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जब कोई जांच एजेंसी दावा करे कि उसकी दोषसिद्धि दर 100 प्रतिशत है, तो यह उपलब्धि नहीं बल्कि लोकतंत्र के लिए चेतावनी होनी चाहिए। न्याय व्यवस्था में “परफेक्ट रिकॉर्ड” का मतलब अक्सर यह नहीं होता कि अपराध शून्य संदेह के साथ साबित हुए हैं, बल्कि यह कि प्रक्रिया ने प्रतिरोध की सारी गुंजाइश खत्म कर दी है। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) का दावा जिसे गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में गर्व के साथ दोहराया, कि 2024 में 100 प्रतिशत दोषसिद्धि हासिल की गई, पहली नज़र में आतंकवाद के…

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भीड़ की हिंसा अब केवल कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं भारत में भीड़ की हिंसा अब केवल कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं रही। यह एक राजनीतिक-सांस्कृतिक परियोजना का रूप ले चुकी है, जहां हिंसा करने वाले खुद को अपराधी नहीं, बल्कि “सही पक्ष” का सिपाही समझते हैं। बिहार के नवादा में मोहम्मद अथर हुसैन की हत्या और पश्चिम बंगाल में हमलावरों का सार्वजनिक सम्मान, इन दोनों घटनाओं को साथ रखकर देखना अब अनिवार्य हो गया है। सार्वजनिक संदेश के रूप में एक हत्या बिहार के नवादा में एक फेरीवाले से पहले उसका नाम पूछा गया, फिर उसकी पहचान देख कर उसके बाद…

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बहुत देर तक सोचता रहा. द ग्रेट शम्सुद्दीन फैमिली देखते हुए हंसी ज़्यादा आई या बहुत सी हंसी आते-आते नहीं भी आई? मुसलमानों की हर चीज़ से नफ़रत के इस दौर में यह कहानी एक मुस्लिम फैमिली की है या एक मुस्लिम फैमिली आज कल की हिंदू फैमिली या विराट हिंदू राष्ट्र की कहानी कह रही है? एक ‘हिरा’ की परछाई मुझे यह फिल्म उस विराट हिंदू राष्ट्र (हिरा) की लगी, जिसकी स्थापना की आधिकारिक घोषणा तो नहीं हुई है मगर ग़ैर आधिकारिक रूप से स्थापना हो चुकी है. फिल्म के किरदारों के नाम भले मुस्लिम हैं मगर उनके अभिनय में हिंदू…

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दिल्ली के रामलीला मैदान में आयोजित कांग्रेस की ‘वोट चोर गद्दी छोड़’ महारैली सिर्फ़ एक राजनीतिक प्रदर्शन नहीं थी, बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र की मौजूदा हालत पर एक खुला आरोपपत्र थी। राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खरगे, प्रियंका गांधी समेत कांग्रेस के तमाम वरिष्ठ नेताओं ने जिस आक्रामक भाषा में चुनाव आयोग, भाजपा और आरएसएस को कटघरे में खड़ा किया, उससे यह साफ़ हुआ कि विपक्ष अब चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता को देश की सबसे बड़ी लड़ाई के रूप में पेश करना चाहता है। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें राहुल गांधी का यह कहना कि “चुनाव…

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2015 में दादरी के बिसाहड़ा गांव में मोहम्मद अख़लाक़ की हिंदुत्ववादी भीड़ द्वारा पीट-पीटकर हत्या केवल एक व्यक्ति की जान लेने की घटना नहीं थी, बल्कि यह भारत के लोकतंत्र, कानून के शासन और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर एक गहरा हमला थी। इस घटना ने उस दौर की शुरुआत की, जिसमें “संदेह”, “भीड़” और “दंडहीनता” धीरे-धीरे सार्वजनिक जीवन का हिस्सा बनते चले गए। अब, लगभग एक दशक बाद, उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा इस मामले में आरोपियों के खिलाफ मुकदमा वापस लेने की कोशिश ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या राज्य सत्ता न्याय के साथ…

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भारत का संविधान किसी एक धर्म का नहीं, बल्कि सह-अस्तित्व का दस्तावेज़ है। लेकिन जब कोई बहुसंख्यक संगठन खुलेआम यह तय करने लगे कि कौन-सा त्योहार कौन मनाएगा, कौन क्या खयेगा और कौन-सा बोर्ड कौन लगाएगा और कौन-सी सजावट ‘अनुचित’ है, तब सवाल केवल क्रिसमस का नहीं रह जाता—सवाल नागरिक स्वतंत्रता और बंधुत्व का हो जाता है। विश्व हिंदू परिषद (विहिप) ने ताज़ा अपील की है कि हिंदू समाज क्रिसमस न मनाए। पहली नज़र में तो यह एक ‘सांस्कृतिक आग्रह’ लग सकता है। लेकिन जब यही अपील दुकानदारों, मॉल्स और स्कूलों तक फैलाई जा रही हो, और जब इसके साथ…

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लोकतंत्र में मतदाता सूची केवल काग़ज़ नहीं होती बल्कि वह सत्ता की चाबी होती है। जब इस सूची की निष्पक्षता पर सवाल उठता है, तो चुनावी प्रक्रिया की आत्मा कटघरे में खड़ी हो जाती है। पश्चिम बंगाल में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) के बाद 58,20,898 मतदाताओं के नाम ड्राफ्ट लिस्ट से हटाया जाना सिर्फ प्रशासनिक नहीं, बल्कि राजनीतिक सवाल खड़ा करता है। चुनाव आयोग और मुख्य निर्वाचन अधिकारी के अनुसार, इन नामों को मृत, लापता, स्थानांतरित, डुप्लीकेट और अन्य कारणों से हटाया गया है, जबकि काग़ज़ पर यह प्रक्रिया ‘शुद्धिकरण’ कही जा सकती है। लेकिन ज़मीनी राजनीति में यही प्रक्रिया…

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जम्मू-कश्मीर में श्री माता वैष्णो देवी मेडिकल कॉलेज को लेकर छिड़ा विवाद फिलहाल राज्य की राजनीति ही नहीं, बल्कि पूरे देश की सामाजिक दिशा का महत्वपूर्ण सूचक बन गया है। हिंदुत्ववादी संगठनों द्वारा उठाए गए शोर-शराबे और आरोपों के बीच सच्चाई सामने आगई है। तथ्य स्पष्ट रूप से कुछ और कह रहे हों, तब भी समाज को धार्मिक आधार पर भड़काने की कोशिशें क्यों की जाती हैं? हिंदुत्ववादी संगठनों के दावों की असलियत: दान बनाम सरकारी अनुदान का सच दक्षिणपंथी संगठनों विश्व हिंदू परिषद, राष्ट्रीय बजरंग दल और कुछ अन्य स्थानीय समूहों ने जोरशोर से यह प्रचार किया कि यह…

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प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा बीते दस वर्षों में 6,312 मामले दर्ज किए गए, लेकिन इसी अवधि में सिर्फ 120 मामलों में दोषसिद्धि हो सकी, यह आंकड़ा खुद केंद्र सरकार ने संसद में दिया है। अब सवाल यह नहीं है कि आंकड़े क्या कहते हैं, सवाल यह है कि ये आंकड़े देश की जांच प्रणाली, न्याय प्रक्रिया और एजेंसी की भूमिका पर क्या संकेत देते हैं? क्या ईडी की बढ़ती शक्तियाँ उसकी जवाबदेही की कीमत पर आई हैं? 2014 के बाद मामलों की बाढ़: सक्रियता या आक्रामकता? 2014 से पहले ईडी हर साल मुश्किल से 200 से कम मामले दर्ज करती…

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महाराष्ट्र में मतदाता सूची से जुड़ी गड़बड़ियों के दो बड़े खुलासों जिसमें मुंबई में 11 लाख डुप्लीकेट नाम और नांदेड़ में कोचिंग सेंटर के पतों पर दर्ज सैकड़ों वोटरों ने राज्य की चुनावी विश्वसनीयता को कठघरे में खड़ा कर दिया है। ये त्रुटियाँ सामान्य प्रशासनिक चूक नहीं लगतीं; इनका पैमाना इतना बड़ा है कि लोकतंत्र की मूल संरचना मतदान का अधिकार पर सीधा खतरा दिखाई देता है। और सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह कि क्या यह सब हाल ही में हुए महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में उठे विवादों और आरोपों से जुड़ा एक बड़ा पैटर्न है? मुंबई के 11 लाख डुप्लीकेट वोटर:…

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