। सीसीटीवी फुटेज और पुलिस बॉडी कैमरों की रिकॉर्डिंग सुरक्षित की जाए। मौके पर तैनात सभी पुलिस और सुरक्षा बलों की ड्यूटी सूची सार्वजनिक की जाए। सादे कपड़ों में मौजूद लोगों की पहचान की जाए। वर्दीधारी कर्मियों की पहचान और यूनिट की जानकारी सामने लाई जाए। पैलेट जैसी चोटों की स्वतंत्र मेडिकल जांच कराई जाए।
और अगर किसी पुलिसकर्मी या किसी बाहरी व्यक्ति ने कानून से बाहर जाकर प्रदर्शनकारियों पर हमला किया है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई हो। क्योंकि सवाल सिर्फ 20 जुलाई का नहीं है। आज सवाल यह नहीं है कि प्रदर्शनकारी किस विचारधारा के थे। सवाल यह भी नहीं है कि सरकार के खिलाफ कौन प्रदर्शन कर रहा था। सवाल यह है कि क्या भारत में कानून का राज है? अगर पुलिस किसी प्रदर्शन को नियंत्रित करती है, तो पुलिस की पहचान स्पष्ट होनी चाहिए।
अगर कोई व्यक्ति पुलिस की वर्दी पहनकर कार्रवाई करता है, तो उसकी पहचान स्पष्ट होनी चाहिए। अगर कोई सादे कपड़ों में लाठी लेकर पुलिस के साथ खड़ा है, तो उसकी भूमिका स्पष्ट होनी चाहिए। और अगर किसी नागरिक को चोट लगती है, तो उसकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। किसी भी लोकतंत्र में पुलिस जनता की सुरक्षा के लिए होती है, जनता को डराने के लिए नहीं। इसलिए 20 जुलाई की दिल्ली की घटना की निष्पक्ष जांच सिर्फ प्रदर्शनकारियों की मांग नहीं होनी चाहिए।
यह हर उस नागरिक की मांग होनी चाहिए जो चाहता है कि पुलिस की वर्दी कानून की पहचान बने, किसी अज्ञात शक्ति का मुखौटा नहीं। बिना नेम प्लेट वाले पुलिसकर्मी कौन थे? सादे कपड़ों में लाठी लेकर घूम रहे लोग कौन थे? क्या वे अधिकृत सुरक्षा बल के सदस्य थे? अगर थे, तो उनकी पहचान क्यों छिपी थी? और अगर नहीं थे, तो पुलिस की कार्रवाई के बीच उन्हें किसने आने दिया? इन सवालों के जवाब मिलना जरूरी है। क्योंकि लोकतंत्र में सवाल पूछने वालों को पीटा नहीं जाता बल्कि सवालों का जवाब दिया जाता है।
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