ग़ाज़ा में इंसान मर रहे हैं, और यूरोप कारें बेच रहा है। बच्चे भूख से दम तोड़ रहे हैं, और दुनिया व्यापार में व्यस्त है। क्या यही अंतरराष्ट्रीय नैतिकता है? जब ग़ाज़ा की धूल भरी गलियों में कोई बच्चा भूख से बिलखकर दम तोड़ता है, ठीक उसी वक़्त दुनिया के कुछ सबसे सभ्य, लोकतांत्रिक और ‘मानवाधिकार प्रेमी’ देश इज़राइल को कारें, चिप्स और इत्र बेच रहे होते हैं। वे प्रेस कॉन्फ्रेंस में ‘शांति और युद्धविराम’ की बातें करते हैं, लेकिन उन्हीं के पोर्ट पर इज़राइल के जहाज़ लादे जा रहे होते हैं — मुनाफ़े की मोटी खेप लेकर।
28 देशों का दिखावा — बयान जारी, व्यापार जारी!:- 28 देशों ने इज़राइल से ग़ाज़ा युद्ध रोकने की अपील की है। लेकिन कोई पाबंदी नहीं, कोई बायकॉट नहीं, कोई सैन्य डील रद्द नहीं। इनमें फ्रांस, यूके, जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया, जापान जैसे ‘सभ्य देशों’ के नाम हैं — जो दिन में “युद्ध रोकिए” कहते हैं और रात में मिलियन डॉलर के सौदे करते हैं।
फिलिस्तीन को मान्यता” का ढकोसला, व्यापार का धंधा चालू:- आयरलैंड, स्पेन, नॉर्वे जैसे देश जिन्होंने फ़िलिस्तीन को मान्यता दी — आज भी इज़राइल से अरबों डॉलर का व्यापार कर रहे हैं। इटली ने 2023 में इज़राइल को सबसे ज़्यादा एक्सपोर्ट किया – $3.5 अरब, जिसमें $116 मिलियन की कारें भी शामिल थीं। आयरलैंड ने अकेले $3.58 बिलियन के “इंटीग्रेटेड सर्किट” इज़राइल से आयात किए — यानी वही तकनीक जो हथियारों में इस्तेमाल हो सकती है।
ग़ाज़ा: एक जलता हुआ नरक — और मानवता का मज़ाक:- 60,000 से ज़्यादा लोग मारे जा चुके हैं, 150,000 से ज़्यादा घायल हैं, और हर दिन सैकड़ों लोग जिनमें ज़्यादा तर बच्चे भुखमरी से मर रहे हैं। और इसके बीच संयुक्त राष्ट्र की “भविष्य की अकाल चेतावनी” को महीनों तक नजरअंदाज किया गया।
इज़राइल की “रणनीतिक विराम” की चालाकी:- इज़राइल ने हाल ही में “मानवीय विराम” की घोषणा की —सुबह 10 से शाम 8 बजे तक, ताकि राहत पहुँच सके।
लेकिन उसी दिन 43 और फिलिस्तीनियों की हत्या कर दी गई। विराम के बीच मौतें? यह ‘रणनीति’ नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय आंखों में धूल झोंकने की कला है।
ये युद्ध नहीं, एक ‘कॉर्पोरेट प्रायोजित जनसंहार’ है!:- फ्रांस, यूके और जर्मनी जैसे देश जो आज इज़राइल को चेतावनी दे रहे हैं, कल उसे ड्रोन टेक्नोलॉजी, साइबर सर्विलांस और हथियारों की मदद दे चुके हैं। शब्दों से इज़राइल नहीं रुकेगा, जब तक उसकी जेब भरती रहेगी।
तो फिर क्यों नहीं रुकता नरसंहार?:- क्योंकि—इज़राइल सिर्फ अमेरिका का सहयोगी नहीं, वो यूरोप का बाजार है, एशिया के लिए टेक्नोलॉजी सेंटर, और पश्चिमी देशों के लिए बिजनेस हब है।जो देश प्रेस में ‘शांति’ की बातें कर रहे हैं, वही इज़राइल को चिप्स भेज रहे हैं, वैक्सीन बना रहे हैं, इलेक्ट्रॉनिक्स एक्सपोर्ट कर रहे हैं। अब दिखावे की नहीं, बायकॉट की ज़रूरत है! बयान नहीं, बहिष्कार चाहिए। ट्वीट नहीं, ट्रेड रोकना होगा। ‘हमास को जवाब’ का बहाना नहीं, इज़राइल को ज़िम्मेदार ठहराना होगा।
“जब तक कारोबार चलता रहेगा, नरसंहार भी चलता रहेगा।” ग़ाज़ा के बच्चों को राहत की नहीं, रोक की ज़रूरत है। इस बार चुप्पी भी अपराध है।