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Home»भारत

मथुरा को अयोध्या बनाने की कोशिश?

adminBy adminJune 7, 2025 भारत No Comments3 Mins Read
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मथुरा एक बार फिर सियासी धर्मयुद्ध का अखाड़ा बन चुका है। इस बार मोर्चा खुला है ‘हिंदू चेतना यात्रा’ के नाम पर — एक ऐसी यात्रा जिसे ‘जनजागरण’ कहा जा रहा है, लेकिन जिसकी बुनियाद में घुली है नफरत, उन्माद और अदालत की अवमानना! श्रीकृष्ण जन्मभूमि और शाही ईदगाह मस्जिद विवाद पहले ही अदालत में लंबित है। लेकिन वादी पक्ष यानी ‘श्रीकृष्ण जन्मभूमि मुक्ति न्यास’ के लोग अब सड़कों पर उतरकर माहौल गरमाने में जुटे हैं। ‘हिंदू चेतना यात्रा’ को “आस्था का उत्सव” कहकर परोसा जा रहा है, जबकि इसका असली मकसद सांप्रदायिक तनाव फैलाना और न्याय प्रक्रिया पर दबाव बनाना है।

ये जनजागरण है या सुनियोजित ध्रुवीकरण?:- मुस्लिम पक्ष साफ़ कह रहा है, यह यात्रा कोर्ट की गरिमा और सांप्रदायिक सौहार्द दोनों के लिए खतरा है। लेकिन कट्टरपंथियों की ज़िद कहती है: “हमें फ़ैसला सड़कों पर चाहिए, कोर्ट में नहीं!” ऐसा क्यों कि जिस पक्ष ने खुद याचिका डाली है, वही अब न्यायिक प्रक्रिया से बाहर जाकर भड़काऊ यात्राएं निकाल रहा है? क्या उन्हें अदालत पर भरोसा नहीं? या फिर ये सब 2024 के बाद अब 2025 के चुनावी चक्र को गरमाने की रणनीति है?

शाही ईदगाह पर हमला — सबूत नहीं, लेकिन प्रोपेगैंडा ज़बरदस्त:- हिंदू पक्ष का दावा है कि मस्जिद की ज़मीन पर मंदिर था, जिसे “तोड़ा गया”। लेकिन आज तक कोई ठोस ऐतिहासिक या पुरातात्विक प्रमाण पेश नहीं किए गए हैं। अदालत में मामला लंबित है, और उच्चतम न्यायालय तक कह चुका है कि ‘पूजा स्थल अधिनियम’ लागू होता है। फिर भी, दावा है कि “ये स्मारक ASI संरक्षित है और कानून लागू नहीं होता” — यानी क़ानून की मनमाफिक व्याख्या, जब जैसा सूट करे!

अदालत में 18 याचिकाएं, पर सड़कों पर नफरत की सियासत:- इलाहाबाद हाई कोर्ट मामले को समग्रता से देख रहा है — 18 याचिकाएं एक साथ। लेकिन यही बात हिंदू संगठनों को बर्दाश्त नहीं। उन्हें चाहिए फैसला, लेकिन अपने पक्ष में — वरना यात्रा, आंदोलन, और सोशल मीडिया पर ‘भावनात्मक उबाल’ का नाटक। और सबसे दिलचस्प बात? अदालत में पेश होने से पहले हिंदू पक्ष खुद ‘हिंदू चेतना यात्रा’ के आयोजक हैं! यानी जो खुद वादी हैं, वो खुद ही ‘जनता की अदालत’ भी बन रहे हैं! ये सीधा-सीधा न्याय प्रक्रिया को प्रभावित करने का प्रयास है — और इसे रोकना न सिर्फ़ जरूरी है, बल्कि संविधान की रक्षा का सवाल है।

सरकार और गोदी मीडिया की चुप्पी — सांप्रदायिकता की मौन सहमति?:- टीवी 9 भारतवर्ष जैसे मीडिया चैनल इस यात्रा को “धार्मिक जागरण” का तमगा दे रहे हैं, लेकिन असली सवाल कोई नहीं पूछता — क्या एक न्यायिक विवाद पर इस तरह की यात्रा की अनुमति होनी चाहिए? क्या ये अदालत की अवमानना नहीं है? सरकारें चुप हैं, क्योंकि उन्हें भी हिंदुत्व की राजनीति के लिए ऐसे आयोजनों की ज़रूरत है। मीडिया चुप है क्योंकि TRP इसी में है। और जनता… उसे एक बार फिर भावनाओं में बहाकर असली मुद्दों से दूर ले जाया जा रहा है।

‘हिंदू चेतना यात्रा’ कोई धार्मिक आंदोलन नहीं — ये एक राजनीतिक प्रोजेक्ट है। एक प्रोजेक्ट जो मथुरा को भी अयोध्या की तरह “ध्रुवीकरण की प्रयोगशाला” में बदलने की तैयारी कर रहा है। इसे समय रहते रोका न गया तो अयोध्या की तरह यहां भी इतिहास, तथ्य और कानून को कुचलकर बहुसंख्यकवाद का विजयघोष सुनाई देगा।

मुस्लिम पक्ष का आग्रह सिर्फ़ इतना है — जब मामला अदालत में है, तो निर्णय न्यायपालिका को लेने दीजिए, न कि भीड़ को। पर सवाल ये है — क्या इस देश में न्याय अब भी अदालतों में मिलेगा, या अब वो सड़कों पर भीड़ के नारों में तय होगा?

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