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कृष्ण प्रताप सिंह- पिछले दिनों इलाहाबाद व दिल्ली के उच्च न्यायालयों ने नरेंद्र मोदी व योगी आदित्यनाथ की केंद्र व प्रदेश सरकारों के मुस्लिम विरोधी सांप्रदायिक एजेंडे और साथ ही गोदी मीडिया को आईना दिखाने वाले दो महत्वपूर्ण फैसले दिए. लेकिन क्या पता, इनमें किसी को इस आईने के सामने जाकर अपनी शक्ल देखना कुबूल होगा या नहीं! पहले उत्तर प्रदेश की बात करें तो योगी सरकार ने बहराइच में गाजी मियां के नाम से प्रसिद्ध सय्यद सालार मसूद गाजी की दरगाह पर शताब्दियों से लगते आ रहे जेठ मेले (जिसे इस साल पंद्रह मई से पंद्रह जून तक लगना…
ग़ाज़ा में इंसान मर रहे हैं, और यूरोप कारें बेच रहा है। बच्चे भूख से दम तोड़ रहे हैं, और दुनिया व्यापार में व्यस्त है। क्या यही अंतरराष्ट्रीय नैतिकता है? जब ग़ाज़ा की धूल भरी गलियों में कोई बच्चा भूख से बिलखकर दम तोड़ता है, ठीक उसी वक़्त दुनिया के कुछ सबसे सभ्य, लोकतांत्रिक और ‘मानवाधिकार प्रेमी’ देश इज़राइल को कारें, चिप्स और इत्र बेच रहे होते हैं। वे प्रेस कॉन्फ्रेंस में ‘शांति और युद्धविराम’ की बातें करते हैं, लेकिन उन्हीं के पोर्ट पर इज़राइल के जहाज़ लादे जा रहे होते हैं — मुनाफ़े की मोटी खेप लेकर। 28 देशों…
हर्ष मंदर- भारतीय लोगों का अपने लोकप्रिय सिनेमा से जितना गहरा नाता है वैसा शायद दुनिया के बहुत कम लोगों का होगा. लोकप्रिय हिंदी सिनेमा अपने विवरण और भारतीय जीवन के चित्रण में यथार्थवादी नहीं है. लेकिन ये फ़िल्में अक्सर अपने युग के प्रमुख लोकाचार को भावपूर्ण ढंग से प्रतिबिंबित करती हैं. इस अर्थ में, भारतीय सिनेमा का अंतर्पाठ अक्सर राजनीतिक और वैचारिक रूप से प्रेरित होता है. 1950 और 1960 के दशक के लोकप्रिय हिंदी सिनेमा पर नज़र डालें. ये भारत की आज़ादी के बाद के शुरुआती दशक थे, अपेक्षाकृत रूप से आदर्शवाद और उम्मीद से भरा दौर था,…
19 साल जेल में सड़ते रहे, अब कहा गया ‘बेगुनाह हो’ — क्या यही है भारत की न्याय व्यवस्था? क्या पुलिस को फर्जी मुकदमों में निर्दोषों को फँसाने की खुली छूट है? क्या मुसलमान होना ही शक की बुनियाद बन चुका है? 2006 में मुंबई की लोकल ट्रेनों में धमाके हुए, 189 मौतें हुईं — और सरकार को चाहिए था कोई ‘जिम्मेदार’। बस, मुस्लिम नाम चाहिए था — और 12 मुस्लिम युवकों को उठा लिया गया। 19 साल जेल में रहे। टॉर्चर, फर्जी कबूलनामे, कमजोर सबूत, झूठे गवाह — और 2024 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा: “ये सभी निर्दोष थे।…
दोस्तों 25 जुलाई 2025 को नरेंद्र मोदी ने एक और रिकॉर्ड बना लिया! 4,078 दिन लगातार प्रधानमंत्री रहकर इंदिरा गांधी का रिकॉर्ड तोड़ दिया। जिसे लेकर गोदी मीडिया तारीफों के पुल बांध रहा है लेकिन हम बताएंगे वो सच्चाई जो गोदी मीडिया ने आपसे छुपाई है। मोदी बनाम इंदिरा — कौन है असली लीडर?” क्या सिर्फ़ कुर्सी पर जमे रहने से इतिहास लिखा जाता है? चलिए दोनों के दौर की तुलना करते हैं। इंदिरा गांधी ने 4,077 दिन में देश को क्या दिया ? १ बांग्लादेश को आज़ादी दिलवाई। २ पाकिस्तान को युद्ध में हराया। ३ अमेरिका की आंखों में…
महाराष्ट्र में क़ुरैशी जमात द्वारा बीफ कारोबार को पूरी तरह बंद करने का फ़ैसला किया गया जिसके बाद महाराष्ट्र भर में जानवरों के बाजार ठप हो गए हैं जिसका सबसे ज़्यादा असर किसानों पर पढ़ रहा है। सोशल मीडिया पर गरीब किसान गौरक्षकों, बजरंगदल , विहिप और सरकार को लेकर नाराज़गी जताते नज़र आ रहे हैं। क़ुरैशी जमात का ये निर्णय केवल एक धार्मिक या राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं है — यह संविधान, अर्थव्यवस्था और सामाजिक संरचना के खिलाफ सत्ता के जरिए थोपे गए एकतरफा युद्ध का जवाब है। महाराष्ट्र में हर दिन लगभग 30,000 से 35,000 जानवरों की कटाई होती…
11 जुलाई 2006 को मुंबई की लोकल ट्रेनों में सिलसिलेवार धमाके हुए। 11 मिनट में 7 धमाके, और 189 निर्दोष लोग मारे गए। ये मुंबई की आत्मा पर हमला था। लेकिन असली हमला तो इसके बाद शुरू हुआ — जांच और न्याय के नाम पर। 2015 में आए अदालत के फ़ैसले में 13 में से 5 लोगों को फांसी और बाकी को उम्रक़ैद की सज़ा सुनाई गई। लेकिन क्या सच में इन लोगों ने ही ब्लास्ट किया था? आइए विस्तार से समझते हैं कि क्यों इस केस को भारत की न्यायिक और जांच प्रणाली पर एक काला धब्बा कहा जा…
भारतीय लोकतंत्र की सबसे अहम संस्था — चुनाव आयोग (ECI) — अब सवालों के घेरे में है, और सिर्फ़ आलोचनाओं के लिए नहीं, बल्कि लोकतंत्र के मूल ढांचे को खतरे में डालने के लिए। हाल ही में बिहार में मतदाता सूची के ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (Special Intensive Revision – SIR) में जिस तरह चुनाव आयोग ने मनमानी और पक्षपात दिखाया, उससे यह स्पष्ट होता जा रहा है कि आयोग अब ‘स्वतंत्र’ नहीं, बल्कि सत्ता का ‘सहयोगी’ बन गया है। बिहार में लोकतंत्र पर कतरनी:- बिहार में SIR की प्रक्रिया के दौरान चुनाव आयोग ने मतदाताओं से स्वयं अपने नाम सूची…
एक ऐतिहासिक फैसला या एक देर से आई शर्मिंदगी?19 साल! इतने सालों तक 12 मुस्लिम युवकों को आतंकवादी कहकर जेल में बंद रखा गया। और अब, बॉम्बे हाई कोर्ट ने साफ कहा है: “ये सारे बेगुनाह थे।” तो सवाल उठता है — इन बेगुनाहों की ज़िंदगी के 19 साल कौन लौटाएगा? और उन पुलिस अफसरों का क्या, जिन्होंने फर्जी केस गढ़े, टॉर्चर किया, और अदालत में झूठ बोला? बॉम्बे हाई कोर्ट ने क्या कहा?:- 18 जुलाई 2024 को बॉम्बे हाई कोर्ट की दो सदस्यीय खंडपीठ (न्यायमूर्ति अनिल किलोर और न्यायमूर्ति एस.सी. चंदक) ने 7/11 मुंबई ट्रेन धमाके केस में दोषी…
17 जुलाई 2025 को दिल्ली हाई कोर्ट का फैसला आया — तबलीगी जमात से जुड़े 70 भारतीय नागरिकों के खिलाफ दर्ज 16 चार्जशीट रद्द। फैसला सीधा और साफ था: “इन मामलों में कोई ठोस आधार नहीं था।” लेकिन सवाल अब ये नहीं है कि आरोप गिरे — सवाल यह है कि चार साल तक ये आरोप टिके कैसे? कोविड का बहाना, मुसलमानों को निशाना:- मार्च 2020 में जब देश अचानक लॉकडाउन में धकेल दिया गया, निजामुद्दीन के मरकज़ में कुछ विदेशी नागरिक फंसे रह गए। तबलीगी जमात का कार्यक्रम खत्म हो चुका था, लेकिन देश की मीडिया और सत्ता प्रतिष्ठान…