यह सिर्फ छात्रवृत्ति की देरी नहीं है — यह एक सुनियोजित शोषण है, एक ऐसा जुल्म जो भारत के सबसे वंचित और संघर्षशील युवाओं पर ढाया जा रहा है। मौलाना आज़ाद नेशनल फेलोशिप — अल्पसंख्यक छात्रों के लिए उम्मीद की किरण — अब खुद एक उपेक्षा की शिकार लाश बन चुकी है। 6 महीने से अधिक बीत गए, छात्र पैसे के लिए तरस रहे हैं, शोध रुक गया है, दवाइयाँ नहीं खरीदी जा रहीं, रेंट नहीं दिया जा रहा, और सरकार चुप है।
क्या ये योजनाबद्ध अत्याचार नहीं है?:- दिसंबर 2024 से लेकर अब तक सैकड़ों मुस्लिम, बौद्ध, ईसाई, सिख, जैन और पारसी शोधार्थियों को वजीफा नहीं मिला है। जो योजना “शैक्षणिक समानता और समावेश” के नाम पर चलाई गई थी, अब उसी को अल्पसंख्यकों के खिलाफ एक सज़ा में बदल दिया गया है।
जेएनयू से रिसर्च कर रही एक छात्रा कहती हैं:- “अब मानसिक स्वास्थ्य बर्बाद हो चुका है। दोस्तों से उधारी लेकर ज़िंदा हैं। रिसर्च तो कब का ठप हो चुका है।”प्रेसीडेंसी यूनिवर्सिटी कोलकाता के शोधार्थी कालू तमांग कहते हैं:-“बौद्ध होने की वजह से इस फेलोशिप में आए थे, अब लगता है कि पहचान ही हमारी सज़ा बन गई है।” “फेलोशिप नहीं मिली, लेकिन मानसिक तनाव, कर्ज़, बेइज़्ज़ती सब मिल गया!” AMU की रजिया ख़ातून कहती हैं कि उनकी तबीयत तनाव के चलते खराब हो चुकी है।
मणिपुर विश्वविद्यालय की सलीमा सुल्तान गुस्से में कहती हैं:- “यह छात्रवृत्ति हमारा अधिकार है, सरकार हमें भीख नहीं दे रही थी!”
जामिया के छात्र कहते हैं:- “अधिकारियों से मिलने तक से इनकार किया गया। NMDFC ने कहा – फंड नहीं मिला। मंत्रालय पूरी तरह चुप है।”
साज़िश की बू?:- 2022 में सरकार ने मौलाना आज़ाद नेशनल फेलोशिप को बंद करने की घोषणा कर दी। 2025 के बजट में इसके लिए 4.9% फंड की कटौती कर दी गई। UGC से हटाकर इसे NMDFC के हवाले कर दिया गया, जिसने साफ कहा कि मंत्रालय ने पैसे ही नहीं भेजे।
अब सवाल ये है:- क्या अल्पसंख्यकों को धीरे-धीरे उच्च शिक्षा से बाहर धकेला जा रहा है? क्या ये “अवसर की समानता” का कत्ल नहीं है?
मौलाना आज़ाद के नाम पर धोखा!:-भारत सरकार ने जब इस योजना को शुरू किया, तो कहा गया: “हम अल्पसंख्यकों को मुख्यधारा से जोड़ना चाहते हैं।”
लेकिन आज वही सरकार इन छात्रों से कह रही है:”हमारे पास पैसा नहीं है, और जवाब देने का समय भी नहीं!” क्या यही ‘सबका साथ, सबका विकास’ है?
गंभीर सवाल जिनका जवाब ज़रूरी है:- जब DST, CSIR, UGC-JRF समय से पैसे दे सकते हैं, तो MANF क्यों नहीं? अगर योजना बंद कर दी गई है, तो पुराने चयनित छात्रों को वजीफा देना क्यों रोका गया? क्या मौलाना आज़ाद का नाम अब सिर्फ जुमला बनकर रह गया है? ये लड़ाई सिर्फ फेलोशिप की नहीं है – ये संविधान, बराबरी और पहचान की लड़ाई है! इस देरी से सिर्फ शोध बाधित नहीं हो रहा, बल्कि ये एक अल्पसंख्यक विरोधी मानसिकता को उजागर कर रहा है, जिसमें मुसलमान, बौद्ध, और अन्य समुदायों को “हक़ का हक़दार” नहीं, सिर्फ “अनुदान के बोझ” के रूप में देखा जा रहा है। सरकार ने भले ही मौलाना आज़ाद फेलोशिप को खत्म कर दिया हो, लेकिन शोधार्थियों का हक़, उनका संघर्ष, और उनकी आवाज़ ज़िंदा है। जिन्होंने शिक्षा को हथियार बनाया, उन्हें भूखा और बेबस करना एक खतरनाक साजिश है — और ये हम होने नहीं देंगे!