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Home»एलान विशेष

रामनवमी, उत्सव से टकराव तक: बदलता सामाजिक माहौल और राजनीतिक संदर्भ

adminBy adminMarch 31, 2026 एलान विशेष No Comments4 Mins Read
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रामनवमी, जो परंपरागत रूप से भगवान राम के जन्मोत्सव के रूप में शांति, श्रद्धा और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक रही है, हाल के वर्षों में कई जगहों पर तनाव और टकराव की खबरों के साथ जुड़ती दिखाई दे रही है। रामनवमी ही नहीं बल्कि देश में हिन्दू धर्म का हर त्यौहार नफरत, आतंक और अल्पसंख्यंकों को डराने औसर बनता जा रहा है. इतना ही नहीं अल्पसंख्यंकों के क्रिसमिस जैसे त्योहारों को भी शांति और ख़ुशी से मानाने नहीं दिया जा रहा यह बदलाव सिर्फ एक धार्मिक आयोजन का नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक और राजनीतिक माहौल का संकेत भी माना जा रहा है।

साझी संस्कृति से दूरी

एक समय था जब भारत में धार्मिक त्योहार, चाहे वे हिंदू हों या मुस्लिम, समाज के विभिन्न वर्गों को जोड़ने का काम करते थे। रामनवमी, दसरा, दिवाली, ईद,  मुहर्रम या क्रिसमस जैसे त्योहारों पर अलग-अलग धर्मों के लोग एक-दूसरे के यहां आते-जाते, बधाइयां देते और सामाजिक रिश्तों को मजबूत करते थे। यह परंपरा भारत की “गंगा-जमुनी तहज़ीब” की पहचान रही है। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

हाल के वर्षों में बदलाव

2014 के बाद, जब भारतीय जनता पार्टी केंद्र की सत्ता में आई, तब से कई विश्लेषकों का मानना है कि धार्मिक आयोजनों का स्वरूप धीरे-धीरे बदला है। कुछ स्थानों पर रामनवमी जैसे त्योहारों के दौरान बड़े और हथियारनुमा वस्तुओं के साथ जुलूस निकलने लगे, तेज़ आवाज़ में भड़काऊ नारेबाज़ी की घटनाएं सामने आईं, और अक्सर ऐसे आयोजन हिन्दुत्वादी संगठनों या भाजपा के विधायक, सांसद या मंत्रियों द्वारा किए जाते हैं ताकि नफरती भाषणों का औसर प्राप्त हो।

विशेषकर जिन राज्यों में चुनाव होते हैं वहां तो प्लानिंग और साज़िश के साथ इंतेज़ाम किया जाता है, इसकी ताज़ा मिसाल पश्चिमी बंगाल का मुर्शिदाबाद जहां मुस्लिम बहुल इलाकों में जाकर आतंक फैलाया गया, निशाना बनाकर मुसलमानों की दुकानों को जलाया गाय, लूटा गया, ये सारे गुंडे रामनवमी का जुलुस लेकर वहां पहुंचे थे, शनाख्त छुपाने के लिए इन आतंकवादियों ने अपने चेहरे छुपा रखे थे।

इसी तरह टी राजा ने भी रामनवमी के जुलूस का आयोजन करके खूब ज़हर उगला जिसका विडिओ सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। देश में सैंकड़ों जगह विशेषकर भाजपा शासित राज्यों के  संवेदनशील इलाकों, खासकर मस्जिदों या मुस्लिम बहुल मोहल्लों के सामने रुककर प्रदर्शन किए गए. इन घटनाओं ने कई बार स्थानीय स्तर पर तनाव, झड़प और हिंसा को जन्म दिया।

प्रशासन और अनुमति का सवाल

एक अहम सवाल यह उठता है कि क्या ऐसे जुलूसों के मार्ग और स्वरूप पर प्रशासन का नियंत्रण पर्याप्त है? आलोचकों का कहना है कि कई बार जानबूझकर ऐसे रास्तों की अनुमति दी जाती है जो पहले से संवेदनशील माने जाते हैं. समय रहते सख्ती नहीं बरती जाती, जिससे छोटी घटनाएं बड़े विवाद में बदल जाती हैं. हालांकि, सरकार और उसके समर्थक इस आरोप को खारिज करते हुए कहते हैं कि जुलूस निकालना धार्मिक स्वतंत्रता का हिस्सा है. हिंसा के लिए कुछ असामाजिक तत्व जिम्मेदार होते हैं, न कि कोई विशेष नीति राजनीति और ध्रुवीकरण.

यह भी देखने में आता है कि धार्मिक आयोजनों के दौरान होने वाले टकराव अक्सर राजनीतिक बहस का हिस्सा बन जाते हैं। एक पक्ष इसे “सांस्कृतिक पुनर्जागरण” के रूप में देखता है, जबकि दूसरा पक्ष इसे “धार्मिक ध्रुवीकरण” और सामाजिक विभाजन की रणनीति मानता है।

समाधान की दिशा

विश्लेषकों के अनुसार, स्थिति को बेहतर बनाने के लिए कुछ जरूरी कदम हो सकते हैं: प्रशासन द्वारा जुलूसों के मार्ग और आचरण पर सख्त और निष्पक्ष नियंत्रण. राजनीतिक दलों द्वारा जिम्मेदार बयानबाज़ी. स्थानीय समुदायों के बीच संवाद और विश्वास बहाली. त्योहारों को सांस्कृतिक उत्सव के रूप में मनाने पर जोर, न कि शक्ति प्रदर्शन के रूप में. ये भी सोचने वाली बल्कि हस्य्स्पद बात है कि 80 प्रतिशत हिन्दू बहुसंख्यांक वाले देशमें हिन्दुत्वादियों की सरकार होने के बावजूद 20 प्रतिशत अल्पसंख्यंकों के सामने शक्ति प्रदर्शन होता है।

रामनवमी या कोई भी धार्मिक पर्व, समाज को जोड़ने का माध्यम होना चाहिए, न कि विभाजन का। यह केवल सरकार या किसी एक दल की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज, प्रशासन और राजनीतिक नेतृत्व सभी की साझा जिम्मेदारी है कि वे भारत की उस परंपरा को बनाए रखें, जहां विविधता में एकता सिर्फ नारा नहीं, बल्कि जीवन का हिस्सा रही है।

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