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Home»भारत

मौ. अब्दुल्लाह सालिम चतुर्वेदी के गिरफ़्तारी का राज़ ?

adminBy adminApril 8, 2026Updated:April 9, 2026 भारत No Comments5 Mins Read
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आखिर ऐसा क्या कहा था मौलाना सलीम चतुवेर्दी ने जो उन्हें 14 दिन की हिरासत में भेज दिया गया? हाल ही में मौलाना अब्दुल्लाह सालिम चतुर्वेदी को पुलिस ने गिरफ्तार किया, कारण एक विवादित बयान जो दो साल पुराना बताया जा रहा है,मौलाना ने गाये को योगी की अम्मा कहते हुए कहा था की, अगर उत्तर प्रदेश में योगी की अम्मा का ढाई सौ ग्राम गोश्त मिल जाये तो गोली मार कर पैर में छेद करने का आदेश दिया है, एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

ज़ाहिर है योगीजी जब गाय को अपनी माता मानते हैं तो इसमें क्या गलत है? क्या यह बयान इतना गंभीर था कि सीधे गिरफ्तारी और हिरासत जरूरी हो गई?”दिलचस्प बात ये है कि उस बयान के लिए मौलाना माफ़ी भी मांग चुके हैं उसके बावजूद पुलिस ने उनके खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की कुछ धाराओं के तहत मामला दर्ज किया, जिनमें आमतौर पर शामिल हो सकती हैं: धारा 153A – धर्म, जाति आदि के आधार पर वैमनस्य फैलाना। धारा 295A – धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाना।

धारा 505 – सार्वजनिक शांति भंग करने वाले बयान। मामला सिर्फ गिरफ्तार करके इतनी गंभीर धाराएं लगाने तक का नहीं है बल्कि पुलिस हिरासत में उनके साथ बेतहाशा मार तोड़ भी की गयी है, चलो मान लेते हैं उन्होंने विवादित बयान देकर गलती की तो इसका फैसला अदालत करेगी लेकिन उन्हें मारने का अधिकार पुलिस को किसने दिया? किसके कहने पर पुलिस ने उनके साथ ज़्यादती की ? क्या उन पुलिस वालों पर करवाई होगी?

अब दूसरी तरफ उसी योगी राज में हिन्दुत्वादी संगठनों के बयानात देखिये और सुनिए जो नफरत की हद पर करते हैं यति नरसिंहानंद ने तो आम मुसलमान तो छोड़िये देश के राष्ट्रपति और मिसाइलमैन ए पी जे अब्दुल कलाम को तक नहीं छोड़ा इस नफरत के पुजारी ने ए पी जे अब्दुल कलाम को देश द्रोही और जिहादी कहा, क्या ये बयानात मौलाना के बयान से भी गंभीर नहीं हैं ?अगर हाँ तो योगी और उनके पुलिस ने इनपर क्या करवाई की?

उलटे इन्हें इस तरह के और बयानात देने देश में नफरत फ़ैलाने की छूट दी गयी। मौलाना की गिरफ्तारी के बाद सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई है लोग पूछ रहे हैं कि क्या कानून सबके लिए बराबर है? क्या हर नफरत भरे बयान पर इतनी ही तेजी से कार्रवाई होती है? या फिर कुछ मामलों में कानून की रफ्तार बदल जाती है? असल में मौलाना के इस बयान को बहाना बनाया गया है, अगर ये इतनी गंभीर करवाई का कारण था तो अब तक क्यों करवाई नहीं हुई,

असल वजह हम बताते हैं मौलाना अब्दुल्लाह सालिम चतुर्वेदी को हिंदू धर्म का अच्छा ज्ञान है और वे कई बार सार्वजनिक मंचों पर वैचारिक बहस में हिस्सा लेते रहे हैं और उन्होंने कई मौक़ों पर हिंदुत्व के नाम पर सत्ता हासिल करने वालों और हिन्दू धर्म का गलत फायदा उठाने वालों को आईना दिखाया है, उनकी पोल खोली है, कहा जा रहा है कि उनकी यही बेबाकी उन पर कार्रवाई की वजह बनी है?

मौलाना अब्दुल्लाह सालिम चतुर्वेदी कोई पहले व्यक्ति नहीं हैं जिन्हें भाजपा राज में सच या हक़ बोलने की सजा मिली हो, इससे पहले भी कई उलेमाओं, समाज सेवकों, बुद्धिजीवियों, पत्रकारों, विपक्ष के सांसदों और विधायकों को कानून की धाराओं का गलत इस्तेमाल करके सजा दी गयी, हाल ही में अरविन्द केजरीवाल और मनीष शिसोदिया इसका ताज़ा उदहारण हैं जिनपर लगे इल्ज़ामात गलत साबित हुए। विपक्ष के कई सांसदों और विधायकों को डराने और धमकाने के लिए तो ईडी और सीबीआई की धाड़ डाली गयी लेकिन उसमें अब तक बहुत कम लोगों पर गुनाह साबित हुए। 

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम जिम्मेदारी

भारत का संविधान हर नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है, लेकिन यह पूर्ण अधिकार नहीं है। अगर कोई बयान सार्वजनिक शांति, धार्मिक सद्भाव या कानून-व्यवस्था को प्रभावित करता है, तो उस पर कार्रवाई संभव है। वहीं, यह भी जरूरी है कि कानून का इस्तेमाल निष्पक्ष और संतुलित तरीके से हो, ताकि किसी एक वर्ग को निशाना बनाए जाने का आरोप न लगे।

 मौलाना अब्दुल्लाह सालिम चतुर्वेदी की गिरफ्तारी सिर्फ एक व्यक्ति का मामला नहीं रह गई है बल्कि यह अब एक बड़े सवाल में बदल चुकी है: क्या भारत में कानून का अनुप्रयोग पूरी तरह निष्पक्ष है? क्या राजनीतिक और धार्मिक बयानबाज़ी के लिए एक समान मानदंड हैं?

इन सवालों के जवाब ही तय करेंगे कि लोकतंत्र में “न्याय”केवल कानून की किताबों में है या ज़मीनी हकीकत में भी। मौलाना अब्दुल्लाह सालिम चतुर्वेदी की गिरफ्तारी ने सिर्फ एक व्यक्ति के बयान का सवाल नहीं उठाया है, बल्कि यह एक बड़े लोकतांत्रिक मुद्दे की ओर इशारा करती है। इससे पहले भी कई मौकों पर अलग-अलग विचार रखने वाले लोगों चाहे वे उलेमा हों या सामाजिक कार्यकर्ता पर कार्रवाई को लेकर सवाल उठते रहे हैं,

खासकर जब वे सत्ता से जुड़े मुद्दों पर आवाज़ उठाते हैं। लोकतंत्र की असली ताकत इसी में है कि हर नागरिक बिना डर के अपनी बात रख सके। अगर किसी को लगता है कि कानून का इस्तेमाल असंतुलित तरीके से हो रहा है, तो उसका समाधान खामोशी नहीं, बल्कि संवैधानिक और शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखना है। आज ज़रूरत इस बात की है कि ऐसे मामलों पर खुली बहस हो, कानूनी प्रक्रिया पारदर्शी हो और यह भरोसा कायम रहे कि कानून सबके लिए बराबर है।

यह मामला अब सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं सच और हक़ बोलने वाले हर व्यक्ति का है। सवाल है कि क्या भाजपा राज में कानून का इस्तेमाल पूरी तरह निष्पक्ष हो रहा है? अगर समाज ऐसे मुद्दों पर खामोश रहेगा तो धीरे-धीरे हर आवाज़ दबा दी जाएगी इसलिए ज़रूरी है कि डर के नहीं संविधान के साथ खड़े होने की, क्योंकि लोकतंत्र में सबसे बड़ी ताकत आपकी आवाज़ है।

निशाने पर पत्रकार: डिजिटल सेंसरशिप, सत्ता और सवालों से डरती व्यवस्था

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