पश्चिम बंगाल में कलकत्ता हाईकोर्ट द्वारा चुनाव आयोग की ‘उपद्रवियों’ की सूची पर लगाई गई रोक केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं है, बल्कि यह भारत की चुनावी व्यवस्था की निष्पक्षता पर उठते सवालों का नया अध्याय भी है। अदालत ने साफ कहा कि बिना किसी स्पष्ट कानूनी आधार के नागरिकों को “उपद्रवी” घोषित कर उनके खिलाफ निवारक कार्रवाई की बात करना न केवल अधिकारों का उल्लंघन है, बल्कि यह मतदान जैसे मौलिक लोकतांत्रिक अधिकार को भी प्रभावित कर सकता है। यह टिप्पणी सीधे तौर पर उस भूमिका पर सवाल उठाती है, जो चुनाव आयोग को संविधान के तहत निष्पक्ष प्रहरी के रूप में निभानी चाहिए। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
अदालत की टिप्पणी “व्यापक निर्देश” या अतिरेक?
हाईकोर्ट ने अपने अंतरिम आदेश में स्पष्ट किया कि चुनाव संबंधी अपराध पहले से ही कानूनों—जैसे भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951-के तहत परिभाषित हैं। ऐसे में आयोग द्वारा एक “सामान्यीकृत सूची” जारी करना कानूनी दायरे से बाहर प्रतीत होता है। अदालत ने इसे “लांछन” तक करार दिया, यानी केवल प्रशासनिक कार्रवाई नहीं, बल्कि व्यक्तियों की प्रतिष्ठा और उनके अधिकारों पर असर डालने वाला कदम।
आरोपों का पुराना सिलसिला
यह पहला मौका नहीं है जब चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठे हों। पिछले कुछ वर्षों में कई विपक्षी दलों और विश्लेषकों ने आरोप लगाए हैं कि: आचार संहिता के उल्लंघन के मामलों में सत्ता पक्ष, विशेषकर भारतीय जनता पार्टी, के प्रति अपेक्षाकृत नरम रवैया अपनाया गया, विपक्षी नेताओं के खिलाफ तेज़ और सख्त कार्रवाई, जबकि सत्ताधारी नेताओं के मामलों में देरी या चुप्पी।
चुनावी कार्यक्रमों की टाइमिंग और चरणबद्ध चुनावों के फैसलों को लेकर भी पक्षपात के आरोप। उदाहरण के तौर पर, पिछले आम चुनावों और कई राज्य चुनावों के दौरान प्रधानमंत्री और शीर्ष नेताओं के भाषणों पर शिकायतों के बावजूद सीमित कार्रवाई को लेकर बहस हुई थी। हालांकि, यह भी सच है कि चुनाव आयोग हर बार इन आरोपों को खारिज करता रहा है और खुद को संवैधानिक रूप से स्वतंत्र संस्था बताता है।
बंगाल केस क्या सूची राजनीतिक थी?
इस मामले में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी सामने आया कि कथित “उपद्रवियों” की सूची में शामिल कई नाम सत्तारूढ़ दल तृणमूल कांग्रेस से जुड़े बताए गए। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि इस तरह की सूची चुनाव से ठीक पहले जारी करना न केवल राजनीतिक रूप से संवेदनशील है, बल्कि यह मतदाताओं और उम्मीदवारों को प्रभावित करने का प्रयास भी माना जा सकता है। यदि किसी सूची में निर्वाचित प्रतिनिधि, जैसे विधायक, सांसद, पंचायत सदस्य भी शामिल हों, तो सवाल और गंभीर हो जाते हैं: क्या यह कानून-व्यवस्था का मामला है, या राजनीतिक हस्तक्षेप?
मतदाता सूची से नाम कटने का मुद्दा
हाल के वर्षों में पश्चिम बंगाल समेत कई राज्यों में मतदाता सूची (voter list) से नाम कटने की शिकायतें भी सामने आई हैं। 2024-25 के दौरान विभिन्न राजनीतिक दलों ने दावा किया कि लाखों नाम “सत्यापन” या “डुप्लीकेशन हटाने” के नाम पर हटाए गए। विशेषकर अल्पसंख्यंकों के। हालांकि, चुनाव आयोग का कहना रहा है कि यह एक नियमित प्रक्रिया है, जिसमें मृत, स्थानांतरित या डुप्लीकेट प्रविष्टियों को हटाया जाता है। यहां समस्या आंकड़ों से ज्यादा पारदर्शिता की है। जब किसी क्षेत्र में बड़ी संख्या में नाम हटते हैं और उसका स्पष्ट सार्वजनिक डेटा या कारण सामने नहीं आता, तो संदेह पैदा होना स्वाभाविक है।
संस्थागत भरोसा बनाम राजनीतिक धारणा
भारत में चुनाव आयोग को लंबे समय तक एक बेहद विश्वसनीय संस्था माना जाता रहा है। लेकिन हाल के वर्षों में: विपक्ष का भरोसा घटा है अदालतों को हस्तक्षेप करना पड़ रहा है और आम मतदाता के बीच भी सवाल बढ़े हैं। यह स्थिति लोकतंत्र के लिए स्वस्थ नहीं मानी जा सकती।
सुधार की जरूरत या धारणा का संकट?
कलकत्ता हाईकोर्ट का यह फैसला केवल एक सूची पर रोक नहीं है बल्कि यह एक संकेत है कि संवैधानिक संस्थाओं की हर कार्रवाई को कानूनी कसौटी पर परखा जाएगा। चुनाव आयोग के सामने अब दोहरी चुनौती है: अपनी निष्पक्षता को व्यवहार में साबित करना और जनता व राजनीतिक दलों के बीच भरोसा फिर से स्थापित करना। जिसकी उम्मीद बहुत कम है। क्योंकि अंततः लोकतंत्र केवल चुनाव कराने से नहीं चलता बल्कि इस भरोसे से चलता है कि चुनाव निष्पक्ष और निष्कलंक हैं।
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