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 धर्मांतरण विरोधी क़ानून के दरुपयोग पर हाईकोर्ट ने जताई चिंता

adminBy adminApril 27, 2026 भारत No Comments4 Mins Read
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इस केस में सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि: युवती ने अदालत के सामने साफ कहा कि वह अपनी मर्जी से रिश्ते में थी उसने धर्मांतरण, जबरन शादी और किसी भी तरह के दबाव के आरोपों को खारिज किया और हर मामलो में यही होता है इसके बावजूद पुलिस ने कई गंभीर धाराओं में जांच जारी रखी। कोर्ट ने इसे “अजीब” बताते हुए पूछा कि जब कथित पीड़िता ही आरोपों को नकार रही है, तो फिर मामला किस आधार पर जिंदा रखा जा रहा है? यह सवाल केवल एक केस का नहीं, बल्कि उस सिस्टम का है जहां आरोप खत्म होने के बाद भी आरोपी नहीं बचता।

कानून का सबसे बड़ा ‘लूपहोल’

हाईकोर्ट ने खास तौर पर इस ट्रेंड पर चिंता जताई कि: बड़ी संख्या में मामलों में शिकायतकर्ता खुद “पीड़ित” नहीं होता बल्कि परिवार, रिश्तेदार या बाहरी संगठन एफआईआर दर्ज कराते हैं, यानी दो बालिग व्यक्तियों के निजी रिश्ते में भी “तीसरे पक्ष” की एंट्री हो जाती है और वही मामला पुलिस और कानून के हवाले हो जाता है। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

क्या यह सिर्फ यूपी तक सीमित है?

धर्मांतरण विरोधी कानून केवल उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं हैं। भारतीय जनता पार्टी शासित कई राज्यों जैसे मध्य प्रदेश, उत्तराखंड, गुजरात और अब महाराष्ट्र में भी ऐसे कानून लागू हैं या संशोधित किए गए हैं। इन राज्यों में सामने आए कई मामलों में समान पैटर्न देखने को मिला है (विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स और कोर्ट मामलों के आधार पर):

प्रेम संबंधों को “लव जिहाद” बताकर केस दर्ज करना

परिवार या संगठनों द्वारा दबाव बनाकर एफआईआर करवाना, बाद में अदालतों में आरोप टिक नहीं पाना या कमजोर पड़ जाना, हालांकि, कुछ मामलों में जबरन धर्मांतरण के आरोपों की जांच भी हुई है। लेकिन अदालतों की बार-बार की टिप्पणियां इस बात की ओर इशारा करती हैं कि कानून का इस्तेमाल और दुरुपयोग दोनों साथ-साथ चल रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा मामला

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में राजेंद्र बिहारी लाल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2025) का भी जिक्र किया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने भी इसी तरह के ट्रेंड की ओर संकेत किया था। यह बताता है कि मामला अब निचली अदालतों तक सीमित नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर की न्यायिक चिंता बन चुका है।

 कानून किसके लिए-सुरक्षा या नियंत्रण?

सरकार का तर्क साफ है कि यह कानून जबरन धर्मांतरण को रोकने के लिए है लेकिन आलोचकों का सवाल उतना ही तीखा है: क्या यह कानून व्यक्तिगत स्वतंत्रता, खासतौर पर महिलाओं की पसंद और अंतरधार्मिक रिश्तों पर नियंत्रण का माध्यम बन रहा है? जब एक बालिग महिला अदालत में कहती है कि वह अपनी मर्जी से संबंध में है, और फिर भी पुलिस केस जारी रखती है तो यह केवल कानूनी नहीं, बल्कि संवैधानिक सवाल बन जाता है।

अदालत का सख्त संदेश

हाईकोर्ट ने इस केस में: आरोप लगाने वाले पिता को खुद पेश होने का आदेश दिया। राज्य सरकार से जवाब तलब किया और याचिकाकर्ताओं की गिरफ्तारी पर रोक लगाते हुए सुरक्षा देने को कहा। यह कदम साफ संकेत है कि अदालत अब केवल टिप्पणी नहीं, बल्कि जवाबदेही तय करने के मूड में है।

कानून की मंशा बनाम ज़मीनी सच्चाई

धर्मांतरण विरोधी कानूनों की बहस अब केवल “धर्म” या “राजनीति” की नहीं रही बल्कि यह सीधे-सीधे नागरिक स्वतंत्रता, पुलिस की भूमिका और न्यायिक हस्तक्षेप की बहस बन चुकी है। सबसे बड़ा खतरा यही है कि अगर कानून का इस्तेमाल चुनिंदा मामलों में दबाव बनाने के लिए होने लगे, तो असली पीड़ितों के मामलों की विश्वसनीयता भी कमजोर हो जाती है। और यही वजह है कि अदालत की यह टिप्पणी एक चेतावनी है, सिर्फ उत्तर प्रदेश के लिए नहीं, बल्कि उन सभी राज्यों के लिए जहां ऐसे कानून लागू हैं।

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