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Home»भारत

193 सांसद, फिर भी खारिज -क्या संसद में जवाबदेही भी “वैकल्पिक” हो गई है?

adminBy adminApril 16, 2026 भारत No Comments3 Mins Read
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देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था के केंद्र में बैठी संस्था संसद से एक ऐसा फैसला सामने आया है जिसने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए 193 सांसदों द्वारा लाया गया प्रस्ताव बिना कोई कारण बताए खारिज कर दिया गया। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

यह केवल एक प्रस्ताव का खारिज होना नहीं है बल्कि यह लोकतांत्रिक पारदर्शिता, संस्थागत जवाबदेही और विपक्ष की भूमिका पर सीधा सवाल है। 193 सांसदों की आवाज़… और एक “संक्षिप्त खारिज” लोकसभा में 130 सांसद। राज्यसभा में 63 सांसद। यानी कुल 193 जनप्रतिनिधियों ने हस्ताक्षर कर एक संवैधानिक प्रक्रिया शुरू करने की कोशिश की।

लेकिन ओम बिरला और सीपी. राधाकृष्णन ने इसे स्वीकार करने से इनकार कर दिया और सबसे अहम बात कि कोई स्पष्ट कारण नहीं बताया गया। क्या यह प्रक्रिया का पालन है, या प्रक्रिया के नाम पर सवालों से बचना? कानून क्या कहता है और क्या हुआ? कानून के मुताबिक: मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के जज जैसी ही है

नोटिस पर पर्याप्त सांसदों के हस्ताक्षर होने चाहिए (जो यहां थे) इसके बाद स्पीकर/सभापति तय करते हैं कि प्रस्ताव स्वीकार होगा या नहीं लेकिन क्या “निर्णय” बिना “कारण” के दिया जा सकता है? क्या यह पारदर्शिता के मूल सिद्धांत के खिलाफ नहीं है? असली सवाल: डर किस बात का? अगर आरोप निराधार थे, तो: एक जांच कमेटी बनती। तथ्य सामने आते

और मामला खत्म हो जाता लेकिन प्रस्ताव को शुरुआती चरण में ही खारिज कर देना यह संकेत देता है कि:सिस्टम सवालों का सामना करने से बच रहा है या फिर राजनीतिक समीकरण संस्थागत प्रक्रिया पर हावी हो रहे हैं।

चुनाव आयोग की साख पर असर

चुनाव आयोग भारत की सबसे महत्वपूर्ण संस्थाओं में से एक है। इसकी निष्पक्षता ही लोकतंत्र की विश्वसनीयता तय करती है और उसके प्रमुख पर सवाल उठने के बाद पारदर्शी जांच होना जरूरी था लेकिन अब स्थिति यह है कि:आरोप हैं, जवाब नहीं है और जांच भी नहीं है। यह स्थिति संदेह को खत्म नहीं, बल्कि और गहरा करती है।

विपक्ष बनाम सत्ता- या लोकतंत्र बनाम अपारदर्शिता?

विपक्ष इसे “संसद का मजाक” बता रहा है और यह आरोप हल्के में नहीं लिया जा सकता। क्योंकि लोकतंत्र में: विपक्ष सवाल पूछता है। सत्ता जवाब देती है और संसद मंच बनती है। लेकिन अगर: सवाल उठाने का मौका ही न मिले। और प्रक्रिया शुरुआत में ही रोक दी जाए। तो फिर संसद की भूमिका क्या रह जाती है?

एक खतरनाक मिसाल?

आज यह प्रस्ताव खारिज हुआ है, कल कोई और भी हो सकता है। अगर बिना कारण बताए प्रस्ताव खारिज करना “नया सामान्य” बन गया, तो: भविष्य में कोई भी संवैधानिक पद किसी भी तरह की जांच से बच सकता है। यह केवल एक व्यक्ति का मामला नहीं बल्कि यह पूरे लोकतांत्रिक ढांचे की विश्वसनीयता का सवाल है।

जवाबदेही का मौन

193 सांसदों की पहल एक संवैधानिक प्रक्रिया और अंत में एक “संक्षिप्त खारिज”बिना कारण। यह घटना हमें एक असहज निष्कर्ष की ओर ले जाती है कि क्या भारत में जवाबदेही अब “औपचारिकता” बनती जा रही है? क्या संस्थाएं सवालों से ऊपर होती जा रही हैं? लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता बल्कि वह चलता है जवाबदेही, पारदर्शिता और सवाल पूछने की आज़ादी से। और जब इन तीनों में से कोई एक कमजोर पड़ता है तो लोकतंत्र सिर्फ एक ढांचा रह जाता है, आत्मा नहीं।

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