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Home»भारत

स्कूल में पढ़ाई या अंधविश्वास?

adminBy adminApril 15, 2026 भारत No Comments3 Mins Read
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उत्तराखंड के शांत पहाड़ी इलाके से आई एक खबर ने पूरे देश को चौंका दिया है। जहां किताबें होनी चाहिए थीं, भाजपा राज में वहां ‘भूत’ का मंदिर खड़ा कर दिया गया और वो भी छात्रों के पैसों से! सवाल सिर्फ एक मंदिर का नहीं, बल्कि उस मानसिकता का है जो शिक्षा के मंदिर को अंधविश्वास के अड्डे में बदल रही है। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

डर का इलाज मंदिर?

कुमाऊं के कौसानी स्थित एक सरकारी स्कूल में कथित तौर पर ‘आत्मा को शांत करने’ के लिए एक छोटा मंदिर बनाया गया। कहानी कुछ यूं गढ़ी गई कि 30 साल पहले एक नेपाली मजदूर की मौत। उसकी “भटकती आत्मा” का डर। छात्राओं का अचानक बेहोश होना और फिर… समाधान के नाम पर मंदिर का निर्माण। नतीजा: कक्षा 6 से 12 तक के 218 छात्रों से 100-100 रुपये वसूले गए। यानि, बच्चों की जेब से “भूत भगाने” का ठेका!

सवालों के घेरे में स्कूल प्रशासन

स्कूल प्रबंधन और अभिभावक-शिक्षक संघ (PTA) इस फैसले के पीछे खड़े नजर आते हैं। उनका तर्क: बच्चों में डर था। मंदिर से “मानसिक शांति” मिलेगी। पढ़ाई का माहौल बेहतर होगा। लेकिन असली सवाल यहां खड़ा होता है कि क्या सरकारी स्कूलों का काम वैज्ञानिक सोच देना है या अंधविश्वास को बढ़ावा देना?

विज्ञान की हार, अंधविश्वास की जीत

छात्राओं के बेहोश होने की घटना को बिना मेडिकल जांच, बिना मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन सीधे “आत्मा” से जोड़ दिया गया। यहां तीन गंभीर पहलू सामने आते हैं: स्वास्थ्य की अनदेखी – क्या किसी डॉक्टर को दिखाया गया?

मनोवैज्ञानिक कारण – क्या यह “मास हिस्टीरिया” (group panic) हो सकता था? शिक्षा की विफलता – क्या बच्चों को वैज्ञानिक सोच सिखाई जा रही है? अगर स्कूल ही अंधविश्वास को मान्यता देगा, तो छात्र क्या सीखेंगे?

चंदा या जबरन वसूली?

218 बच्चों से पैसा लेना क्या यह स्वैच्छिक था या दबाव में लिया गया? क्या सभी अभिभावकों की वास्तविक सहमति थी? क्या सरकारी नियम इसकी अनुमति देते हैं? क्या गरीब छात्रों पर इसका असर नहीं पड़ा? यह सिर्फ “मंदिर” नहीं, बल्कि जवाबदेही का बड़ा सवाल है।

प्रशासन की एंट्री

मामला बढ़ने के बाद शिक्षा विभाग हरकत में आया है। जिले के शिक्षा अधिकारी ने जांच के आदेश दिए। ब्लॉक स्तर पर जांच सौंपी। दोषियों पर कार्रवाई की बात कही। लेकिन बड़ा सवाल ये है कि क्या यह सिर्फ एक स्कूल का मामला है, या सिस्टम में गहरे बैठे अंधविश्वास का लक्षण?

पहाड़ों की आस्था vs शिक्षा की जिम्मेदारी

यह सच है कि पहाड़ी इलाकों में आस्था गहरी होती है। लेकिन जब वही आस्था सरकारी संस्थानों के फैसले तय करने लगे तब खतरा शुरू होता है। आस्था व्यक्तिगत हो सकती है। लेकिन शिक्षा हमेशा वैज्ञानिक होनी चाहिए भूत” नहीं, सोच बदलने की जरूरत है, यह मामला सिर्फ एक “भूत मंदिर” का नहीं है।

यह उस सोच का आईना है जहां: डर > तर्क। आस्था > विज्ञान और प्रशासन > जिम्मेदारी से भागता हुआ दिखता है।  अगर आज स्कूलों में ‘भूत’ के नाम पर पैसे लिए जाएंगे, तो कल शायद इलाज की जगह “झाड़-फूंक” पढ़ाई जाएगी। क्या हम 21वीं सदी में हैं या फिर अंधविश्वास के अंधेरे में लौट रहे हैं?

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