ईरान और इसराइल अमरीका सिज़ फायर कल ख़त्म होने जा रहा है, लेकिन अब तक अमरीका, इसराइल और ईरान के बीच चल रही बात-चीत बेनतीजा साबित होती नज़र आ रही है लिहाज़ा दुनिया जलने के कगार पर है। ईरान और इसराइल आमने-सामने और पीछे खड़ा है अमेरिका! डोनाल्ड ट्रम्प धमकी देरहा है कि डील नहीं हुई तो ईरान को तबाह कर देंगे! वहीँ ईरान कहरहा है झुकेंगे नहीं! यानी जंग तय है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि भारत पर इसका क्या असर होगा ?
जहां भारत में गैस सिलेंडर की कीमत पहले ही लोगों की कमर तोड़ चुकी है, जहां पेट्रोल-डीजल पर टैक्स ने आम आदमी को पहले ही परेशान कर रखा है, अगर जंग हुई तो गैस की किल्लत होगी। पेट्रोल-डीजल बेकाबू होगा। सप्लाई चेन ठप होगी और देश में ऊर्जा संकट गहराएगा। अंड़ भक्तों को चाहिए कि थोड़ी देर के लिए भक्ति से बाहर आकर भी सोचें ये मूर्खों वाली भाषा रहने दें कि सिलेंडर 15 हज़ार में खरीदेंगे। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
गरीब मज़दूरों के पास महाना 15 हज़ार की कमाई भी नहीं है तो वो अपने परिवारों का पेट कैसे पालेंगे ? मुसलमान तो छोड़िये गोदी मीडिया के अलावा कोई हिन्दू पत्रकार भी इन मूर्खों से देशहित की, भाजपा और हिन्दुत्वादियों की हक़ीक़त या हक़, इंसाफ और सच्चाई की बात करता है तो बस आँख बंद करके ये मुर्ख उन्हें ट्रोल करते हैं कमेंट में उन्हें गालियां देते हैं,
तो ज़ाहिर सी बात है इन औंधे घड़ों पर इन सवालों का कोई असर नहीं होगा फिर भी इन मुर्ख अंड़भक्तों और नरेंद्र मोदी से सीधा सवाल है कि क्या देश को इस संकट के लिए तैयार किया गया? या फिर हमेशा की तरह “सब ठीक है” का नारा चलेगा? क्योंकि सच्चाई ये है: भारत आज भी 80% तेल बाहर से लाता है वैकल्पिक ऊर्जा की बात होती है लेकिन जमीन पर इसका कोई असर नहीं है। और ऊपर से भारी टैक्स! यानी संकट आएगा तो जनता ही पिसेगी। फिर देखते हैं कितने अंड़भक्त 15 हज़ार का सिलेंडर खरीदते हैं।
सवाल नंबर 2
ये खामोशी क्यों है? जब दुनिया युद्ध के कगार पर है। तो भारत की आवाज़ इतनी धीमी क्यों है? क्या भारत अपनी स्वतंत्र विदेश नीति चला रहा है? या फिर अमेरिका–इज़रायल के दबाव में है? सबसे बड़ा और सबसे खतरनाक सवाल! जिसकी सियासी गलियारों में फुसफुसाहट और चर्चा भी है कि क्या भारत का नेतृत्व किसी अंतरराष्ट्रीय दबाव में है? क्या ऐसी कोई “फाइलें”, “राज़” या “जानकारी” है
जिनकी वजह से भारत यानी मोदी खुलकर फैसला नहीं ले पा रहे हैं ? क्या मोदी खुद को बचाने के लिए पूरे देश को संकट में डाल रहे हैं ? क्या भाजपा और आरएसएस एक व्यक्ति की करतूतों पे पर्दा डालने के लिए पूरे देश को संकट में डाल रही है। भले ही इन दावों के सार्वजनिक सबूत नहीं हैं। लेकिन सवाल इसलिए उठ रहे हैं क्योंकि भारत की असामान्य चुप्पी। वैश्विक मंच पर बदला हुआ रुख और देश के अंदर बढ़ती आर्थिक चिंता। क्या ये सिर्फ इत्तेफाक है?
सवाल नंबर 3
क्या सत्ता में कोई सवाल पूछने वाला है? क्या भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में कोई इतना मजबूत है, जो देशहित में नेतृत्व से सवाल पूछ सके? या फिर भजपा और आरएसएस के पास मोदी के अलावा कोई विकल्प ही नहीं है? क्या डर है? या फिर सत्ता इतनी केंद्रीकृत हो चुकी है कि आवाज़ उठाना अब नामुमकिन है?
आखिरी वार-अगर देश संकट में जाता है…अगर गैस-तेल की किल्लत होती है…अगर आम आदमी और गरीब पिसता है…तो जिम्मेदार कौन होगा? वैश्विक हालात? या फिर हमारी अपनी नीतियाँ? या देश में पल रही इसराइल की नाजायज़ औलादें जो अपने बाप की आरतियां उतार कर उसके लिए हवन कर रही हैं ? आज देश पूछ रहा है कि क्या भारत एक मजबूत, स्वतंत्र देश की तरह फैसले ले रहा है? या फिर किसी अदृश्य दबाव में चुप बैठा है? जवाब चाहिए…क्योंकि अगला संकट सीधा आपके घर तक आने वाला है!
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