सुकन्या शांता- 19 साल बीत गए। 11 जुलाई 2006 को मुंबई की लोकल ट्रेनों में हुए सिलसिलेवार धमाकों में 189 लोग मारे गए और 800 से ज्यादा घायल हुए। इसके तुरंत बाद एक के बाद एक मुस्लिम युवकों की गिरफ्तारियाँ शुरू हुईं। इनमें से कुछ को अदालत ने दोषी माना, लेकिन कई सालों बाद अब्दुल वाहिद शेख जैसे लोग अदालत से पूरी तरह बरी हुए। लेकिन क्या इससे उनकी ज़िंदगी फिर से सामान्य हो पाई? नहीं! क्योंकि भारत की पुलिस और खुफिया एजेंसियों के लिए “बरी होना” गुनहगार से अलग होने का सबूत नहीं है — खासकर जब आप मुसलमान हों।
सज़ा पूरी, मगर निगरानी जारी – जेल के बाहर भी बंदीगृह जैसा जीवन!” शेख मोहम्मद अली आलम शेख को उम्रकैद की सज़ा मिले 9 साल हो चुके हैं। वो अब भी जेल में हैं। लेकिन उनके बेटे जब नौकरी करने शहर आए, तो पुलिस फिर से उनके घर आने लगी — पूछने वही घिसे-पिटे सवाल: “अली कहाँ है?” “आप किससे मिलते हैं?” “आपकी दिनचर्या क्या है?” क्या वाकई पुलिस को ये नहीं पता कि अली पिछले 18 सालों से जेल में बंद हैं? या फिर ये एक तरीका है — “डराकर खामोश कर देने” का।
अब्दुल वाहिद शेख:- वो नौ साल जेल में रहे। फिर अदालत ने बाइज्जत बरी कर दिया। लेकिन जब भी कोई आतंकी घटना होती है, पुलिस बिना समन के उनके दरवाज़े पर होती है। वे कहते हैं:- मैंने कई बार मुंबई पुलिस कमिश्नर को लिखित शिकायत दी, लेकिन नतीजा वही – कुछ महीने शांति, फिर वही उत्पीड़न।” शेख ने अब अपने घर के बाहर सीसीटीवी कैमरे लगवा दिए हैं — ताकि पुलिस की धमकी, छेड़छाड़ और किसी झूठे केस से खुद को बचा सकें। क्या ये किसी ‘बरी’ हुए नागरिक का जीवन है? या किसी सताए गए अल्पसंख्यक का असहाय डर? “बिना सबूत, बिना सम्मान – बरी हुए भी शक़ की निगाह में”
ज़मीर अहमद शेख को कोर्ट ने उम्रकैद दी। वो अब तक जेल में हैं। उनके भाई शरीफ कहते हैं:- “20 साल में एक बार, वो भी मां की मौत पर, उन्हें कुछ घंटों की पैरोल मिली थी। फिर भी पुलिस अब भी हमारे घर आती है और वही पुराने सवाल पूछती है।” जब शरीफ ने विरोध किया, तो क्राइम ब्रांच के अधिकारी के खिलाफ शिकायत दी। कुछ दिन के लिए पुलिस हट गई, लेकिन 30 मई 2025 को फिर दो सादे कपड़ों वाले पुलिसकर्मी घर आए और वही सवाल दोहराए। क्या यह किसी ‘रेयरेस्ट ऑफ द रेयर’ मामले की जांच है, या मुस्लिमों को आजीवन मानसिक सज़ा देने की रणनीति? “राज्य नहीं मानता बेकसूर — अदालत की बरी से नहीं बदलती एजेंसियों की मानसिकता” शेख बताते हैं कि उनके जैसे कई लोग जिन्हें सिमी या पीएफआई जैसे मामलों से बरी कर दिया गया, अब भी सरकारी निगरानी में हैं। ना पुनर्वास, ना सम्मान, ना नागरिक अधिकार। बस एक टैग — ‘संभावित आतंकी’। अक्तूबर 2023 में NIA ने शेख के घर छापा मारा, फिर उन्हें लखनऊ बुलाकर पूछताछ की। आरोप? PFI से संबंध — जिसका एक भी सबूत नहीं मिला। “मैं एक उर्दू स्कूल में शिक्षक हूं, मैंने कैदियों के अधिकारों पर पीएचडी की है, फिर भी राज्य मुझे आतंकवादी मानता है।”— अब्दुल वाहिद शेख
“क्या मुसलमान होना ही सबूत है?” इन मामलों में सिर्फ नाम और मजहब काफी हैं। अदालत आपको बरी कर दे, फिर भी पुलिस हर दूसरे शुक्रवार आपके दरवाज़े पर खड़ी होगी। ये देश के कानूनी तंत्र के उस सड़े हुए हिस्से की कहानी है, जो मुस्लिम नामों को स्थायी निगरानी की सूची में रखता है। ये भारत के उस लोकतंत्र की सच्चाई है, जो न्याय नहीं, संदेह के आधार पर अपना तंत्र चलाता है। 2006 के विस्फोटों के बाद गिरफ्तार हुए मुस्लिम युवकों की ज़िंदगियाँ सिर्फ जेल में नहीं गुज़रीं, वे अब भी एक अदृश्य जेल में बंद हैं। जहाँ पुलिस है, डर है, निगरानी है — लेकिन न इंसाफ है, न आज़ादी। सवाल यह है:- क्या भारत का संविधान बरी होने के बाद भी एक मुस्लिम को ‘निर्दोष’ मानता है? या फिर…‘मुस्लिम’ होना ही आज की सबसे बड़ी सज़ा है?