असम विधानसभा चुनाव से ठीक पहले हिमंता बिस्वा शर्मा पर लगे गंभीर आरोपों ने राजनीतिक माहौल को गरमा दिया है। कांग्रेस के प्रवक्ता पवन खेड़ा ने जिस तरह मुख्यमंत्री की पत्नी पर कई पासपोर्ट, विदेशी संपत्तियों और भारी-भरकम निवेश के आरोप लगाए हैं, वह केवल एक व्यक्ति या परिवार का मामला नहीं रह जाता बल्कि यह सीधे-सीधे राजनीतिक पारदर्शिता, चुनावी नैतिकता और संस्थागत विश्वसनीयता से जुड़ जाता है। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
आरोप कितने गंभीर हैं?
कांग्रेस ने जो आरोप लगाए हैं, वे साधारण राजनीतिक बयानबाज़ी से कहीं आगे जाते हैं: कई देशों के पासपोर्ट रखने का दावा। अमेरिका के टैक्स-हेवन वायोमिंग में करोड़ों डॉलर का निवेश। दुबई में संपत्तियां और कथित शेल कंपनियां। चुनावी हलफनामे में संपत्ति छिपाने का आरोप। अगर इनमें से कोई भी आरोप सही साबित होता है, तो यह केवल राजनीतिक मुद्दा नहीं बल्कि कानूनी और आपराधिक मामला बन सकता है।
लेकिन सच्चाई क्या है?
यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि: इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी तक नहीं हुई है। खुद हिमंता बिस्वा शर्मा और उनकी पत्नी ने इन्हें “झूठा, गढ़ा हुआ और राजनीतिक रूप से प्रेरित” बताया है। उन्होंने पवन खेड़ा के खिलाफ मानहानि का मुकदमा करने की बात कही है। यानी मामला अभी सच्चाई बनाम आरोप के बीच खड़ा है और इसका फैसला अदालत या जांच एजेंसियां (अगर दबाव में न हो) तो ही कर सकती हैं, न कि राजनीतिक मंच।
कानून क्या कहता है?
सुप्रीम कोर्ट के 2018 और 2022 के फैसले साफ करते हैं कि चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार को अपनी, अपने जीवनसाथी और आश्रितों की संपत्ति का पूरा खुलासा करना अनिवार्य है। गलत जानकारी देना या छिपाना “भ्रष्ट आचरण” माना जा सकता है। इस लिहाज से, अगर आरोपों में दम है, तो यह मामला बेहद गंभीर हो जाता है। लेकिन अगर आरोप झूठे साबित होते हैं, तो यह राजनीतिक बदनामी और दुष्प्रचार का उदाहरण होगा।
लोकतंत्र की असली परीक्षा
यह मामला केवल असम की राजनीति तक सीमित नहीं है। यह पूरे लोकतंत्र के लिए एक टेस्ट केस है: क्या आरोपों की निष्पक्ष जांच होगी? क्या सच्चाई सामने आएगी, चाहे वह किसी के भी खिलाफ हो? क्या चुनावी राजनीति तथ्यों पर आधारित रहेगी या आरोपों के शोर में दब जाएगी? अंततः, लोकतंत्र में सबसे बड़ी ताकत “सत्य” की होती है, लेकिन शर्त यह है कि उसे सामने आने का पूरा मौका दिया जाए।
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