2022 के चुनाव प्रचार के दौरान एक जनसभा में “हिसाब-किताब” की बात करने वाले अब्बास अंसारी को कोर्ट ने दो साल की सज़ा सुनाई और उन्हें विधायक पद से अयोग्य करार दिया गया। कोर्ट चला, फैसला आया, विधानसभा अध्यक्ष ने छुट्टी के दिन सचिवालय खोला, और तुरंत उनकी सीट खाली घोषित कर दी गई।जब्कि अगले दिन भी ये सब हो सकता था लेकिन क्या और क्यों जल्दी थी पता नहीं। सबकुछ इतनी तेज़ी से हुआ मानो कोई आतंकी पकड़ा गया हो। अब्बास अंसारी कोई पहले विधायक नहीं हैं जिनके साथ ये मामला पेश आया हो योगी राज में इससे पहले 2019 में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और तत्कालीन जिला मजिस्ट्रेट के खिलाफ भड़काऊ भाषण देने के मामले में आजम खान भी दोषी ठहराए गए। और तीन साल की सज़ा के बाद अक्टूबर 2022 में विधायक पद से अयोग्य घोषित किए गए। उनके बाद 2008 के एक मामले में अब्दुल्ला आजम खान को भी दो साल की सज़ा मिलने के बाद फरवरी 2023 में विधायक पद से अयोग्य घोषित किए गया। लेकिन सवाल ये है कि क्या यही तेज़ी उस वक़्त दिखाई गई जब भाजपा नेता खुलेआम संविधान को ठेंगा दिखाकर मंचों से नफरत उगलते हैं? क्या मुसलमान होना ही गुनाह बन चुका है? आइए देखते हैं भाजपा नेताओं के वो बयान जिनसे आग लगी, समाज बंटा, पर कार्रवाई?
1. योगी आदित्यनाथ (मुख्यमंत्री, उत्तर प्रदेश) बयान: “अगर वो एक मारेंगे, तो हम दस मारेंगे”– क्या ये किसी दंगाई मानसिकता का संकेत नहीं है? फिर भी सीएम बने घूम रहे हैं।
2. अनुराग ठाकुर (केंद्रीय मंत्री) “देश के गद्दारों को…” (भीड़ ने जवाब दिया “गोली मारो…”)– क्या ये बयान सिर्फ नारेबाज़ी थी या हिंसा की खुली छूट? FIR के बाद भी मंत्री पद सुरक्षित।
3. साक्षी महाराज (भाजपा सांसद) “मदरसे आतंकवादी पैदा करते हैं।” मुसलमानों की पूरी शिक्षा व्यवस्था को बदनाम कर दिया गया, लेकिन न FIR, न नोटिस, न जुर्माना!
4. प्रज्ञा ठाकुर (भाजपा सांसद, मालेगांव ब्लास्ट की आरोपी) “नाथूराम गोडसे देशभक्त था और रहेगा।” आतंकवादी का महिमामंडन खुलेआम, आज भी सांसद बनी बैठी हैं।
5. सुरेश राणा (पूर्व मंत्री, यूपी) “अगर बीजेपी हार गई तो पश्चिमी यूपी में हिंदू बहन-बेटियां सुरक्षित नहीं रहेंगी।” यह सीधे तौर पर सांप्रदायिक डर फैलाने का मामला है, लेकिन कार्रवाई? कुछ नहीं!
6. निशिकांत दुबे (BJP सांसद, झारखंड) “देश में हो रहे सभी गृहयुद्धों के लिए मुख्य न्यायाधीश जिम्मेदार हैं।” “धार्मिक युद्ध भड़काने के लिए केवल और केवल सुप्रीम कोर्ट जिम्मेदार है।” सुप्रीम कोर्ट ने इन टिप्पणियों को “गंभीर और आपत्तिजनक” बताया, लेकिन अवमानना की कार्रवाई नहीं की। दुबे ने अदालत की टिप्पणी के बाद सोशल मीडिया पर फिल्म ‘निकाह’ का गाना पोस्ट कर मजाक उड़ाया।
7. तेजस्वी सूर्या (भाजपा सांसद) बंगलौर हिंसा में मुस्लिम कर्मचारियों को लेकर भड़काऊ भाषण और नाम लेकर सांप्रदायिक ज़हर घोला। न FIR, न गिरफ्तारी, न कोर्ट, न अयोग्यता।
8. नितेश राणे (भाजपा मंत्री)”अगर हमारे रामगिरी महाराज के खिलाफ तुमने कुछ भी किया तो तुम्हारी मस्जिदों के अंदर आकर चुन-चुन के मारेंगे।” इस बयान के बाद उसके खिलाफ दो एफआईआर दर्ज की गईं, लेकिन न कोई सज़ा हुई न विधायिका गई। पिछले साल सांगली में उसने कहा था “अगर 24 घंटे के लिए पुलिस को छुट्टी दे दी जाए, तो हम (हिंदू) अपनी ताकत दिखा देंगे।” यह बयान स्पष्ट रूप से कानून व्यवस्था को चुनौती देता है। सांगली में ही पुलिस को धमकी देते हुए नितेश राणे ने कहा था “अगर लव जिहाद केस की एफआईआर दर्ज करने में देरी की तो पुलिस स्टेशन में आकर हंगामा करूंगा और एफआईआर दर्ज करने में देरी करने वाले पुलिसवाले का ट्रांसफर ऐसे जिले में करूंगा, जहां पत्नी का फोन भी नहीं लगेगा।” यह बयान पुलिस प्रशासन को खुलेआम धमकी देने जैसा है। पिछले महीने रत्नागिरी में कहा था “अगर वो धर्म पूछ कर गोली मार रहें है तो आप कम से कम धर्म पूछ कर ही सामान खरीदो।” यह बयान सामाजिक विभाजन को बढ़ावा देता है।इसके अलावा भी दर्जनों भड़काऊ बयान हैं।
9. राजस्थान के BJP विधायक कंवरलाल मीणा को तो एक सरकारी अफसर को धमकाने पर 3 साल की सज़ा मिली है लेकिन उसकी भी विधायिका बरक़रार है ! यह दोहरा मापदंड नहीं तो और क्या है? यह समय है कि हम सभी इस दोहरा मापदंड के खिलाफ आवाज उठाएं और समान न्याय की मांग करें। तो क्या सिर्फ मुसलमान विधायक ही “गुनहगार” हैं? अब्बास अंसारी का बयान जरूर आपत्तिजनक था, लेकिन क्या वह किसी समुदाय को हिंसा के लिए उकसा रहा था? क्या उसने नाथूराम को महिमामंडित किया? क्या उसने गोली मारने के नारे लगाए? अगर नहीं, तो फिर दो साल की सज़ा और अयोग्यता क्यों? यह दोहरा मापदंड नहीं तो और क्या है? जब मुसलमान बोलता है, तो उसे “भड़काऊ भाषण” कहकर जेल में डाला जाता है। जब हिन्दू भाजपा नेता हिंसा की खुली धमकी देते हैं, तो वह “चुनावी भाषण” बन जाता है। यह मुस्लिम विरोधी नहीं, तो और क्या है? मुख्तार अंसारी का बेटा होना क्या अपने आप में गुनाह है? क्या अब मुसलमान नेताओं को बोलने का भी हक नहीं बचा? क्या “हिसाब-किताब” कहना बड़ी बात है, और “गोली मारो” कहना सामान्य? यह न्याय नहीं, ‘नियोजित सज़ा’ है इस देश में, मुसलमान का नाम हो तो उसे जेल तय है। भाजपा का नेता हो तो उसे ज़हर उगलने की छूट है। मुस्लिम विधायक बोले तो उसे “अयोग्य” करार दे दिया जाता है। हिंदू सांसद गोली मारे, तो वह “राष्ट्रभक्त” बन जाता है। अब वक्त है सवाल पूछने का —क्या कानून सबके लिए बराबर है? या भाजपा ने कानून को सिर्फ बहुसंख्यक तुष्टिकरण और मुस्लिम दमन का औज़ार बन लिया है? अगर लोकतंत्र ज़िंदा है, तो इन भेदभावपूर्ण फैसलों के खिलाफ आवाज़ बुलंद होनी चाहिए। वरना अदालतें और संविधान भी सिर्फ बहुसंख्यक राजनीति के नौकर बनकर रह जाएंगे।