भाजपा राज में ‘जांच’ अब सच्चाई को दबाने और दोषियों को बचाने का सबसे सुरक्षित तरीका बन चुकी है — चाहे वो जज हों, अफसर हों, नेता हों या फिर आतंकी हमले।
1. जस्टिस शेखर यादव मामला: नफ़रत फैलाओ, जज बने रहो:- इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज शेखर यादव ने खुलेआम विश्व हिंदू परिषद के मंच से मुसलमानों के ख़िलाफ़ ज़हर उगला — “भारत बहुसंख्यकों की मर्ज़ी से चलेगा”, “चार शादी, तीन तलाक़ देश के लिए ख़तरा हैं” और ‘कठमुल्ला’ जैसी घृणित शब्दावली का इस्तेमाल किय। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने आंतरिक जांच की प्रक्रिया शुरू की, लेकिन जैसे ही राज्यसभा सचिवालय ने ‘संवैधानिक बाध्यता’ का हवाला दिया, जांच की योजना तत्काल ठंडे बस्ते में डाल दी गई। क्या यही है न्यायिक जवाबदेही?
2. पेगासस जासूसी कांड: जाँच का शोर, निष्कर्ष का शून्य:- 2021 में खुलासा हुआ कि पत्रकारों, विपक्षी नेताओं, जजों और यहां तक कि चुनाव आयोग के अधिकारियों की इज़राइली स्पाईवेयर ‘पेगासस’ से जासूसी की गई। सुप्रीम कोर्ट ने जांच का आदेश दिया, तकनीकी समिति बनी, रिपोर्ट आई… लेकिन सरकार ने रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं किया। क्यों? क्योंकि जाँच का मकसद था समय बिताना, जनता को भुलावा देना, और असली दोषियों को बचाना।
3. लखीमपुर खीरी नरसंहार: गाड़ी चढ़ा दो, मंत्री बेटा बचा लो:- बिना किसी उकसावे के किसानों पर गाड़ी चढ़ा दी गई। आरोपी कौन? केंद्रीय गृह राज्यमंत्री अजय मिश्रा टेनी का बेटा। वीडियो, चश्मदीद, सबूत — सब कुछ सामने था। लेकिन CBI जांच इतनी “गहराई से” हुई कि टेनी को इस्तीफा तक नहीं देना पड़ा, बेटा जमानत पर है और चुनाव प्रचार भी कर चुका है।
4. जज लोया मौत: सवालों की मौत:- CBI जज ब्रजगोपाल लोया की मौत तब हुई जब वे भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के खिलाफ सोहराबुद्दीन फेक एनकाउंटर केस की सुनवाई कर रहे थे। मौत संदिग्ध थी, साथी जजों ने सवाल उठाए, परिवार ने न्याय की मांग की। पर सुप्रीम कोर्ट ने जांच की मांग को ही खारिज कर दिया। आज तक कोई स्वतंत्र जांच नहीं हुई। भाजपा को बचाना था — सो न्याय को मार दिया गया।
5. पुलवामा हमला: नाकामी की जांच कौन करेगा?:- CRPF के 40 जवान एक आत्मघाती हमले में मारे गए। सवाल उठे कि इतने संवेदनशील क्षेत्र में सुरक्षा में चूक कैसे हुई? इंटेलिजेंस इनपुट था, फिर भी चूक क्यों? कोई पारदर्शी जांच नहीं। न कोई कमेटी, न कोई ज़िम्मेदार तय हुआ। उल्टा इसे चुनावी मुद्दा बनाकर राजनीतिक लाभ उठाया गया।
6. भाजपा मंत्री विजय शाह ने भारतीय सेना की सम्मानित अफसर लेफ्टिनेंट कर्नल सोफ़िया कुरैशी को मंच से “आतंकवादियों की बहन” कहकर पुकारा था — जो कि: धार्मिक नफ़रत फैलाने वाला, एक देशभक्त अफसर का अपमान, और सेना के गौरव का अपमान था। जबलपुर हाईकोर्ट की बेंच ने इस बयान पर स्वतः संज्ञान (suo motu cognizance) लिया। कोर्ट ने कहा: “यह बयान स्पष्ट रूप से साम्प्रदायिक भावना को भड़काने वाला है। ऐसे शब्द न केवल भारत की धर्मनिरपेक्षता पर हमला हैं, बल्कि सेना जैसे प्रतिष्ठित संस्थान का भी अपमान हैं।” हाईकोर्ट ने राज्य के DGP (पुलिस महानिदेशक) को निर्देशित किया कि: मंत्री विजय शाह पर तुरंत FIR दर्ज की जाए।इस मामले में IPC की उचित धाराओं में मुकदमा दर्ज हो। कोर्ट ने यह भी कहा कि:“राजनीतिक लाभ के लिए धार्मिक पहचान को निशाना बनाना संविधान के मूल मूल्यों का उल्लंघन है।” इसके बावजूद क्या हुआ? अभी तक सार्वजनिक रूप से FIR दर्ज होने की पुष्टि नहीं। गिरफ्तारी या पूछताछ नहीं। भाजपा की प्रतिक्रिया चुप्पी या बचाव? मुख्यधारा मीडिया बहुसंख्यक हिस्से ने इसे दबा दिया जब एक भाजपा मंत्री एक मुस्लिम अफसर को “आतंकी की बहन” कहता है, तब प्रशासन चुप, सरकार मौन, और कोर्ट को खुद पहल करनी पड़ती है। फिर भी करवाई नहीं होती।
7. बिलकिस बानो केस: बलात्कारी रिहा, गार्ड ऑफ ऑनर:- 2002 गुजरात दंगों के दौरान बलात्कार और हत्या के दोषी 11 लोगों को भाजपा सरकार ने स्वतंत्रता दिवस पर रिहा कर दिया — वो भी “अच्छे व्यवहार” के नाम पर। सवाल उठे, विरोध हुआ — लेकिन जांच? कोई नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने भी टालमटोल की।
8. मेघालय में ईडी अफसर की संदिग्ध मौत: खामोशी क्यों?:- सीबीआई और ईडी के कुछ अफसरों की संदिग्ध मौतें, विशेषकर ऐसे केसों में जहां सरकार के करीबी लोग घिर सकते थे — सभी फाइलें बंद। न कोई एफआईआर, न कोई पोस्टमॉर्टम की सार्वजनिक रिपोर्ट। इसके अलावा भाजपा नेताओं और हिंदुत्ववादियों द्वारा खुलेआम नफ़रत फैलाने, अल्पसंख्यकों को गाली देने, उन्हें आतंकवादी कहने, या जनसंहार जैसी धमकियाँ देने के बावजूद FIR तो होती हैं, लेकिन जाँच के नाम पर सालों तक कोई कार्रवाई नहीं होती — क्योंकि सत्ताधारी दल की राजनीतिक इच्छा ही जाँच को चलाती या रोकती है। यहाँ उन प्रमुख मामलों की सूची और विवरण दिया जा रहा है, जहाँ FIR दर्ज हुई, बयान बेहद नफ़रतपूर्ण और कानूनविरोधी थे, लेकिन कोई गिरफ्तारी या गंभीर कार्रवाई नहीं हुई, या फिर जाँच जानबूझकर ठंडे बस्ते में डाल दी गई।
1. योगी आदित्यनाथ – “अगर मुसलमान एक होंगे, तो हम कृष्ण बनकर मथुरा को याद दिला देंगे” “अगर वो एक मारेंगे, तो हम दस मारेंगे” योगी ने 2014 से पहले और बाद में कई बार अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ सांप्रदायिक बयान दिए। 2007 में गोरखपुर दंगे भड़काने के आरोप में FIR हुई भाषण का वीडियो भी था। उसके बावजूद यूपी सरकार ने ही FIR वापस ले ली। सुप्रीम कोर्ट में मामला खिंचता रहा, लेकिन योगी अब मुख्यमंत्री हैं — कोई सज़ा नहीं।
2. भाजपा सांसद प्रवेश वर्मा – 2020 में दिल्ली चुनाव के दौरान भड़काऊ भाषण दिया, मुसलमानों को रेपिस्ट कहा। FIR दर्ज की गई थी, लेकिन कोई चार्जशीट नहीं, न ही गिरफ्तारी। अब भी सांसद है, कोई सज़ा नहीं।
3. कपिल मिश्रा –2020 में दिल्ली दंगों से एक दिन पहले, कैमरे पर खुलेआम धमकी दी। परिणाम: अगले दिन दंगे भड़के, 50+ मौतें, दर्जनों मुसलमानों की दुकानें जलीं। FIR, कई याचिकाएँ हुईं, लेकिन दिल्ली पुलिस ने FIR करने से इनकार कर दिया। हाईकोर्ट में मामला, लेकिन सरकार ने विरोध किया। आज कपिल मिश्रा को भाजपा ने इनामस्वरूप MCD में बड़ी ज़िम्मेदारी दी।
4. साध्वी प्रज्ञा ठाकुर – दिसंबर 2022 को बंगलौर में बयान दिया।“हिंदू लड़कियों को हथियार उठाना चाहिए” “लव जिहाद से बचने के लिए हिंदू लड़कियाँ चाकू रखें”। सोशल मीडिया और नागरिक संगठनों ने मांग की, लेकिन कोई कानूनी कार्रवाई नहीं। इतना ही पहले ही वो मालेगांव बम ब्लास्ट की मुख्य आरोपी भी है उसके बावजूद ज़मानत पर बाहर, और भाजपा सांसद है।
5. सुरेश चव्हाणके (सुदर्शन न्यूज़) – दिसंबर 2021 में एक कार्यक्रम में खुलेआम हिंदू युवाओं को मुसलमानों के ख़िलाफ़ हिंसा की शपथ दिलाई।“भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने की शपथ”ली। दिल्ली पुलिस ने FIR दर्ज की। अब तक कोई गिरफ़्तारी नहीं, TV पर रोज़ ज़हर उगलते रहता है।
6. अनुराग ठाकुर –2020 में दिल्ली चुनाव से पहले एक रैली में कहा “देश के गद्दारों को…” (भीड़: गोली मारो **** को!) चुनाव आयोग ने “फटकार” दी, पर पुलिस ने कोई केस नहीं दर्ज किया। अब केंद्रीय मंत्री है।
7. नूपुर शर्मा – टीवी डिबेट में नफ़रत भरी और उकसाने वाली टिप्पणी की। पैगंबर मोहम्मद साहब के खिलाफ टिप्पणी की। देशभर में 10+ जगहों पर FIR हुईं। फिर भी कोई गिरफ्तारी नहीं, सुप्रीम कोर्ट तक ने कहा था, “पूरे देश में लगी आग की जिम्मेदार नूपुर है”, फिर भी सरकार ने बचाया। भाजपा ने “सस्पेंड” तो किया, लेकिन कोई सज़ा नहीं, कोई जाँच नहीं।
8. नितेश राणे (भाजपा मंत्री)”अगर हमारे रामगिरी महाराज के खिलाफ तुमने कुछ भी किया तो तुम्हारी मस्जिदों के अंदर आकर चुन-चुन के मारेंगे।” इस बयान के बाद उसके खिलाफ दो एफआईआर दर्ज की गईं, लेकिन न कोई सज़ा हुई न विधायिका गई। पिछले साल सांगली में उसने कहा था “अगर 24 घंटे के लिए पुलिस को छुट्टी दे दी जाए, तो हम (हिंदू) अपनी ताकत दिखा देंगे।” यह बयान स्पष्ट रूप से कानून व्यवस्था को चुनौती देता है। इसके अलावा भी दर्जनों भड़काऊ बयान हैं। लेकिन आज तक कोई करवाई नहीं।
9. अनिल उपाध्याय (RSS कार्यकर्ता) झूठा मुस्लिम नाम लेकर फर्जी वीडियो बनाए मुस्लिमों को बदनाम किया। कई FIR, लेकिन कोई जेल नहीं, कोई सज़ा नहीं।
10. तेजस्वी सूर्या (भाजपा सांसद) बंगलुरु एयरपोर्ट पर दरवाज़ा खोलने का मामला। FIR दर्ज, लेकिन कोई पूछताछ नहीं। जांच अब सत्य का हथियार नहीं, सत्ता का हथियार है:- भाजपा के राज में “जांच” एक राजनीतिक औज़ार है। जिसे बचाना हो — ‘जांच’ शुरू करके दबा दो। जिसे फँसाना हो — ‘जांच’ को मीडिया ट्रायल बना दो। FIR दर्ज होना कोई गारंटी नहीं है कि दोषी को सज़ा मिले, जब सरकार दोषियों के साथ हो, तो “जांच” एक दिखावा बन जाती है। क्या भारत में जांच सिर्फ़ जनता को चुप कराने का ड्रामा बनकर रह गई है? भाजपा के इस “जांच तंत्र” का पर्दाफाश अब ज़रूरी है। क्योंकि यह लोकतंत्र के मूल को खोखला कर रहा है — जहाँ अपराध नहीं, राजनीतिक मर्ज़ी तय करती है कि कौन दोषी है और कौन बेगुनाह।