भारत में एक बार फिर पत्रकारिता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक मूल्यों पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। मॉलीटिक्स, नेशनल दस्तक, 4PM न्यूज़ जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म्स और कई स्वतंत्र आवाज़ों को फेसबुक व अन्य सोशल मीडिया माध्यमों पर प्रतिबंधित किया जाना महज़ एक प्रशासनिक कार्रवाई नहीं, बल्कि एक बड़े ट्रेंड का हिस्सा प्रतीत होता है। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
एक ऐसा ट्रेंड, जिसमें सत्ता से सवाल पूछने वालों को व्यवस्थित तरीके से हाशिये पर धकेला जा रहा है। आईटी एक्ट की धारा 79(3)(b) का इस्तेमाल कर कंटेंट को ब्लॉक करना कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है, लेकिन सवाल यह है कि यह प्रक्रिया किनके खिलाफ और किस पैमाने पर लागू की जा रही है? क्या यह महज़ “कानून का पालन” है या “चुनिंदा आवाज़ों का दमन”?
सवाल पूछना कब से जुर्म हो गया?
मॉलीटिक्स और नेशनल दस्तक जैसे प्लेटफॉर्म्स का दावा है कि उन्हें इसलिए निशाना बनाया गया क्योंकि वे सत्ता से असहज करने वाले सवाल पूछ रहे थे। यदि यह सच है, तो यह लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है। पत्रकारिता का पहला कर्तव्य ही सत्ता से सवाल करना होता है न कि उसकी प्रशंसा करना। वरिष्ठ पत्रकारों की प्रतिक्रियाएं भी इसी ओर इशारा करती हैं कि यह कोई एक-दो घटनाओं का मामला नहीं, बल्कि एक निरंतर चल रही प्रक्रिया है। हर दिन एक नया चैनल, एक नई वेबसाइट या एक नया अकाउंट बंद हो रहा है, यह सामान्य नहीं है।
पहले भी हुए हैं ऐसे हमले
यह पहली बार नहीं है जब स्वतंत्र पत्रकारिता को इस तरह निशाना बनाया गया हो। द वायर की वेबसाइट को ब्लॉक किया जाना। पत्रकारों और व्यंग्यकारों के एक्स (ट्विटर) अकाउंट्स को प्रतिबंधित करना। आरटीआई के जरिए जानकारी मांगने पर सरकार का इनकार। कश्मीर के पत्रकारों के अकाउंट्स पर कार्रवाई। ये सभी घटनाएं एक पैटर्न की ओर संकेत करती हैं जहां सूचना पर नियंत्रण स्थापित करने की कोशिश की जा रही है। इतना ही नहीं, इन्फ्लुएंसर मुकेश मोहन को 50 करोड़ का मानहानि नोटिस भेजना और एफआईआर दर्ज करना भी इसी दबाव की राजनीति का हिस्सा माना जा सकता है। कानूनी कार्रवाई का डर दिखाकर आलोचनात्मक आवाज़ों को चुप कराने की कोशिश लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए खतरनाक संकेत है।
एक तरफ़ कार्रवाई, दूसरी तरफ़ ‘छूट’
जहां एक ओर स्वतंत्र मीडिया संस्थानों पर लगातार कार्रवाई हो रही है, वहीं दूसरी ओर तथाकथित “गोदी मीडिया” को खुली छूट मिलती दिखाई देती है। ऐसे कई उदाहरण सामने आए हैं जहां सत्ता के करीबी मीडिया संस्थानों या व्यक्तियों को कानूनी राहत असाधारण तेजी से मिली। यहां तक कि छुट्टी के दिन अदालतें खुलवाकर जमानत दिलाने जैसी घटनाओं का उल्लेख भी सार्वजनिक बहस का हिस्सा रहा है। इससे यह धारणा मजबूत होती है कि कानून का इस्तेमाल समान रूप से नहीं, बल्कि चयनात्मक तरीके से किया जा रहा है।
डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की भूमिका
मेटा और एक्स जैसे प्लेटफॉर्म्स का यह कहना कि उन्होंने सरकारी निर्देशों के आधार पर कार्रवाई की, एक और गंभीर सवाल खड़ा करता है कि क्या ये प्लेटफॉर्म्स केवल “माध्यम” हैं या वे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संरक्षक भी हैं? यदि हर सरकारी निर्देश को बिना पारदर्शिता के लागू किया जाएगा, तो डिजिटल स्पेस भी वही बन जाएगा जो कभी सेंसरशिप के दौर में पारंपरिक मीडिया बन गया था। नियंत्रित, सीमित और भयग्रस्त।
लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी
लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता, बल्कि स्वतंत्र मीडिया, मजबूत विपक्ष और जागरूक नागरिकों से चलता है। जब मीडिया पर दबाव बढ़ता है, तो उसका सीधा असर जनता के जानने के अधिकार पर पड़ता है। आज अगर पत्रकार चुप हो जाएंगे, तो कल आम नागरिक की आवाज़ भी दबा दी जाएगी।
यह समय केवल पत्रकारों का नहीं, बल्कि पूरे समाज का इम्तिहान है। सवाल यह नहीं है कि कौन सा चैनल या पेज बंद हुआ बल्कि सवाल यह है कि क्या हम एक ऐसे भारत की ओर बढ़ रहे हैं जहां “सच बोलना” जोखिम बन जाए? अगर सत्ता से सवाल पूछना गुनाह बनता जा रहा है, तो यह सिर्फ पत्रकारिता का संकट नहीं, बल्कि लोकतंत्र का संकट है। और इतिहास गवाह है कि जब-जब आवाज़ों को दबाने की कोशिश हुई है, वे और बुलंद होकर उभरी हैं।
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