भारत-बांग्लादेश सीमा की सुरक्षा को लेकर एक चौंकाने वाला प्रस्ताव सामने आया है। नदी वाले इलाकों में सांप और मगरमच्छ जैसे सरीसृपों के इस्तेमाल पर विचार। सीमा सुरक्षा बल को यह सुझाव अमित शाह के निर्देशों के संदर्भ में दिए गए एक आंतरिक संचार के जरिए मिला है। पहली नजर में यह प्रस्ताव “असामान्य” नहीं बल्कि अत्यंत असामान्य और चिंताजनक लगता है और यही कारण है कि यह केवल सुरक्षा का मुद्दा नहीं, बल्कि मानवाधिकार, पर्यावरण और नीति-निर्माण की समझ पर भी सवाल खड़े करता है। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
क्या है प्रस्ताव का तर्क?
भारत-बांग्लादेश सीमा का बड़ा हिस्सा नदी, दलदली और बाढ़-प्रभावित इलाकों से गुजरता है। कुल सीमा: लगभग 4,096 किमी। बड़ी दूरी अब भी बिना बाड़ के। कई जगहों पर भौतिक फेंसिंग संभव नहीं। ऐसे में “प्राकृतिक अवरोध” (natural deterrent) के रूप में सरीसृपों का इस्तेमाल एक विचार के तौर पर सामने आया है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या यह सुरक्षा रणनीति है या कल्पनात्मक प्रयोग? व्यावहारिकता: क्या यह संभव भी है? इस प्रस्ताव में कई गंभीर व्यावहारिक समस्याएं हैं:
1. नियंत्रण असंभव-सांप और मगरमच्छ “तैनात” किए जाने वाले सैनिक नहीं हैं। वे सीमा नहीं पहचानते। वे स्थानीय लोगों पर भी हमला कर सकते हैं।
2. स्थानीय आबादी पर खतरा-सीमावर्ती इलाकों में हजारों लोग रहते हैं जिसमे मछुआरे, किसान, बच्चे भी हैं। बाढ़ के समय ये जानवर गांवों में घुस सकते हैं। इससे आम नागरिकों की जान को सीधा खतरा होगा।
3. पर्यावरणीय असंतुलन-प्राकृतिक आवास से बाहर इन जीवों को लाना पारिस्थितिकी (ecosystem) को बिगाड़ सकता है। वन्यजीव संरक्षण कानूनों का उल्लंघन भी हो सकता है।
सुरक्षा बनाम मानवीय दृष्टिकोण
सीमा सुरक्षा निस्संदेह एक गंभीर और आवश्यक विषय है। लेकिन हर समाधान मानवीय और कानूनी कसौटी पर खरा उतरना चाहिए। क्या हम सुरक्षा के नाम पर नागरिकों को खतरे में डाल सकते हैं? क्या “डर” को रणनीति बनाया जा सकता है? यहां यह याद रखना जरूरी है कि: सीमा पर रहने वाले लोग दुश्मन नहीं, नागरिक हैं। उनकी सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी सीमा की।
क्या इससे बेहतर विकल्प नहीं हैं? गृह मंत्रालय की रिपोर्ट खुद मानती है कि तकनीकी समाधान विकसित किए जा रहे हैं: ड्रोन निगरानी। स्मार्ट फेंसिंग (CIBMS) सेंसर और नाइट विजन तकनीक। बेहतर मोबाइल नेटवर्क और संचार ये सभी उपाय आधुनिक, नियंत्रित और सुरक्षित हैं। इनमें मानव जीवन को खतरे में डालने का जोखिम कम है। तो फिर सवाल उठता है कि क्या सरकार तकनीकी समाधान छोड़कर “प्रयोगात्मक और जोखिम भरे” विचारों की ओर जा रही है?
राजनीतिक और प्रशासनिक संदेश
इस तरह के प्रस्ताव दो तरह के संकेत देते हैं:
1. समस्या की गंभीरता-सीमा सुरक्षा में वास्तविक चुनौतियां हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
2. नीति निर्माण में असमंजस-जब व्यवहारिक और वैज्ञानिक समाधान मौजूद हों, तब ऐसे विचार नीति की दिशा पर सवाल खड़े करते हैं।
सुरक्षा के नाम पर जोखिम नहीं
सांप और मगरमच्छों का इस्तेमाल सुनने में भले “नवाचार” लगे, लेकिन हकीकत में यह: अव्यावहारिक है, खतरनाक है और मानवीय दृष्टि से अस्वीकार्य है। भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में सुरक्षा नीतियां विज्ञान पर आधारित होनी चाहिए। नागरिकों की सुरक्षा को केंद्र में रखना चाहिए। और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप होनी चाहिए। अंततः, सीमा की रक्षा जरूरी है लेकिन उसके लिए अपने ही नागरिकों को खतरे में डालना कोई समाधान नहीं हो सकता।
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