ग़ज़ा फिर जल रहा है — लेकिन इस बार बमबारी से नहीं, भूख से बिलखते लोगों पर बरसी गोलियों से। 27 लाशें। 90 घायल। सब भूख से मर रहे थे, सिर्फ़ रोटी लेने निकले थे। लेकिन इस्राइली सेना के लिए ये भूखे भी “ख़तरा” बन गए। रफाह में एक सहायता वितरण केंद्र के बाहर, लोग मदद की कतार में खड़े थे — कुछ उम्मीद लिए, कुछ रोटी के लिए। तभी, गोलियां चलीं। ग़ज़ा के स्वास्थ्य मंत्रालय ने बताया कि 27 लोगों की मौत हो गई, दर्जनों ज़ख़्मी हैं। इसी तरह की घटना रविवार को भी हुई थी, यानी यह महज़ ‘दुर्घटना’ नहीं — यह एक पैटर्न है। इज़रायली डिफेंस फोर्स (IDF) ने दावा किया कि उसने भीड़ पर गोली नहीं चलाई। लेकिन सवाल यह है — जब Red Cross का अस्पताल खून में डूबा हो, दर्जनों घायल और मृत लोग पहुंचे हों, तो क्या सारी दुनिया झूठ बोल रही है? ग़ज़ा की सिविल डिफेंस ने साफ कहा — ये हमला सीधे सहायता लेने आए लोगों पर किया गया। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रमुख वोल्कर तुर्क ने चेताया — “ग़ज़ा में आम नागरिकों पर हमला युद्ध अपराध है। यह अमानवीय है, शर्मनाक है और इसकी स्वतंत्र जांच होनी चाहिए।” उन्होंने कहा कि फ़लस्तीनियों को अब दो ही विकल्प बचे हैं —या तो भूख से मर जाएं, या फिर खाना लेने जाएं और गोली खा लें।
ग़ज़ा में मानवता को इस हद तक कुचला गया है कि अब भूख भी इस्राइल की सुरक्षा के लिए ख़तरा बन चुकी है। इस्राइली सेना ने GHF (ग़ज़ा ह्यूमैनिटेरियन फ़ाउंडेशन) द्वारा संचालित सहायता केंद्रों तक जाने वाली सड़कों को बंद कर दिया है। दलील ये दी गई है कि “पुनर्गठन और दक्षता सुधार” के लिए ऐसा किया गया। लेकिन असली मकसद क्या है? भूख से मरते फिलिस्तीनियों की चीखें बंद करना? या फिर हर उस इंसान को मार देना जो ज़िंदा रहने की कोशिश कर रहा है? पिछले 24 घंटों में इस्राइल ने ग़ज़ा में कम से कम 95 लोगों को मार डाला, 440 से ज़्यादा घायल हुए हैं। मरने वालों की कुल संख्या अब 54,607 पार कर चुकी है। 125,000 से ज़्यादा लोग ज़ख़्मी हैं। इनमें बच्चे, औरतें, बूढ़े, मरीज़, डॉक्टर, पत्रकार — सभी शामिल हैं। और फिर भी दुनिया की सबसे ताक़तवर सुरक्षा परिषद में जब युद्धविराम का प्रस्ताव लाया गया, तो अमेरिका ने उसे वीटो करने की तैयारी शुरू कर दी। क्यों? क्योंकि “इज़राइल का हक़ है”। 7 अक्टूबर के बाद जो भी हुआ, वो ‘बदला’ नहीं — एक सुनियोजित जनसंहार है। हमास ने 7 अक्टूबर को हमला किया, जिसमें करीब 1,139 लोग मारे गए। ये दुखद था। अपराध था। लेकिन क्या उसके जवाब में 54,000 से ज़्यादा मासूमों की हत्या जायज़ हो गई?
क्या कोई देश अपनी सुरक्षा के नाम पर भूखों को गोली मार सकता है? क्या कोई लोकतंत्र इतनी क्रूरता से बच्चों को मार सकता है और फिर भी “पीड़ित” कहलाता है? ग़ज़ा अब सिर्फ़ एक युद्ध क्षेत्र नहीं है — ये इम्तहान है इस दौर की इंसानियत का। और ये इंसानियत बुरी तरह फेल हो रही है। क्या दुनिया विशेषकर मुस्लिम देश अब भी चुप रहेंगे ? क्या युद्ध अपराधों पर पर्दा डालने के लिए “आत्मरक्षा” का झूठ चलता रहेगा? और क्या हर भूखा फिलिस्तीनी अब ‘आतंकवादी’ माना जाएगा? इस नरसंहार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाइए, क्योंकि अगर आज ग़ज़ा चुप रह गया — तो कल इंसानियत मर जाएगी।