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अजीत अंजुम पर FIR: सवाल पूछना अब अपराध है? | लोकतंत्र बनाम सत्ता की असहिष्णुता

adminBy adminJuly 26, 2025Updated:July 27, 2025 भारत No Comments4 Mins Read
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यह हमला सिर्फ एक पत्रकार पर नहीं — यह भारत के लोकतंत्र की रीढ़ पर है

12 जुलाई 2025 — वरिष्ठ पत्रकार और यूट्यूबर अजीत अंजुम ने एक वीडियो पोस्ट किया। वीडियो में दिखाया गया कि बिहार के बेगूसराय ज़िले में मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न (SIR) के नाम पर भारी गड़बड़ियाँ हो रही हैं। लेकिन 24 घंटे भी नहीं बीते थे, कि प्रशासन ने वीडियो हटाने की कोशिश की, और फिर दर्ज कर दी एक एफआईआर! सवाल पूछो तो सरकार को तकलीफ़ होती है। और जो तकलीफ़ देता है — वो अब ‘आपराधिक’ बन जाता है।

 FIR का असली मकसद क्या है?:- बूथ लेवल अधिकारी (BLO) मोहम्मद अंसारुलहक की शिकायत के आधार पर अजीत अंजुम पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने “गलत सूचना फैलाई”, “जनभावना भड़काई”,और “प्रक्रिया में हस्तक्षेप किया”। लेकिन असली सवाल ये है: क्या पत्रकार का काम गड़बड़ियों को उजागर करना अपराध है? क्या ज़मीनी हकीकत पर रिपोर्टिंग करना “भड़काना” है? और अगर कोई अधिकारी सवालों से असहज हो जाए — तो क्या हर रिपोर्टर पर FIR दर्ज कर दी जाएगी? यह सिर्फ एक रिपोर्ट नहीं थी — यह लोकतंत्र के सबसे बुनियादी अधिकार की लड़ाई थी:सवाल पूछने का अधिकार।

 क्या था वीडियो में जो सरकार को इतना चुभ गया?:- अजीत अंजुम ने बलिया ब्लॉक के साहेबपुर कमाल विधानसभा क्षेत्र में जाकर देखा कि BLO ऐप पर बिना फोटो, बिना दस्तावेज़ फॉर्म भरे जा रहे हैं। उन्होंने कैमरे पर दिखाया कि कैसे SIR की प्रक्रिया कागज़ी खानापूर्ति बनकर रह गई है। वीडियो में मतदाता खुद बता रहे हैं कि उनसे कोई दस्तावेज़ नहीं मांगा गया। “कोई ओटीपी नहीं, कोई वेरीफिकेशन नहीं — बस नाम लिख दो और अपलोड कर दो।” और यही सच सत्ता को नंगा कर गया।

 क्या लोकतंत्र अब इतना कमज़ोर हो गया है कि एक वीडियो से कांपने लगे? FIR से पहले, प्रशासन ने खुद अजीत अंजुम को बुलाया। B.D.O. और S.D.O. ने उन्हें वीडियो हटाने के लिए कहा। लेकिन जब उन्होंने इंकार किया, तो उनका “इनकार” बना “अपराध”! अजीत अंजुम ने साफ कहा: “मैं डरूंगा नहीं। मैं सिर्फ़ सच दिखाऊंगा। कमियों पर रिपोर्ट करूंगा।” डिजीपब की चेतावनी: ये पत्रकारिता नहीं, लोकतंत्र पर हमला है। डिजिपब न्यूज़ इंडिया फाउंडेशन ने इस एफआईआर को

“स्वतंत्र पत्रकारिता पर सीधा हमला” करार दिया। संगठन का बयान: “यह सिर्फ़ एक पत्रकार को नहीं, बल्कि पूरे लोकतांत्रिक तंत्र को डराने की कोशिश है।” सरकार को सवालों से दिक्कत है, जवाब देने से नहीं। प्रशासन को जवाबदेही से एलर्जी है, पारदर्शिता से नहीं। डिजिपब ने कहा: या तो अधिकारी पत्रकारों को तथ्य दें, या फिर जब पत्रकार खुद सच्चाई उजागर करें — तो चुप रहें।”

ये कोई isolated incident नहीं — ये पैटर्न है:- पहले रवीश कुमार को NDTV से बाहर किया गया। फिर जुझारू पत्रकारों पर IT रेड। अब फ्रीलांस और स्वतंत्र पत्रकारों पर सीधा हमला। पैटर्न साफ है: जिसे रोका नहीं जा सकता — उसे FIR में फंसाओ, डरा दो, थका दो।

क्यों डरता है सत्ता?:- सत्ता को डर है उन आवाज़ों से, जो TRP नहीं, ज़मीन की हकीकत दिखाते हैं।सत्ता को डर है उनसे, जो बिना डर के कहते हैं —तुम चाहे जितनी FIR दर्ज करो, हम कल भी सवाल पूछेंगे — आज भी पूछेंगे!” ये पत्रकारिता पर नहीं — आप पर हमला है। आज अजीत अंजुम को चुप कराने की कोशिश हुई है।

कल कोई और होगा। परसों आप होंगे। अगर अभी नहीं बोले — तो अगला नंबर आपकी आज़ादी का होगा। यह FIR उस लोकतंत्र पर लात है। जिसे हमने संविधान से नहीं, सच बोलने वालों के खून-पसीने से जिया है।

क्या करें हम?:- इस लेख और खबर को शेयर करें। अजीत अंजुम के साथ खड़े हों। डिजीपब और सभी स्वतंत्र पत्रकारों को सपोर्ट करें। अपने लोकल प्रशासन से सवाल पूछें। और सबसे जरूरी —डर को मत पालिए, सवाल करना मत छोड़िए! अजीत अंजुम के शब्दों में: “मैं कोई अपराधी नहीं —मैं वो आईना हूँ जो आपने छिपा रखा है।”

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